संसद टीवी संवाद

देश-देशांतर: मौद्रिक नीति | 09 Jun 2018 | भारतीय अर्थव्यवस्था

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

हाल ही में 6 जून को भारतीय रिज़र्व बैंक ने वर्तमान वित्त वर्ष की दूसरी मौद्रिक नीति की द्विमासिक समीक्षा में रेपो रेट में बढ़ोतरी कर दी। मौद्रिक नीति समिति द्वारा इसमें 25 आधार अंकों (Basis Point) की वृद्धि के बाद रेपो रेट अब 6% से बढ़कर 6.25% हो गया है। इस सरकार के 4 साल के कार्यकाल में पहली बार रेपो रेट में बढ़ोतरी की गई है। इससे पहले 28 जनवरी, 2014 को रेपो दर में वृद्धि की गई थी, तब रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 8% किया गया था।

क्यों बढ़ाया रेपो रेट?

हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा के प्रमुख बिंदु

भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन 

मौद्रिक नीति समिति क्या है?

(टीम दृष्टि इनपुट)

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक क्या है?

मौद्रिक नीति के उद्देश्य 

मौद्रिक नीति के प्रमुख घटक

रेपो दर (Repo Rate): वह ब्याज दर जिस पर रिज़र्व बैंक एक दिन-एक रात की तात्कालिक आवश्यकता के लिये बैंकों को नकदी उपलब्ध कराता है। कई बार अपने रोज़मर्रा के कामकाज के लिये बैंकों को भी बड़ी-बड़ी रकमों की ज़रूरत पड़ जाती है और ऐसी स्थिति में वह देश के केंद्रीय बैंक से ऋण लेते हैं। इस तरह के ओवरनाइट ऋण पर रिज़र्व बैंक जिस दर से उनसे ब्याज वसूल करता है, उसे रेपो रेट कहते हैं।

रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate): यह रेपो रेट से उलट होता है अर्थात् जब कभी बैंकों के पास दिन-भर के कामकाज के बाद बड़ी धनराशि बची रह जाती है, तो वे उसे रिज़र्व बैंक में जमा कर देते हैं, जिस पर उन्हें ब्याज दिया जाता है। रिज़र्व बैंक इस ओवरनाइट रकम पर जिस दर से ब्याज अदा करता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं।

नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio-CRR): प्रत्येक बैंक को अपने कुल कैश रिज़र्व का एक निश्चित हिस्सा रिज़र्व बैंक के पास रखना ही होता है, जिसे नकद आरक्षित अनुपात कहा जाता है। ऐसा इसलिये किया जाता है, ताकि किसी भी समय किसी भी बैंक में बहुत बड़ी तादाद में जमाकर्त्ताओं को रकम निकालने की ज़रूरत महसूस हो, तो बैंक को पैसा चुकाने में दिक्कत न हो। यह ऐसा साधन है, जिसकी सहायता से रिज़र्व बैंक बिना रिवर्स रेपो रेट में बदलाव किये बाज़ार से नकदी की तरलता को कम कर सकता है, क्योंकि CRR बढ़ाए जाने की स्थिति में बैंकों को अपनी नकदी का ज़्यादा बड़ा हिस्सा रिज़र्व बैंक के पास रखना होगा और उनके पास ऋण के रूप में देने के लिये कम रकम रह जाएगी।

सांविधिक चलनिधि अनुपात (Statutory Liquidity Ratio-SLR): वाणिज्यिक बैंकों के लिये अपने प्रतिदिन के कारोबार के बाद नकद, सोना और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के रूप में एक निश्चित धनराशि रिज़र्व बैंक के पास रखना ज़रूरी होता है। इसका इस्तेमाल किसी भी आपात देनदारी को पूरा करने में किया जा सकता है। वह रेट जिस पर बैंक यह पैसा सरकार के पास रखते हैं, उसे SLR कहते हैं। इसके तहत अपनी कुल देनदारी के अनुपात में सोना सरकारी अनुमोदित बांड्स के रूप में रिज़र्व बैंक के पास रखना होता है।

सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility-MSF): यह वह दर है जिससे रिज़र्व बैंक से एक रात के लिये कर्ज़ लिया जा सकता है। यह 2011-2012 में आरबीआई की मौद्रिक नीति के बाद अस्तित्व में आया।

बैंक दर (Bank Rate): जिस सामान्य ब्याज दर पर रिज़र्व बैंक द्वारा अन्य बैंकों को पैसा उधार दिया जाता है उसे बैंक दर कहते हैं। इसके द्वारा रिज़र्व बैंक साख नियंत्रण (Credit Control) करने का काम करता है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

मौद्रिक नीति संचरण क्या है?

निष्कर्ष: 1969 से पहले निजी बैंकों की प्राथमिकताएँ देश की ज़रूरतों के अनुरूप नहीं थीं तथा कृषि, लघु उद्योग और निर्यात के लिये ऋण मिलने में सबसे ज्यादा कठिनाई होती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की शाखाएँ नहीं खुलती थीं। ऐसे में पहले 1969 में 14 बैंकों तथा उसके बाद 1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद परिस्थितियाँ बदलीं एवं देश की प्राथमिकताओं के हिसाब से बैंकिंग व्यवस्था संचालित होने लगी। इसी के साथ रिज़र्व बैंक की जिम्मेदारियों में इजाफा हुआ और बदलती परिस्थितियों के साथ इसकी भूमिका भी तेज़ी से बदली। आर्थिक उदारीकरण के बाद तो रिज़र्व बैंक देश की अर्थव्यवस्था के मद्देनज़र मुख्य भूमिका में आ गया और नियमित अंतराल पर मौद्रिक नीति की समीक्षा करना इसका एक महत्त्वपूर्ण काम है।

अब 4 साल बाद रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट में जो बदलाव किया है उसका प्रमुख कारण पिछले छह महीने से सकल खुदरा मुद्रास्फीति की दर का 4% से अधिक रहना है। हालाँकि इस दौरान रिज़र्व बैंक ने नीतिगत दर में यथास्थिति बनाए रखी थी। इधर हालिया समय में घरेलू आर्थिक गतिविधियों में सुधार आया है और उत्पादन तथा मांग के बीच जो फासला था वह भी लगभग समाप्त हो गया है। निवेश गतिविधियों में भी स्थिति बेहतर हुई है। दिवाला और ऋण शोधन अक्षमता कानून के तहत अर्थव्यवस्था के निराशाजनक क्षेत्रों का समाधान होने से गतिविधियों को और बढ़ावा मिलेगा। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ है कि मुद्रास्फीति को लेकर रिज़र्व बैंक अतिरिक्त सतर्कता बरतता रहेगा।