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Mains Marathon

  • 05 Aug 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    दिवस-44:  “भ्रष्टाचार केवल सत्ता का दुरुपयोग नहीं है, बल्कि विश्वासघात भी है।" इस कथन के आलोक में मूल्यांकन कीजिये कि भ्रष्टाचार किस प्रकार संस्थागत नैतिकता और शासन में जनविश्वास को क्षीण करता है। (150 शब्द)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोण 

    • भ्रष्टाचार की प्रकृति और प्रभाव पर एक संक्षिप्त व्याख्या के साथ शुरुआत कीजिये।
    • आकलन कीजिये कि भ्रष्टाचार किस प्रकार संस्थागत नैतिकता और शासन में जनविश्वास को क्षीण करता है।
    • पारदर्शिता और गोपनीयता जैसे प्रतिस्पर्द्धी मूल्यों के संदर्भ में इस पर चर्चा कीजिये।
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    भ्रष्टाचार केवल शक्ति के दुरुपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन निहित विश्वासों के साथ विश्वासघात है जो नागरिक सार्वजनिक संस्थानों में रखते हैं। जब लोक सेवक या जनप्रतिनिधि अपने पद का दुरुपयोग निजी लाभ के लिये करते हैं, तो वे न केवल विधि शासन को कमज़ोर करते हैं, बल्कि शासन की नैतिक आधार को भी क्षति पहुँचाते हैं। यह न केवल संस्थागत अखंडता को बल्कि राज्य के प्रति जनता के विश्वास को भी कमज़ोर करता है।

    मुख्य भाग:

    संस्थागत अखंडता का ह्रास: संस्थागत अखंडता से तात्पर्य संस्थानों द्वारा अपने मूल मूल्यों पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही के प्रति निष्ठा से है। भ्रष्टाचार इन स्तंभों को कमज़ोर करता है:

    • विधि शासन को कमज़ोर करना: जब रिश्वत और पक्षपात निर्णयों को निर्धारित करते हैं, तो विधि चयनात्मक रूप से पालन किया जाता है।
      • इसका उदाहरण मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले में देखा गया, जहाँ सरकारी नौकरियों में धोखाधड़ी से भर्ती ने योग्यता-आधारित प्रणाली (मेरिटोक्रेसी) को नष्ट कर दिया।
    • नीतियों में हेरफेर: संस्थान जनता के बजाय स्वार्थी हितों की सेवा करने लगते हैं।
      • कोयला आवंटन घोटाले में, कोयला ब्लॉकों का विवेकाधीन आवंटन पारदर्शी नीलामी को दरकिनार करते हुए किया गया, जिससे राजकोष को भारी नुकसान हुआ।
    • दक्षता में कमी: भ्रष्टाचार से लागत बढ़ जाती है, गुणवत्ता घट जाती है और कार्य में देरी होती है।
      • उदाहरण के लिये, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले (2010) में कृत्रिम रूप से बढ़ाए गए ठेके और निगरानी के अभाव के कारण निम्न-स्तरीय बुनियादी ढाँचा तैयार हुआ, जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।

    जनविश्वास की हानि: विश्वास लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला है। भ्रष्टाचार कई तरीकों से इस विश्वास को क्षीण करता है:

    • नागरिकों का विमुख होना: जब लोग व्यवस्था को पक्षपातपूर्ण या अन्यायपूर्ण मानते हैं, तो उनका विश्वास उठ जाता है और वे नागरिक भागीदारी से पीछे हट जाते हैं।
    • प्रदर्शन और असंतोष: भ्रष्टाचार जनाक्रोश और आंदोलनों को जन्म देता है।
      • अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में वर्ष 2011 का इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन, गैर-जवाबदेह शासन के खिलाफ जन असंतोष का प्रतीक बना और लोकपाल की मांग को बल मिला।
    • कल्याणकारी योजनाओं को कमज़ोर करना: PDS, MGNREGA और स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं में संसाधनों में होने वाले रिसाव से वंचित वर्ग अपने हक से वंचित रह जाते है, परिणामस्वरूप सामाजिक असमानता और बढ़ जाती है।

    निष्कर्ष:

    भ्रष्टाचार न केवल वित्तीय संसाधनों को नष्ट करता है, बल्कि नैतिक मूल्यों को भी नष्ट करता है, संस्थाओं को कमज़ोर करता है और नागरिकों को अलग-थलग कर देता है। जनता का विश्वास बहाल करने के लिये  व्यवस्थागत सुधारों, पारदर्शिता तंत्र और अखंडता की संस्कृति की आवश्यकता है। जैसा कि द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने सही ही कहा है, नैतिक शासन न केवल विकास के लिये, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता और अस्तित्व के लिये भी आवश्यक है।

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