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25 Jul 2025
सामान्य अध्ययन पेपर 3
आंतरिक सुरक्षा
दिवस 35: “हिंद महासागर महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का नया रंगमंच है।” हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति का मूल्यांकन कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर
हल करने का दृष्टिकोण:
- संक्षेप में हिंद-प्रशांत क्षेत्र को परिभाषित कीजिये और इसके बढ़ते भू-राजनीतिक महत्त्व पर प्रकाश डालिये।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति का मूल्यांकन कीजिये।
- आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
हिंद-प्रशांत क्षेत्र, विशेषकर हिंद महासागर, 21वीं सदी की भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का केंद्र बन गया है। वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा का 80% से अधिक इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है, इसलिये प्रमुख शक्तियाँ, जैसे: चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान व ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रीय देश इस समुद्री क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं। हिंद महासागर के केंद्र में स्थित भारत ने अपने हितों की रक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिये एक बहुस्तरीय समुद्री सुरक्षा रणनीति अपनाई है।
मुख्य भाग:
हिंद-प्रशांत महासागर का सामरिक महत्त्व
- आर्थिक महत्त्व: होर्मुज़ और मलक्का जलडमरूमध्य जैसी महत्त्वपूर्ण समुद्री संचार रेखाएँ (SLOC) वैश्विक व्यापार को संचालित करती हैं।
- चीन का समुद्री विस्तार: PLA नौसेना की बढ़ती उपस्थिति, ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ बंदरगाह (जैसे: ग्वादर, हंबनटोटा) और जिबूती जैसे विदेशी अड्डे बीज़िंग की महत्त्वाकांक्षाओं को दर्शाते हैं।
- अमेरिकी हिंद-प्रशांत रणनीति: नौवहन संचालन की स्वतंत्रता और AUKUS जैसे गठबंधन चीन की मुखरता को संतुलित करते हैं।
- बहुध्रुवीय हित: फ्राँस, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने अपनी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ाई है, जिससे यह क्षेत्र प्रतिस्पर्धा का अखाड़ा बन गया है।
भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति
- SAGAR सिद्धांत (क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा और विकास): भारत का दृष्टिकोण समावेशी समुद्री सहयोग, क्षमता निर्माण एवं मानवीय सहायता पर केंद्रित है।
- एक्ट ईस्ट नीति और हिंद-प्रशांत आउटरीच:
- क्षेत्रीय सहयोग और समुत्थानशक्ति के लिये ASEAN, IORA एवं क्वाड भागीदारों (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के साथ संबंधों को मज़बूत किया जा रहा है।
- नौसेना आधुनिकीकरण:
- INS विक्रांत (IAC-1) को नौसेना में शामिल किया गया है और प्रोजेक्ट 75 के तहत पनडुब्बी बेड़े का विस्तार किया गया है।
- समुद्री निगरानी के लिये P-8I विमान और वास्तविक काल में डोमेन जागरूकता के लिये समुद्री ड्रोन (UAV) खरीदे गए हैं।
- सामरिक नौसैनिक साझेदारी और अभ्यास:
- क्वाड सदस्यों के साथ मालाबार नौसैनिक अभ्यास।
- ओवरसीज़ बेस तक पहुँच के लिये द्विपक्षीय सैन्य समझौते (जैसे: अमेरिका,फ्राँस, ऑस्ट्रेलिया के साथ)।
- सूचना संलयन और निगरानी:
- 20 से अधिक देशों के साथ समुद्री यातायात डेटा साझा करने के लिये गुरुग्राम में IFC-IOR।
- वास्तविक काल में निगरानी के लिये तटीय रडार शृंखलाओं और उपग्रहों का उपयोग।
- द्वीपीय अवसंरचना विकास:
- अंडमान और निकोबार कमान को त्रि-सेवा केंद्र के रूप में सुदृढ़ बनाना।
- दुकम (ओमान) और चांगी (सिंगापुर) जैसे प्रमुख विदेशी बंदरगाहों तक पहुँच विकसित करना।
निष्कर्ष:
भारत की समुद्री रणनीति सख्त शक्ति और रणनीतिक कूटनीति का संतुलित मिश्रण दर्शाती है। यह एक ओर जहाँ क्षेत्र में विश्वासयोग्य प्रतिरोध क्षमता और सद्भाव उत्पन्न करती है, वहीं दूसरी ओर इसे वित्तीय सीमाओं और चीन के बढ़ते दबाव जैसी चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखने के लिये बहुपक्षवाद, समुद्री अवसंरचना एवं रक्षा क्षमताओं पर निरंतर ध्यान देना आवश्यक होगा।