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Mains Marathon

  • 01 Aug 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़

    दिवस 41- 

    आप मध्य भारत के एक खनिज-समृद्ध क्षेत्र के ज़िलाधिकारी हैं। आपके ज़िले में बॉक्साइट की बड़ी मात्रा में उपलब्धता को देखते हुए खनिज मंत्रालय ने एक विशाल खनन परियोजना को स्वीकृति दी है। इस परियोजना का उद्देश्य स्थानीय युवाओं के लिये रोज़गार, राज्य के लिये राजस्व तथा बुनियादी अवसंरचना का विकास सुनिश्चित करना है। यह परियोजना एक प्रमुख बहुराष्ट्रीय निगम द्वारा समर्थित है और इसे राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर राजनीतिक समर्थन प्राप्त है।

    किंतु प्रस्तावित खनन क्षेत्र जैव-विविधता से परिपूर्ण एक वन-क्षेत्र में आता है जहाँ जनजातीय समुदाय निवास करते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों ने वनों की कटाई, जलस्रोतों के संदूषण तथा दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय क्षति को लेकर चिंता जताई है। स्थानीय जनजातीय नेता शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि उन्हें रोज़गार और संस्कृति से वंचित होने तथा विस्थापन का भय है।

    कंपनी को प्रारंभिक स्वीकृतियाँ प्राप्त हो चुकी हैं, परंतु अंतिम पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) तथा सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया अभी शेष है। आपको EIA प्रक्रिया की देखरेख और पारदर्शिता एवं निष्पक्षता सुनिश्चित करने का कार्य सौंपा गया है। इसी बीच, उच्चाधिकारियों से दबाव है कि आप ‘राष्ट्रीय हित’ में अनुमोदन की प्रक्रिया को शीघ्रता से पूर्ण करें। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने अनौपचारिक रूप से यह भी संकेत दिया है कि यदि आप परियोजना में ‘अवरोध’ उत्पन्न करते हैं तो आपकी भावी नियुक्तियाँ आपके निर्णयों से प्रभावित हो सकती हैं।

    1. इस परिस्थिति में विकासात्मक लक्ष्यों और पर्यावरणीय न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने में आपको किन नैतिक दुविधाओं का सामना करना पड़ता है?
    2. लंबित पर्यावरणीय स्वीकृतियों और जनसुनवाई की प्रक्रिया को लेकर आपकी तात्कालिक कार्ययोजना क्या होनी चाहिये?
    3. आप किस प्रकार सुनिश्चित करेंगे कि वंचित समुदायों की आवाज़ सुनी जाये, साथ ही राज्य के विकासात्मक लक्ष्यों की उपेक्षा भी न हो?
    4. कौन-से संवैधानिक प्रावधान, पर्यावरणीय नैतिकता और सहभागी शासन के सिद्धांत आपके निर्णयों का मार्गदर्शन करेंगे?  (250 शब्द)
    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • संदर्भ स्थापित करने के लिये स्थिति का संक्षेप में परिचय दीजिये।
    • इसमें शामिल नैतिक दुविधाओं का अभिनिर्धारण कीजिये।
    • अपनी तात्कालिक कार्ययोजना का उल्लेख कीजिये।
    • वंचित समुदायों की आवाज़ और विकासात्मक लक्ष्यों के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिये।
    • अंतर्निहित नैतिक और संवैधानिक कार्यढाँचे का वर्णन कीजिये।
    • किसी नैतिक विचारक या नैतिक सिद्धांत के उद्धरण के साथ उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    एक खनिज-समृद्ध क्षेत्र के ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में मुझे एक नैतिक द्वंद्व का सामना करना पड़ रहा है, जहाँ एक बड़े बॉक्साइट खनन परियोजना की आर्थिक संभावनाओं और इसके कारण जनजातीय समुदायों एवं पर्यावरण पर पड़ने वाले सामाजिक-पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के बीच संतुलन स्थापित करने चुनौतीपूर्ण है। यह स्थिति मुझे कानून, जनहित, पर्यावरण और उच्चाधिकारियों के प्रति अपने दायित्वों के बीच जटिल नैतिक दुविधा में डालती है।

    मुख्य भाग:

