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भारतीय अर्थव्यवस्था

देश-देशांतर: मौद्रिक नीति

  • 09 Jun 2018
  • 17 min read

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

हाल ही में 6 जून को भारतीय रिज़र्व बैंक ने वर्तमान वित्त वर्ष की दूसरी मौद्रिक नीति की द्विमासिक समीक्षा में रेपो रेट में बढ़ोतरी कर दी। मौद्रिक नीति समिति द्वारा इसमें 25 आधार अंकों (Basis Point) की वृद्धि के बाद रेपो रेट अब 6% से बढ़कर 6.25% हो गया है। इस सरकार के 4 साल के कार्यकाल में पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी की गई है। इससे पहले 28 जनवरी, 2014 को रेपो दर में वृद्धि की गई थी, तब रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 8% किया गया था।

  • पहले मौद्रिक नीति समीक्षा करने का अंतराल अधिक था, लेकिन आर्थिक सुधारों के बाद जैसे-जैसे भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनता गया, पहले इसे छह महीने और उसके बाद तीन महीने पर लाया गया और अब यह समीक्षा प्रत्येक दो महीने बाद की जाती है।

क्यों बढ़ाया रेपो रेट?

  • फिलहाल वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने से देश में रोज़मर्रा की चीज़ों की महँगाई (मुद्रास्फीति) बढ़ने के मद्देनज़र रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट में यह वृद्धि की है। 
  • इसके अलावा घरेलू मांग में हो रही बढोतरी भी इसका एक कारण बताया जा रहा है।
  • समीक्षा में कहा गया है कि कच्चे तेल के दाम में हाल के दिनों में जो हलचल देखने को मिल रही है, उससे मुद्रास्फीति परिदृश्य को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न हुई है और यह अनिश्चितता इसमें वृद्धि और गिरावट दोनों को लेकर है।
  • मुद्रास्फीति बढ़ने का सामान्य अर्थ है वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में वृद्धि के कारण अधिक क्रय शक्ति के बावजूद लोगों द्वारा पूर्व की तुलना में वर्तमान में कम वस्तुओं एवं सेवाओं का उपभोग कर पाना। 
  • बैंकों को अपने रोज़मर्रा के काम-काज़ के लिये अक्सर बड़ी रकम की ज़रूरत होती है। बैंक इसके लिये रिज़र्व बैंक से अल्पकाल के लिये कर्ज़ लेते हैं और इस कर्ज़ पर रिज़र्व बैंक को उन्हें जिस दर से ब्याज देना पड़ता है, उसे रेपो रेट कहते हैं।
  • रेपो रेट जब कम होता है तो बैंकों के लिये रिज़र्व बैंक से कर्ज़ लेना सस्ता हो जाता है और तभी बैंक ग्राहकों को दिये जाने वाले क़र्ज़ की ब्याज दरों में भी कटौती करते हैं, ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा धनराशि बतौर कर्ज़ दी जा सके। 
  • जब बाज़ार में ऐसी स्थिति बनती है तो बढ़ती हुई मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखने के लिये पैसे को अपनी तरफ खींच लेने का काम रिज़र्व बैंक का है और इसके लिये वह रेपो दर बढ़ा देता है, जिससे बैंकों के लिये कर्ज़ लेना महँगा हो जाता है। इसके बाद बैंक भी अपनी ब्याज दरों को बढ़ा देते हैं ताकि लोग कर्ज़ कम लें और मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहे।

हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा के प्रमुख बिंदु

  • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल में तेज़ी से बढ़कर 4.6% पर पहुँच गई। खाद्य तथा ईंधन को छोड़कर अन्य समूहों में तीव्र वृद्धि का इसमें अधिक योगदान रहा।
  • इसी वज़ह से नीतिगत रेपो रेट में 0.25% की वृद्धि कर इसे 6.25% कर दिया गया है, जिससे बैंक से कर्ज़ लेना महँगा हो गया है।
  • इसी प्रकार रिवर्स रेपो रेट में भी 0.25% की वृद्धि की गई है और यह अब 6% हो गई है तथा बैंक दर 6.50% है। 
  • सीआरआर में कोई बदलाव नहीं किया गया है तथा यह पूर्व की तरह 4% पर बना हुआ है।  
  • समीक्षा में चालू वित्त वर्ष के लिये आर्थिक विकास दर का अनुमान 7.4% पर पूर्ववत बनाए रखा गया है।
  • चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही के लिये खुदरा मुद्रास्फीति अनुमान को बढ़ाकर 4.8-4.9% कर दिया गया है, जबकि वर्ष की दूसरी छमाही के लिये इसे 4.7% रखा गया है। 
  • रिज़र्व बैंक के मुद्रास्फीति के इस अनुमान में केंद्र सरकार के कर्मचारियों को मिलने वाले बढ़े महँगाई भत्ते का असर भी शामिल है।
  • महँगाई बढ़ने का एक बड़ा कारण पिछले दो माह में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में 12% की तेज़ी आना भी है।
  • इसके अलावा, रिज़र्व बैंक ने शहरी सहकारी बैंकों को स्वेच्छा के आधार पर लघु वित्तीय बैंकों का दर्जा देने का भी निर्णय किया है।

भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन 

  • मई 2016 में भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 को संशोधित किया गया, ताकि लचीले मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण ढाँचे के कार्यान्वयन को सांविधिक आधार प्रदान किया जा सके। 
  • इस संशोधित कानून में रिज़र्व बैंक के परामर्श से प्रत्येक पाँच वर्ष में एक बार भारत सरकार द्वारा मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करने का प्रावधान भी किया गया है। 
  • केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2016 से 31 मार्च 2021 तक की अवधि के लिये इस लक्ष्य के रूप में 4% उपभोक्ता मूल्य सूचकांक निर्धारित किया है, जिसमें ±2% का उतार-चढाव हो सकता है अर्थात् अधिकतम 6% और न्यूनतम 2%।
  • रिज़र्व बैंक के गवर्नर की अध्यक्षता वाली 6-सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति यदि लगातार तीन तिमाहियों तक उपरोक्त लक्ष्य प्राप्त करने में असफल रहती है तो उसे भी असफल मान लिया जाएगा।

मौद्रिक नीति समिति क्या है?

  • केंद्र सरकार द्वारा धारा 45ZB के तहत गठित मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee-MPC) मुद्रास्फीति लक्ष्य को हासिल करने के लिये आवश्यक नीतिगत ब्याज दर निर्धारित करती है। पहले यह काम रिज़र्व बैंक के गवर्नर द्वारा किया जाता था। 
  • रिज़र्व बैंक का मौद्रिक नीति विभाग मौद्रिक नीति निर्माण में इस समिति की सहायता करता है तथा अर्थव्यवस्था के सभी हितधारकों के विचारों और रिज़र्व बैंक के विश्लेषणात्मक कार्य से नीतिगत रेपो दर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में योगदान करता है। 

(टीम दृष्टि इनपुट)

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक क्या है?

  • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index-CPI) घरेलू उपभोक्ताओं द्वारा खरीदी गई वस्तुओं एवं सेवाओं (Goods & Services) के औसत मूल्य को मापने वाला एक सूचकांक है।
  • उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की गणना वस्तुओं एवं सेवाओं के एक मानक समूह के औसत मूल्य की गणना करके की जाती है।
  • वस्तुओं एवं सेवाओं का यह मानक समूह एक औसत शहरी उपभोक्ता द्वारा खरीदी जाने वाली वस्तुओं का समूह होता है।

