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Mains Marathon

  • 29 Jul 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    दिवस 38: "यदि नैतिक दृष्टिकोण चरित्र को परिभाषित करते हैं; तो राजनीतिक दृष्टिकोण नागरिकता को परिभाषित करते हैं।" एक नैतिक रूप से उत्तरदायी सार्वजनिक जीवन को गढ़ने में नैतिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण के बीच अंतर्संबंध का परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • नैतिक दृष्टिकोण और राजनीतिक दृष्टिकोण के अर्थ को संक्षेप में समझाते हुए उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये।
    • चरित्र के आधार के रूप में नैतिक दृष्टिकोण पर चर्चा कीजिये।
    • लोकतांत्रिक नागरिकता के सार के रूप में राजनीतिक दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिये।
    • नैतिक और राजनीतिक दृष्टिकोणों के बीच अंतर्संबंध का परीक्षण कीजिये।
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    नैतिक दृष्टिकोण किसी व्यक्ति की सही और गलत की समझ को दर्शाते हैं जो उसके चरित्र को आकार देते हैं, जबकि राजनीतिक दृष्टिकोण शासन, अधिकारों एवं नागरिक कर्त्तव्यों से जुड़ी मान्यताएँ होते हैं जो नागरिकता को गढ़ते हैं। लोकतंत्र में, दोनों का परस्पर प्रभाव निजी विवेक को सार्वजनिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़कर नैतिक सार्वजनिक जीवन को बढ़ावा देता है।

    मुख्य भाग:

    नैतिक दृष्टिकोण: व्यक्तिगत चरित्र का आधार

    • नैतिक दृष्टिकोण समाजीकरण—परिवार, शिक्षा, धर्म और अनुभव, के माध्यम से विकसित होते हैं।
    • ये व्यक्तिगत व्यवहार, सत्यनिष्ठा, करुणा और दूसरों के प्रति सम्मान को नियंत्रित करते हैं।
    • एक नैतिक व्यक्ति प्रदर्शित करता है:
      • व्यक्तिगत व्यवहार में ईमानदारी
      • कमज़ोर लोगों के प्रति सहानुभूति
      • कार्यों में जवाबदेही
    • उदाहरण के लिये:
      • कोलकाता में बीमार और बेसहारा लोगों के प्रति मदर टेरेसा की आजीवन सेवा मानवीय गरिमा के प्रति गहरी सहानुभूति एवं नैतिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
      • ‘भारत के मेट्रो मैन’ के रूप में विख्यात ई. श्रीधरन ने बड़ी बुनियादी अवसंरचना परियोजनाओं के दौरान कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्तिगत और व्यावसायिक ईमानदारी बनाए रखा। उन्होंने राजनीतिक हस्तक्षेप को अस्वीकार किया और समयबद्ध तथा भ्रष्टाचार-मुक्त कार्य निष्पादन सुनिश्चित किया।

    राजनीतिक दृष्टिकोण: लोकतांत्रिक नागरिकता का सार

    • राजनीतिक दृष्टिकोण यह दर्शाते हैं कि व्यक्ति न्याय, शासन और नागरिक के रूप में अपनी भूमिका को किस रूप में देखते हैं।
    • एक नागरिक जो लोकतंत्र, बहुलवाद और संविधानवाद को महत्त्व देता है, वह जिम्मेदार नागरिक व्यवहार प्रदर्शित करता है।
    • सक्रिय राजनीतिक दृष्टिकोण में शामिल हैं:
      • संवैधानिक मूल्यों का सम्मान
      • लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भागीदारी
      • पारदर्शिता और न्याय की माँग
    • उदाहरण के लिये:
      • डॉ. बी.आर. अंबेडकर की न्याय और समानता के प्रति गहरी राजनीतिक प्रतिबद्धता जाति-आधारित भेदभाव के उनके व्यक्तिगत अनुभव से प्रेरित थी, जिसमें व्यक्तिगत नैतिकता और लोकतांत्रिक सक्रियता का संगम दिखाई देता है।

    अंतर्संबंध

    • नागरिक सद्गुण: जो व्यक्ति नैतिक रूप से दृढ़ होता है और उसकी राजनीतिक दृष्टि सकारात्मक होती है, वह सार्वजनिक हित में योगदान देता है। जैसे: एडवर्ड स्नोडन या भारत के सूचना के अधिकार (RTI) कार्यकर्त्ता इनका व्यक्तिगत साहस एवं नागरिक प्रतिबद्धता दोनों को दर्शाते हैं।
    • संवैधानिक नैतिकता: जब नागरिक स्वतंत्रता, समानता और धर्मनिरपेक्षता जैसे संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करते हैं, तो वे न केवल नैतिक चरित्र का प्रदर्शन करते हैं बल्कि राजनीतिक रूप से उत्तरदायी नागरिक भी बनते हैं।
    • राजनीति में अनैतिकता का प्रतिरोध: मज़बूत नैतिक आधार वाले नागरिक भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृतियों को चुनौती दे सकते हैं। उदाहरण के लिये, भारत में 1970 के दशक में ‘जे.पी आंदोलन’ अधिनायकवाद के विरुद्ध जनता के नैतिक आक्रोश से प्रेरित था।  
    • नैतिक मतदान व्यवहार: जब मतदाता संप्रदायवाद या संकीर्ण स्वार्थों के आधार पर मतदान करते हैं, तो यह नैतिक-राजनीतिक एकीकरण की कमज़ोरी को दर्शाता है। इसके विपरीत, नैतिक मतदाता समावेशी और विकासोन्मुख नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं।

    चुनौतियाँ

    • नैतिक सापेक्षवाद: बदलते मूल्य साझा सार्वजनिक नैतिकता को कमज़ोर कर सकते हैं।
    • राजनीतिक ध्रुवीकरण: सत्य की अपेक्षा विचारधारा के प्रति निष्ठा नैतिकता को नष्ट कर सकती है।
    • नागरिक शिक्षा में कमी: जागरूकता अथवा नागरिक बोध की कमी से लोग या तो बिना सोचे समझे सब कुछ मान लेते हैं या फिर बिल्कुल उदासीन हो जाते हैं।

    आगे की राह

    • मूल्य-आधारित नागरिक शिक्षा प्रारंभिक स्कूली शिक्षा से ही शुरू की जानी चाहिये।
    • नेताओं और संस्थाओं द्वारा आदर्श प्रस्तुत करने से नैतिक आचरण को बढ़ावा मिलना चाहिये।
    • संवैधानिक और नैतिक तर्क पर आधारित सार्वजनिक संवाद को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।

    निष्कर्ष:

    महात्मा गांधी, जिनका जीवन नैतिकता और राजनीति के मेल का प्रतीक था, यह मानते थे कि "नैतिकता से रहित राजनीति पाप है।" 

    इसलिये, एक नैतिक रूप से उत्तरदायी सार्वजनिक जीवन तभी विकसित हो सकता है जब नागरिक नैतिक मूल्यों से प्रेरित होकर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में कर्त्तव्य, न्याय और ईमानदारी की भावना के साथ सक्रिय भागीदारी करें। ऐसे में नैतिक दृष्टिकोण और राजनीतिक दृष्टिकोण एक न्यायपूर्ण समाज के अविभाज्य स्तंभ बन जाते हैं।

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