    A. नैतिक दुविधाएँ

    • विकास बनाम पर्यावरणीय न्याय: यह परियोजना आर्थिक विकास, रोज़गार और बुनियादी अवसंरचना का वादा करती है, लेकिन वनों की कटाई, जल प्रदूषण एवं जैवविविधता के ह्रास का जोखिम भी उठाती है।
    • जनजातीय अधिकार बनाम कॉर्पोरेट हित: जनजातीय समुदायों को विस्थापन, आजीविका के नुकसान और सांस्कृतिक क्षरण का डर है। यह परियोजना PESA अधिनियम के तहत उनके संवैधानिक संरक्षण और वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन कर सकती है।
    • ईमानदारी बनाम कॅरियर का दबाव: एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा परियोजना में विलंब न करने की परोक्ष चेतावनी, संवैधानिक मूल्यों और व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा के प्रति मेरी प्रतिबद्धता को चुनौती देती है।
    • प्रक्रियात्मक नैतिकता बनाम सुविधा: कंपनी को प्रारंभिक मंज़ूरी मिल गई है, लेकिन पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और सार्वजनिक परामर्श लंबित हैं। प्रक्रिया में तेज़ी लाने से कानूनी और नैतिक मानदंडों से समझौता होता है।

    B. तत्काल नैतिक कार्य योजना

    • प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करना: मुझे यह सुनिश्चित करना चाहिये कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) की प्रक्रिया मान्यता प्राप्त एजेंसियों द्वारा स्वतंत्र, पारदर्शी और सख्ती से किया जाए।
    • सार्थक सार्वजनिक परामर्श को सुगम बनाना: मुझे यह सुनिश्चित करना चाहिये कि ग्राम सभा परामर्श स्थानीय भाषाओं में और जनजातीय समुदायों के लिये सुलभ प्रारूपों में आयोजित किये जाएँ। कमज़ोर समूहों की आवाज़ को अंतिम निर्णयों को आकार देना चाहिये।
    • दस्तावेज़ और रिपोर्ट का दबाव: अनौपचारिक रूप से उचित प्रक्रिया को प्रभावित करने के किसी भी प्रयास को संस्थागत माध्यमों से गोपनीय रूप से नोट किया जाना चाहिये और रिपोर्ट किया जाना चाहिये।
    • तटस्थ विशेषज्ञों को शामिल करें: पर्यावरण वैज्ञानिकों, नृविज्ञानियों और स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों को प्रभावों का आकलन करने तथा स्थायी विकल्प सुझाने के लिये आमंत्रित किया जाना चाहिये।

    C. जनजातीय समुदायों की अपेक्षाओं की पूर्ति और विकास संतुलन सुनिश्चित करना

    • सहभागी शासन: PESA-अधिदेशित ग्राम सभाओं के माध्यम से, जनजातीय समुदायों को भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास पर निर्णय लेने के लिये सशक्त बनाया जाना चाहिये।
    • सतत् विकास विकल्प: यदि परियोजना आगे बढ़ती है, तो न्यूनतम विस्थापन, आजीविका सहायता और कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (CSR) द्वारा संचालित शिक्षा एवं स्वास्थ्य पहलों पर बल देना चाहिये।
    • पुनर्वास और मुआवज़ा: उचित मुआवज़ा, ज़मीन के बदले ज़मीन के विकल्प और सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण का प्रस्ताव किया जाना चाहिये।

    D. नैतिक और संवैधानिक ढाँचा

    • अनुच्छेद 21: जीवन के अधिकार में स्वस्थ पर्यावरण शामिल है।
    • अनुच्छेद 48A और 51A(g): पर्यावरण संरक्षण का अधिदेश।
    • पाँचवीं अनुसूची और PESA अधिनियम: जनजातीय स्वशासन को बनाए रखना।
    • लोक सेवकों के लिये आचार संहिता: सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और जनहित को बनाए रखना।
    • अंतर-पीढ़ीगत समता सिद्धांत: पर्यावरणीय नैतिकता का मूल।

    निष्कर्ष:

    जैसा कि गांधीजी ने कहा था, “पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है, लेकिन हर व्यक्ति के लोभ को नहीं।” एक लोक सेवक के रूप में मेरा कर्त्तव्य है कि आर्थिक विकास ऐसा न हो जिससे प्रकृति को अपूरणीय क्षति पहुँचे या वंचित समुदायों के अधिकारों का हनन हो। प्रत्येक निर्णय निष्पक्षता, पारदर्शिता और दीर्घकालिक संधारणीयता पर आधारित होना चाहिये, न कि तात्कालिक राजनीतिक या कॉर्पोरेट लाभ पर।

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