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आंतरिक सुरक्षा

विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967

  • 10 Jan 2026
  • 91 min read

प्रिलिम्स के लिये: भारत के सर्वोच्च न्यायालय, 16वें संवैधानिक संशोधन (1963), राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण, आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिये अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय  

मेन्स के लिये: UAPA का विकास और इसके संवैधानिक निहितार्थ, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 में हुए दिल्ली दंगों के मामले में ज़मानत से इनकार कर दिया, जिसमें विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 की धारा 15 के तहत "आतंकवादी कार्य" की व्यापक परिभाषा पर भरोसा किया गया।

  • इस निर्णय से इस बात पर नए सिरे विमर्श शुरू हो गया है कि आतंकवाद-रोधी कानून आतंकवाद की पूर्ववर्ती अवधारणा की तुलना में कहीं अधिक व्यापक हो गया है।

सारांश

  • UAPA एक सीमित स्वातंत्र्योत्तर कानून से एक व्यापक आतंकवाद विरोधी ढाँचे में विकसित हुआ है, जिसकी धारा 15 के अंतर्गत आतंकवाद की दी गई व्यापक परिभाषा और सख्त ज़मानत प्रावधान इसे आतंकवाद की पूर्व अवधारणाओं से बहुत आगे ले जाते हैं।
  • हालाँकि UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक आतंकवाद रोधी प्रतिबद्धताओं के लिये महत्त्वपूर्ण बना हुआ है, सुरक्षा को लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ संतुलित करने के लिये स्पष्ट परिभाषाएँ, निष्पक्ष ज़मानत प्रावधान, त्वरित मुकदमे, गलत नज़रबंदी के लिये मुआवज़ा और मज़बूत निगरानी जैसे लक्षित सुधार आवश्यक हैं।

विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 क्या है?

  • यह आतंकवाद-विरोधी और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून है जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को संकट में डालने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगाता है।
    • UAPA की उत्पत्ति जवाहरलाल नेहरू के अधीन गठित राष्ट्रीय एकता परिषद से हुई है, जिसका उद्देश्य सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद और भाषायी अंधराष्ट्रवाद का समाधान करना था।
      • इसकी सिफारिशों के कारण 16वाँ संवैधानिक संशोधन (1963) हुआ, जिसने राष्ट्रीय अखंडता के हित में भाषण, सभा और संघ की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाए, और इन संवैधानिक परिवर्तनों को लागू करने के लिये UAPA अधिनियमित किया गया।
    • वर्ष 1967 में अधिनियमित यह कानून प्रारंभ में स्वतंत्रता के बाद भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को खतरे में डालने वाली विधि विरुद्ध गतिविधियों को लक्षित करता था, जो अलगाववादी और राष्ट्र विरोधी आंदोलनों से चिह्नित था और इसने अपने मूल रूप में आतंकवाद को संबोधित नहीं किया था।
  • UAPA का विकास:
    • वर्ष 2004 का संशोधन: आतंकवादी गतिविधियों और उनसे संबंधित दंड पर अध्याय IV (धारा 15–23) जोड़कर UAPA में आतंकवाद को पेश किया।
      • इसने आतंकवाद को हिंसक कार्यों के रूप में परिभाषित किया, जिनका उद्देश्य भारत की सुरक्षा को खतरे में डालना या लोगों के बीच आतंक का विस्तार करना था और "विधि विरुद्ध क्रियाकलाप" के दायरे को भारत के खिलाफ असंतोष उत्पन्न करने वाले कार्यों को शामिल करने के लिये विस्तारित किया।
    • वर्ष 2008 का संशोधन: 26/11 मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद संसद ने "बाय एनी अदर मींस" वाक्यांश जोड़कर धारा 15 को व्यापक बनाया, जिससे आतंकवाद की परिभाषा को व्यापक गतिविधियों तक बढ़ा दिया।
      • इस संशोधन ने ज़मानत पर रोक लगाकर इससे संबंधित मानदंडों को कठोर कर दिया, नियमित ज़मानत को अत्यंत कठिन बना दिया, हिरासत अवधि बढ़ा दी और विनिर्दिष्ट मामलों में दोष की धारणा शुरू की।
    • वर्ष 2012 का संशोधन: आतंकवाद की परिभाषा को आर्थिक सुरक्षा के खतरों को शामिल करने के लिये विस्तारित किया, जिसमें वित्तीय, खाद्य, ऊर्जा, आजीविका और पर्यावरणीय सुरक्षा शामिल हैं।
      • वर्ष 2019 का संशोधन: इससे न केवल संगठनों को बल्कि व्यक्तियों को भी आतंकवादी घोषित करने की अनुमति दी गई तथा राज्य की सहमति के बिना संपत्ति ज़ब्त करने सहित राष्ट्रीय अन्वेषण अधिकरण (NIA) की शक्तियों को बढ़ाया गया।
    • आतंकवाद की परिभाषा: भारतीय विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 की धारा 15 के तहत ‘आतंकवादी कृत्य’ को किसी ऐसे कृत्य के रूप में परिभाषित किया गया है, जो भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा या आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने या भारत या किसी बाह्य देश में लोगों के बीच आतंक फैलाने के उद्देश्य से किया गया हो।
      • कानून में विस्फोटक पदार्थ, आग्नेयास्त्र, विष, रसायन, खतरनाक पदार्थों या “किसी भी अन्य साधन” के माध्यम से किये गए कृत्यों को भी अपने दायरे में सम्मिलित करता है।
      • UAPA के तहत आतंकवादी कृत्यों के लिये न्यूनतम 5 वर्ष के कारावास के दंड का प्रावधान है, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है और यदि ऐसे कृत्यों के परिणामस्वरूप मृत्यु होती है, तो सज़ा मृत्युदंड या आजीवन कारावास हो सकती है, इस प्रकार यह गंभीर एवं हिंसक अपराधों को भी समाहित करता है।
      • इस व्यापक शब्दावली के तहत भय या व्यवधान उत्पन्न करने की संभावना वाले कृत्यों को आतंकवाद के रूप में अभियोजित किया जा सकता है।

