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30 Jul 2025
सामान्य अध्ययन पेपर 1
भूगोल
दिवस 39: "सहानुभूति कोई कमज़ोरी नहीं है, बल्कि वह शक्ति है जो किसी और के दृष्टिकोण से देखने की क्षमता देती है।" वंचितों को गरिमामयी और समावेशी सेवा-प्रदान सुनिश्चित करने में सहानुभूति एवं करुणा की भूमिका का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर
हल करने का दृष्टिकोण:
- सहानुभूति और करुणा को परिभाषित करते हुए, लोक सेवा में उनकी प्रासंगिकता की विवेचना कीजिये।
- सीमांत समुदायों पर ध्यान केंद्रित करते हुए सेवा वितरण में सहानुभूति और करुणा की भूमिका का वास्तविक जीवन के उदाहरणों, तर्कों एवं तथ्यों के साथ समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये।
- उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
सहानुभूति अर्थात् दूसरों की भावनाओं को समझने और साझा करने की क्षमता तथा करुणा अर्थात् दूसरों के कष्ट को दूर करने की इच्छा नैतिक शासन के लिये अनिवार्य गुण हैं। लोक सेवा में, विशेषकर वंचित समुदायों के संदर्भ में, ये गुण समावेशी और गरिमामय सेवा-वितरण सुनिश्चित करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। इन मूल्यों का पालन करने वाले लोक सेवक एक अधिक न्यायसंगत और समतामूलक समाज का निर्माण कर सकते हैं।
मुख्य भाग:
- लोक सेवा में सहानुभूति की भूमिका: सहानुभूति लोक सेवकों को सीमांत समूहों के संघर्षों से जुड़ने और उन्हें समझने में सक्षम बनाती है।
- यदि लोकसेवक समुदायों की स्थितियों को उनकी दृष्टि से देखें, तो वे उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं और चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
- उदाहरण के लिये, दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में नियुक्त लोक सेवक यदि पारंपरिक रीति-रिवाज़ों को समझते हैं, तो वे स्वास्थ्य, शिक्षा तथा भूमि अधिकारों से जुड़े मुद्दों को अधिक प्रभावी ढंग से सुलझा सकते हैं।
- करुणा और सेवा वितरण: केवल समझना ही करुणा नहीं है, बल्कि यह पीड़ाओं को दूर करने के लिये सक्रिय कार्रवाई की प्रेरणा देती है।
- जो लोक सेवक करुणा दिखाते हैं, वे वंचित व्यक्तियों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये सक्रिय कदम उठाते हैं।
- इसका एक प्रमुख उदाहरण आपदाग्रस्त क्षेत्रों में ज़िला मजिस्ट्रेट (DM) की भूमिका है, जो प्रभावित आबादी के प्रति सहानुभूति और करुणा से प्रेरित होकर समय पर राहत एवं सहायता सुनिश्चित करते हैं।
- समावेशी शासन में सहानुभूति: सीमांत समुदायों, जैसे: अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों के लिये, सहानुभूति के बिना सेवा वितरण अपवर्जन का कारण बन सकता है।
- शासन में करुणा यह सुनिश्चित करती है कि प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (MGNREGS) जैसी योजनाएँ कमज़ोर वर्गों की आवश्यकताओं के अनुरूप हों, जिससे उन्हें गरिमा के साथ आवश्यक सेवाओं तक पहुँच मिल सके।
- सीमांत समूहों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ: सीमांत समूहों को प्रायः प्रणालीगत भेदभाव, आर्थिक अभाव और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है।
- सहानुभूति से प्रेरित लोक सेवक संसाधनों और सेवाओं का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करके इन असमानताओं को दूर कर सकते हैं।
- उदाहरण के लिये, समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने 19वीं सदी के बंगाल में हाशिये पर रहने वाली महिलाओं को शिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया और यह प्रदर्शित किया कि किस प्रकार सहानुभूति सामाजिक परिवर्तन को गति दे सकती है।
- दयालु लोक सेवक: वर्ष 2018 में, छत्तीसगढ़ के IAS अधिकारी अवनीश शरण ने दूरस्थ क्षेत्रों के ग्रामीणों को चिकित्सीय सहायता प्रदान कर अत्यंत करुणा का परिचय दिया।
- उनकी यह पहल दर्शाती है कि करुणा यदि नवाचारी सोच के साथ जुड़ जाये, तो दुर्गम क्षेत्रों की गंभीर समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है।
- प्रशासनिक नैतिकता में सहानुभूति: लोक सेवकों (विशेष रूप से सत्ता के पदों पर आसीन) को नैतिक निर्णय लेने के लिये सहानुभूति और करुणा का अभ्यास करना चाहिये।
- ये गुण निर्णय लेने में पूर्वाग्रहों को दूर करने और सीमांत समूहों के लिये नीतियों में सुधार करने में सहायता करते हैं।
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), यदि सहानुभूति के साथ लागू की जाए, तो समाज के सबसे गरीब वर्गों के लिये खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है, इस प्रकार न्याय एवं निष्पक्षता की सरकार की ज़िम्मेदारी पूरी होती है।
निष्कर्ष:
संवेदनशीलता और करुणा इस बात में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं कि सीमांत समुदायों को सम्मानजनक और समावेशी सेवाएँ मिलें। लोक सेवकों के लिये ये गुण न केवल नैतिक निर्णय-निर्माण को सुदृढ़ बनाते हैं बल्कि सरकार और जनता के बीच विश्वास भी स्थापित करते हैं। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, यदि लोक सेवा की नींव संवेदनशीलता पर आधारित हो, तो यह कमज़ोर वर्गों के लिये स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।