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Mains Marathon

  • 05 Aug 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    दिवस- 44:  “नैतिक दुविधा तब उत्पन्न होती है जब मूल्यों के बीच टकराव होता है, न कि तब जब मूल्य अनुपस्थित हों।” शासन में पारदर्शिता और गोपनीयता जैसे प्रतिस्पर्द्धी मूल्यों के संदर्भ में इस कथन की विवेचना कीजिये। (150 शब्द)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • नैतिक दुविधा क्या है, इसकी संक्षिप्त व्याख्या से शुरुआत कीजिये।
    • पारदर्शिता और गोपनीयता जैसे प्रतिस्पर्द्धी मूल्यों के संदर्भ में इस पर चर्चा कीजिये।
    • समाधान के तरीके सुझाएँ।
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    नैतिक दुविधा तब उत्पन्न होती है जब दो या दो से अधिक नैतिक मूल्य या सिद्धांत परस्पर विरोधी होते हैं, जिससे सही कार्य-पद्धति का निर्धारण कठिन हो जाता है। यह नैतिक शून्यता की स्थिति नहीं, बल्कि मूल्य संघर्ष की स्थिति है, विशेष रूप से शासन में जहाँ पारदर्शिता, गोपनीयता, जनहित और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मूल्य प्राय: एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।

    मुख्य भाग:

    मूल्य संघर्ष को समझना

    • पारदर्शिता: लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिये यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है कि जनता की सरकारी कार्यों और निर्णयों तक पहुँच हो।
    • गोपनीयता: राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीति, आंतरिक विचार-विमर्श या व्यक्तिगत गोपनीयता से संबंधित संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा के लिये आवश्यक।

    कार्रवाई में नैतिक दुविधा

    • व्हिसलब्लोअर बनाम आधिकारिक गोपनीयता:
      • एक लोक सेवक ने रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया, जिसमें पारदर्शिता और जवाबदेही का हवाला दिया गया।
      • हालाँकि, इस खुलासे में गोपनीय दस्तावेज़ शामिल हो सकते हैं, जिससे आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत गोपनीयता भंग हो सकती है।
        • राफेल सौदे के विवाद ने रक्षा मामलों में पारदर्शिता बनाम गोपनीयता पर सवाल खड़े कर दिये हैं।
    • RTI और व्यक्तिगत जानकारी:
      • सूचना का अधिकार अधिनियम (2005) नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है।
      • हालाँकि, धारा 8(1)(j) व्यक्तिगत जानकारी से छूट प्रदान करती है, जिससे गोपनीयता और निजता की रक्षा होती है।
        • RTI के तहत लोक सेवकों के कार्य-निष्पादन मूल्यांकन का खुलासा प्राय: गोपनीयता के आधार पर अस्वीकार कर दिया जाता है।
    • आंतरिक विचार-विमर्श बनाम सार्वजनिक प्रकटीकरण:
      • नीति निर्माण के दौरान, विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करने के लिये आंतरिक चर्चाओं को गोपनीय रखा जाता है।
      • जनता की पारदर्शिता की माँग के बावजूद, समय से पहले प्रकटीकरण निर्णय लेने की प्रक्रिया को कमज़ोर कर सकता है।

    समाधान तंत्र

    • अनुपातिकता का सिद्धांत: किसी एक मूल्य (जैसे गोपनीयता) के हनन से होने वाले नुकसान का आकलन, दूसरे मूल्य (जैसे पारदर्शिता) को बनाए रखने से मिलने वाले लाभ के संदर्भ में किया जाना चाहिये।
    • आचार संहिता एवं विधिक सुरक्षा: सिविल सेवाओं और सार्वजनिक संस्थानों को सिविल सेवा आचरण नियम, सूचना का अधिकार (RTI) दिशानिर्देश और व्हिसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम जैसे ढाँचों का पालन करना चाहिये, जो मूल्य संघर्षों से निपटने में सहायता करते हैं।

    निष्कर्ष:

    नैतिक दुविधा के अंतर्गत निर्णय संदर्भ, उद्देश्य और जनहित का मूल्यांकन करके, कांटीय नैतिकता (कर्त्तव्य-बद्ध कार्य) तथा उपयोगितावाद (सर्वोच्च हित) के अनुरूप लिये जाने चाहिये। दुविधाओं से निपटने के लिये नैतिक परिपक्वता, संदर्भगत समझ और एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है जो संवेदनशील ज़िम्मेदारियों से समझौता किये बिना लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखे।

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