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05 Aug 2025
सामान्य अध्ययन पेपर 4
सैद्धांतिक प्रश्न
दिवस-44: “व्यावसायिक नैतिकता में, अंशधारकों की तुलना में हितधारक अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।” आधुनिक निगमित प्रशासन में 'अंशधारक प्रधानता' से 'हितधारक कल्याण' की ओर हो रहे नैतिक परिवर्तन का मूल्यांकन कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर
हल करने का दृष्टिकोण:
- अंशधारक प्रधानता और हितधारक कल्याण की अवधारणा का संक्षेप में परिचय दीजिये।
- आधुनिक निगमित प्रशासन में अंशधारक प्रधानता से हितधारक कल्याण की ओर नैतिक परिवर्तन का मूल्यांकन कीजिये।
- आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
परंपरागत रूप से निगमों /कंपनियों को मुख्यतः अपने अंशधारकों के प्रति जवाबदेह माना जाता था, और उनका उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना होता था, जिसे 'अंशधारक प्रधानता' कहा जाता है। हालाँकि, आधुनिक व्यावसायिक नैतिकता में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है, जिसमें सभी हितधारकों के कल्याण पर बल दिया जाता है। इसके तहत कर्मचारियों, उपभोक्ताओं, समुदायों एवं पर्यावरण सहित उन सभी पक्षों के प्रति कंपनियों की नैतिक ज़िम्मेदारी मानी जाती है जो उनके कार्यों से प्रभावित होते हैं।
मुख्य भाग:
नैतिक परिवर्तन का अध्ययन: अंशधारक प्रधानता से हितधारक कल्याण की ओर
- आर. एडवर्ड फ्रीमैन द्वारा प्रतिपादित हितधारक मॉडल का तर्क है कि व्यवसाय संबंधों के संजाल में संचालित होते हैं और दीर्घकालिक सफलता विविध हितों के संतुलन पर निर्भर करती है।
- अंशधारक प्रधानता के संकीर्ण वित्तीय फोकस के विपरीत, हितधारक सिद्धांत सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरणीय संधारणीयता और नैतिक शासन को कॉर्पोरेट रणनीति में एकीकृत करता है।
- इस परिवर्तन के नैतिक आधारों में शामिल हैं:
- उपयोगितावाद - केवल लाभ ही नहीं, बल्कि समग्र कल्याण को अधिकतम करना।
- कर्त्तव्यनिष्ठ नैतिकता - प्रभावित सभी लोगों के प्रति कर्त्तव्यों का अभिनिर्धारण।
- निष्पक्षता के रूप में न्याय - कमज़ोर हितधारकों के लिये समान व्यवहार सुनिश्चित करना।
हितधारक-केंद्रित शासन के वास्तविक उदाहरण
- टाटा समूह (भारत): व्यावसायिक विकास के साथ-साथ कर्मचारी कल्याण, सामुदायिक विकास और परोपकार को प्राथमिकता देने के लिये जाना जाता है, जो विश्वास पर आधारित नैतिक नेतृत्व का उदाहरण है।
- यूनीलीवर की सतत् जीवन योजना: व्यावसायिक लक्ष्यों को सामाजिक कल्याण के साथ संरेखित करते हुए, सतत् स्रोतों से आपूर्ति सुनिश्चित करना, पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार को लक्षित किया जाता है।
- इन्फोसिस: कर्मचारी कौशल विकास, नैतिक पारदर्शिता और डेटा प्राइवेसी पर ज़ोर देती है, जो मज़बूत हितधारक जुड़ाव को दर्शाती है।
नैतिक परिवर्तन के कारण
- जलवायु परिवर्तन, असमानता और कॉर्पोरेट घोटालों ने लाभ-केंद्रित मॉडलों की सीमाओं को उजागर कर दिया है।
- उपभोक्ता और निवेशक अब ESG (पर्यावरण, सामाजिक, शासन) अनुपालन एवं नैतिक ब्रांडिंग की मांग करते हैं।
- हितधारक कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने वाली कंपनियाँ दीर्घकालिक संवहनीयता, बेहतर कर्मचारी प्रतिधारण और उपभोक्ता के प्रति निष्ठा को प्राथमिकता देती हैं।
व्यवहार में चुनौतियाँ
- हितधारक प्रभाव का आकलन वित्तीय प्रतिफल से कहीं अधिक जटिल है।
- अल्पकालिक लाभ और दीर्घकालिक नैतिक लक्ष्यों के बीच हितों के टकराव की संभावना बनी रहती है।
- केवल दिखावे के लिये नैतिकता अपनाने (एथिक्स-वॉशिंग) का जोखिम भी होता है, जिससे वास्तविक बदलाव नहीं हो पाता।
निष्कर्ष:
आधुनिक नैतिक परिदृश्य में निगमित प्रशासन को केवल लाभ-केंद्रित मॉडल से आगे बढ़कर एक उद्देश्य-प्रधान दृष्टिकोण अपनाना चाहिये, जिसमें मूल्य सृजन सबके साथ साझा हो और व्यवसाय नैतिक सिद्धांतों के अनुरूप संचालित हों। हितधारकों के कल्याण को प्राथमिकता देकर व्यवसाय गरिमा, न्याय एवं पारस्परिक सम्मान को बनाए रखते हैं, जो कांट के नैतिक दर्शन के मूल तत्त्व हैं।