मौद्रिक नीति के उद्देश्य 

  • मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य आर्थिक वृद्धि को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, क्योंकि मूल्य स्थिरता संधारणीय विकास की अनिवार्य शर्त है।
  • किसी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के अधिक होने का अर्थ है आवश्यक चीज़ों के दामों में बढ़ोतरी। यह इस बात का संकेतक होता है कि महँगाई तेज़ी से बढ़ रही है। 
  • मुद्रास्फीति में कमी लाने के लिये मौद्रिक नीति में सबसे महत्त्वपूर्ण है रेपो रेट । यदि रिज़र्व बैंक चाहता है कि बाज़ार में पैसे की आपूर्ति और तरलता बढ़े तो वह बैंक रेट को कम कर देता है।
  • यदि बाज़ार में पैसे की आपूर्ति और तरलता कम करनी है तो वह रेपो रेट को बढ़ा देता है। मुद्रास्फीति बढ़ने पर केंद्रीय बैंक सामान्यतः रेपो रेट बढ़ा देता है और मुद्रास्फीति घटने पर कम कर देता है।
  • कह सकते हैं कि मौद्रिक नीति एक प्रकार का अस्त्र है, जिसके आधार पर बाज़ार में मुद्रा की आपूर्ति को नियंत्रित किया जाता है। मौद्रिक नीति ही यह तय करती है कि रिज़र्व बैंक किस दर पर बैंकों को क़र्ज़ देगा और किस दर पर उन बैंकों से पैसा वापस लेगा।

मौद्रिक नीति के प्रमुख घटक

रेपो दर (Repo Rate): वह ब्याज दर जिस पर रिज़र्व बैंक एक दिन-एक रात की तात्कालिक आवश्यकता के लिये बैंकों को नकदी उपलब्ध कराता है। कई बार अपने रोज़मर्रा के कामकाज के लिये बैंकों को भी बड़ी-बड़ी रकमों की ज़रूरत पड़ जाती है और ऐसी स्थिति में वह देश के केंद्रीय बैंक से ऋण लेते हैं। इस तरह के ओवरनाइट ऋण पर रिज़र्व बैंक जिस दर से उनसे ब्याज वसूल करता है, उसे रेपो रेट कहते हैं।

रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate): यह रेपो रेट से उलट होता है अर्थात् जब कभी बैंकों के पास दिन-भर के कामकाज के बाद बड़ी धनराशि बची रह जाती है, तो वे उसे रिज़र्व बैंक में जमा कर देते हैं, जिस पर उन्हें ब्याज दिया जाता है। रिज़र्व बैंक इस ओवरनाइट रकम पर जिस दर से ब्याज अदा करता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं।

नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio-CRR): प्रत्येक बैंक को अपने कुल कैश रिज़र्व का एक निश्चित हिस्सा रिज़र्व बैंक के पास रखना ही होता है, जिसे नकद आरक्षित अनुपात कहा जाता है। ऐसा इसलिये किया जाता है, ताकि किसी भी समय किसी भी बैंक में बहुत बड़ी तादाद में जमाकर्त्ताओं को रकम निकालने की ज़रूरत महसूस हो, तो बैंक को पैसा चुकाने में दिक्कत न हो। यह ऐसा साधन है, जिसकी सहायता से रिज़र्व बैंक बिना रिवर्स रेपो रेट में बदलाव किये बाज़ार से नकदी की तरलता को कम कर सकता है, क्योंकि CRR बढ़ाए जाने की स्थिति में बैंकों को अपनी नकदी का ज़्यादा बड़ा हिस्सा रिज़र्व बैंक के पास रखना होगा और उनके पास ऋण के रूप में देने के लिये कम रकम रह जाएगी।

सांविधिक चलनिधि अनुपात (Statutory Liquidity Ratio-SLR): वाणिज्यिक बैंकों के लिये अपने प्रतिदिन के कारोबार के बाद नकद, सोना और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के रूप में एक निश्चित धनराशि रिज़र्व बैंक के पास रखना ज़रूरी होता है। इसका इस्तेमाल किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने में किया जा सकता है। वह रेट जिस पर बैंक यह पैसा सरकार के पास रखते हैं, उसे SLR कहते हैं। इसके तहत अपनी कुल देनदारी के अनुपात में सोना सरकारी अनुमोदित बांड्स के रूप में रिज़र्व बैंक के पास रखना होता है।

सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility-MSF): यह वह दर है जिससे रिज़र्व बैंक से एक रात के लिये कर्ज़ लिया जा सकता है। यह 2011-2012 में आरबीआई की मौद्रिक नीति के बाद अस्तित्व में आया।

बैंक दर (Bank Rate): जिस सामान्य ब्याज दर पर रिज़र्व बैंक द्वारा अन्य बैंकों को पैसा उधार दिया जाता है उसे बैंक दर कहते हैं। इसके द्वारा रिज़र्व बैंक साख नियंत्रण (Credit Control) करने का काम करता है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

मौद्रिक नीति संचरण क्या है?

  • मौद्रिक नीति संचरण से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा किसी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा लिये गए मौद्रिक नीतिगत निर्णयों का संपूर्ण वित्तीय व्यवस्था में संचार होता है। 
  • इसके प्रभाव अर्थव्यवस्था में ब्याज दर, मुद्रास्फीति जैसे कारकों के माध्यम से परिलक्षित होते हैं।
  • रिज़र्व बैंक द्वारा इसके लिये कई नीतिगत संकेतों का प्रयोग किया जाता है, जिनमे रेपो रेट (जिसे नीतिगत दर भी कहा जाता है) सर्वप्रमुख संकेत है।
  • रेपो रेट में परिवर्तन अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों में परिवर्तन के माध्यम से निवेश, बचत आदि की दरों को प्रभावित करता है।
  • भारतीय रिज़र्व बैंक के विकास अनुसंधान समूह (Development Research Group-DRG) के एक अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, वित्तीय प्रणाली में घर्षण (Friction) कम होने पर मौद्रिक नीति संचरण में सुधार होता है। 

निष्कर्ष: 1969 से पहले निजी बैंकों की प्राथमिकताएँ देश की ज़रूरतों के अनुरूप नहीं थीं तथा कृषि, लघु उद्योग और निर्यात के लिये ऋण मिलने में सबसे ज्यादा कठिनाई होती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की शाखाएँ नहीं खुलती थीं। ऐसे में पहले 1969 में 14 बैंकों तथा उसके बाद 1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद परिस्थितियाँ बदलीं एवं देश की प्राथमिकताओं के हिसाब से बैंकिंग व्यवस्था संचालित होने लगी। इसी के साथ रिज़र्व बैंक की जिम्मेदारियों में इजाफा हुआ और बदलती परिस्थितियों के साथ इसकी भूमिका भी तेज़ी से बदली। आर्थिक उदारीकरण के बाद तो रिज़र्व बैंक देश की अर्थव्यवस्था के मद्देनज़र मुख्य भूमिका में आ गया और नियमित अंतराल पर मौद्रिक नीति की समीक्षा करना इसका एक महत्त्वपूर्ण काम है।

अब 4 साल बाद रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट में जो बदलाव किया है उसका प्रमुख कारण पिछले छह महीने से सकल खुदरा मुद्रास्फीति की दर का 4% से अधिक रहना है। हालाँकि इस दौरान रिज़र्व बैंक ने नीतिगत दर में यथास्थिति बनाए रखी थी। इधर हालिया समय में घरेलू आर्थिक गतिविधियों में सुधार आया है और उत्पादन तथा मांग के बीच जो फासला था वह भी लगभग समाप्त हो गया है। निवेश गतिविधियों में भी स्थिति बेहतर हुई है। दिवाला और ऋण शोधन अक्षमता कानून के तहत अर्थव्यवस्था के निराशाजनक क्षेत्रों का समाधान होने से गतिविधियों को और बढ़ावा मिलेगा। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ है कि मुद्रास्फीति को लेकर रिज़र्व बैंक अतिरिक्त सतर्कता बरतता रहेगा।

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