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Mains Marathon

  • 30 Jul 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    दिवस 39: “जवाबदेही के बिना सत्यनिष्ठा एक सजावटी मूल्य है; और सत्यनिष्ठा के बिना जवाबदेही दमनकारी बन जाती है।” लोक प्रशासन में इन दोनों के अंतर्संबंधों पर चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • लोक प्रशासन के संदर्भ में सत्यनिष्ठा और जवाबदेही को संक्षेप में परिभाषित कीजिये।
    • इन दोनों नैतिक सिद्धांतों की पारस्परिक निर्भरता को स्पष्ट कीजिये और यह असंतुलन किस प्रकार अकार्यकारी शासन व्यवस्था को जन्म देता है? उदाहरणों सहित समझाइये।
    • उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    सत्यनिष्ठा का तात्पर्य नैतिक सिद्धांतों के प्रति अडिग प्रतिबद्धता से है, जबकि जवाबदेही का अर्थ है—अपने कार्यों को स्पष्ट करने और उनके औचित्य को सिद्ध करने का दायित्व। लोक प्रशासन में इन दोनों का समानांतर रूप से कार्य करना अनिवार्य है। यदि सत्यनिष्ठा के साथ जवाबदेही न हो, तो वह केवल एक अप्रभावी आदर्शवाद बनकर रह जाती है; वहीं सत्यनिष्ठा के बिना जवाबदेही से शासन भयप्रधान तथा दमनात्मक बन सकता है, जिससे संस्थागत नैतिकता एवं जनविश्वास दोनों का क्षय होता है।

    मुख्य भाग:

    • जवाबदेही के बिना सत्यनिष्ठा में प्रवर्तनीयता का अभाव होता है, जो बाह्य मान्यता के बिना एक निष्क्रिय व्यक्तिगत गुण में बदल जाती है।
      • एक लोक सेवक ईमानदार हो सकता है, लेकिन प्रदर्शन की लेखा परीक्षा या प्रकटीकरण-मानदंडों न हों, तो यह अप्रमाणित रह जाता है।
      • उदाहरण: सत्येंद्र दुबे, जिन्होंने NHAI में सत्यनिष्ठा को बरकरार रखा, के पास संस्थागत सुरक्षा और प्रतिक्रिया तंत्र का अभाव था।
    • सत्यनिष्ठा के बिना उत्तरदायित्व केवल भय और दमन आधारित अनुपालन को जन्म देता है, जिसमें नैतिक विवेक का अभाव होता है।
      • लोक सेवक केवल दंड से बचने के लिये कार्य कर सकते हैं, नैतिक दृढ़ विश्वास या जनसेवा के लिये नहीं।
      • उदाहरण: नैतिक मार्गदर्शन के बिना सतर्कता निरीक्षणों पर अत्यधिक निर्भरता निर्णय लेने की पहल को दबा सकती है।
    • उनका अंतर्संबंध नैतिक शासन सुनिश्चित करता है, आंतरिक नैतिक दिशा-निर्देशों को बाह्य उत्तरदायित्व के साथ जोड़ता है।
      • सत्यनिष्ठा सही काम करने के लिये प्रेरित करती है; जवाबदेही गलत काम या निष्क्रियता के परिणामों को सुनिश्चित करती है।
      • उदाहरण: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने सत्यनिष्ठा का परिचय दिया और चुनावी आचरण में सुधार के लिये जवाबदेही उपागमों का प्रयोग किया।
    • सिविल सेवा आचरण नियम जैसे नैतिक कार्यढाँचे, शासन में इस संतुलन को संस्थागत रूप देने का प्रयास करते हैं।
      • वे पारदर्शिता, नैतिक आचरण को बढ़ावा देते हैं और साथ ही ज़िम्मेदारी लागू करते हैं।
    • RTI, e-Samiksha और CPGRAMS जैसी डिजिटल पहल व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा को सुदृढ़ करते हुए जवाबदेही बढ़ाती हैं।
      • वे नागरिक भागीदारी और नैतिक उत्तरदायित्व पर आधारित एक उत्तरदायी प्रणाली का निर्माण करते हैं।
    • MGNREGA में सामाजिक अंकेक्षण और आधार-लिंक्ड DBT योजनाओं में पारदर्शिता, दोनों सिद्धांतों के संरेखित होने पर सकारात्मक परिणाम दिखाते हैं।
      • ये पहल भ्रष्टाचारजन्य अपवहन को कम करती हैं, विश्वास को बढ़ावा देती हैं और प्रशासकों के नैतिक व्यवहार को सुदृढ़ बनाती हैं।
    • लोकपाल, केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) और विभागीय आचार समितियाँ जैसे संस्थागत निकाय जाँच एवं मार्गदर्शन के माध्यम से इस नैतिक तालमेल को सुदृढ़ करने में सहायता करते हैं।
      • ये सार्वजनिक क्षेत्र में नैतिक नेतृत्व को बढ़ावा देते हुए कदाचार को रोकते हैं।

    निष्कर्ष:

    लोक प्रशासन में यदि सत्यनिष्ठा हो पर उत्तरदायित्व न हो, तो वह नैतिक रूप से सही होते हुए भी कार्यात्मक रूप से कमज़ोर होती है। वहीं, यदि उत्तरदायित्व तो हो पर सत्यनिष्ठा न हो, तो वह विधिक रूप से तो उचित दिख सकती है पर नैतिक रूप से खोखली होती है। जब ये दोनों एक साथ होते हैं, तब शासन प्रणाली न्यायपूर्ण, पारदर्शी और उत्तरदायी बनती है, जो संविधानिक नैतिकता को बनाए रखती है तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं में जन-विश्वास को सुदृढ़ करती है।

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