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25 Jul 2025
सामान्य अध्ययन पेपर 3
आंतरिक सुरक्षा
दिवस 35: “सामुदायिक सहभागिता कट्टरपंथ के विरुद्ध रक्षा की पहली पंक्ति है।” आतंकवाद की रोकथाम में शिक्षा, नागरिक समाज और स्थानीय शासन की भूमिका का आकलन कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर
हल करने का दृष्टिकोण:
- कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे और ज़मीनी स्तर पर सहभागिता के महत्त्व की संक्षेप में व्याख्या कीजिये।
- आतंकवाद की रोकथाम में शिक्षा, नागरिक समाज और स्थानीय शासन की भूमिका का आकलन कीजिये।
- आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
उग्रपंथी/कट्टरपंथी विचारधारा, जो प्रायः आतंकवाद का प्रारंभिक चरण होती है, अलगाव, गलत सूचना और सामाजिक बहिष्कार जैसी स्थितियों में पनपती है। हालाँकि राज्य की सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिये समुदाय आधारित भागीदारी अधिक प्रभावशाली और सतत् उपाय प्रदान करती है। शिक्षा, नागरिक समाज एवं स्थानीय शासन ऐसे प्रथम स्तर के माध्यम हैं जो उग्र विचारों के आरंभिक संकेतों की पहचान करने और उनका समाधान करने, उन्हें सही दिशा में लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये तत्त्व समाज को भीतर से मज़बूत बनाते हैं और चरमपंथ के विरुद्ध दीर्घकालिक प्रतिरोध क्षमता का निर्माण करते हैं।
मुख्य भाग:
शिक्षा की भूमिका: शिक्षा समालोचनात्मक सोच और भावनात्मक बुद्धिमत्ता के निर्माण में एक परिवर्तनकारी भूमिका निभाती है।
- मूल्य-आधारित शिक्षा बहुलवाद, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देती है।
- UNESCO की वैश्विक नागरिकता शिक्षा (GCED) विविधता और सामाजिक न्याय के प्रति सम्मान को प्रोत्साहित करती है।
- भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 समग्र विकास और समावेशन पर ज़ोर देती है।
- स्कूल और कॉलेज कमज़ोर युवाओं की पहचान कर सकते हैं तथा उन्हें मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान कर सकते हैं।
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना जैसे कौशल विकास कार्यक्रम, युवा बेरोज़गारी से निपटने में सहायता करते हैं, जो चरमपंथियों की भर्ती का एक प्रमुख कारण है।
नागरिक समाज की भूमिका: नागरिक समाज विश्वास का निर्माण करता है, संवाद को बढ़ावा देता है और प्रति-आख्यान प्रदान करता है।
- ‘फाउंडेशन फॉर सोशल एम्पावरमेंट’ जैसे गैर-सरकारी संगठन, डिजिटल साक्षरता और भावनात्मक दृढ़ता को बढ़ावा देने के लिये कश्मीर में जोखिमग्रस्त युवाओं के साथ काम करते हैं।
- ‘सर्व धर्म संसद’ जैसे अंतर्धार्मिक संवाद मंच, धार्मिक ध्रुवीकरण से निपटने में सहायता करते हैं।
- वैश्विक आतंकवाद निरोधक मंच के अनुसार, समुदाय-नेतृत्व वाले कट्टरपंथ-विरोधी कार्यक्रमों की सफलता दर विशुद्ध रूप से सुरक्षा-आधारित उपायों की तुलना में 20-30% अधिक होती है।
- युवा क्लब, कला और खेल कार्यक्रम सीमांत समुदाय के लोगों को सकारात्मक पहचान के अवसर प्रदान करते हैं।
- जम्मू और कश्मीर में ‘हम बात करेंगे’ पहल, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करने और चरमपंथियों के आकर्षण को कम करने के लिये सांस्कृतिक उत्सवों एवं वाद-विवादों का आयोजन करती है।
स्थानीय शासन की भूमिका: स्थानीय सरकारें ज़मीनी स्तर की गतिशीलता को समझने में सबसे बेहतर स्थिति में हैं।
- मुंबई और हैदराबाद जैसे शहरों में कम्युनिटी पुलिसिंग मॉडल ने सांप्रदायिक तनावों को रोकने में सहायता की है।
- महाराष्ट्र में मोहल्ला समितियाँ पुलिस और समुदायों के बीच अविश्वास को कम करने में प्रभावी रही हैं।
- शहरी स्थानीय निकाय और पंचायतें कल्याणकारी योजनाओं का अंतिम बिंदु तक वितरण सुनिश्चित कर सकती हैं, जिससे सामाजिक-आर्थिक अलगाव कम हो सकता है।
- शिकायत निवारण और ब्लॉक-स्तरीय जागरूकता शिविर युवाओं को ऑनलाइन दुष्प्रचार का शिकार होने से रोक सकते हैं।
- बेंगलुरु में, BBMP ने शहरी झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले युवाओं के लिये नागरिक कार्यशालाओं और डिजिटल जागरूकता सत्रों का आयोजन करने की दिशा में गैर-सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी की।
निष्कर्ष:
कट्टरता (Radicalization) का प्रभावी रूप से मुकाबला करने के लिये भारत को केवल सुरक्षा-आधारित दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रहना चाहिये, बल्कि उसे एक समग्र सामाजिक रणनीति अपनानी चाहिये जो संविधानिक मूल्यों, अंतर्धार्मिक संवाद और स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी पर आधारित हो। ऐसा करने से न केवल उग्रवाद को रोका जा सकता है, बल्कि राष्ट्र की नैतिक संरचना को भी मज़बूती मिलती है।