UAPA के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क हैं?

पक्ष में तर्क:

  • राष्ट्रीय सुरक्षा का संरक्षण: यह आतंकवाद, उग्रवाद और भारत की संप्रभुता, अखंडता और आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों के खिलाफ निवारक कार्रवाई के लिये विधिक आधार प्रदान करता है, जिससे हिंसा बढ़ने से पहले राज्य को कार्रवाई करने में सक्षम बनाया जा सके।
  • सुरक्षा उपाय के रूप में निवारक निरोध: यह संदिग्धों को आसन्न खतरों को रोकने के लिये हिरासत में लेने की अनुमति देता है, विशेष रूप से दंगों, कट्टरता या संगठित चरमपंथी नेटवर्क से जुड़े मामलों में, जहाँ हमलों की प्रतीक्षा करने से बड़े पैमाने पर नुकसान हो सकता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के साथ संरेखण: यह भारतीय विधि को वैश्विक आतंकवाद-विरोधी मानदंडों के अनुरूप लाता है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के उपाय जैसे कि इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर द सप्रेशन ऑफ टेररिस्ट बॉम्बिंग्स (1997) और इंटरनेशनल कन्वेंशन फॉर द सप्रेशन ऑफ द फाइनेंसिंग टेररिज़्म (1999) शामिल हैं, जिससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का अनुपालन संभव हो पाता है।
  • आतंकी गतिविधियों के विरुद्ध निवारक प्रभाव: कठोर दंड और लंबी सज़ाएँ आतंकवाद में भागीदारी या समर्थन के खिलाफ एक निवारक के रूप में काम करती हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कृत्यों के प्रति शून्य सहिष्णुता का संकेत देती हैं।
  • आतंकवादी वित्तपोषण पर रोक: आतंकवाद के वित्तपोषण, धनशोधन और नकली मुद्रा प्रवाह को अपराध घोषित करता है, जिससे आतंकवाद के वित्तीय स्रोत का उन्मूलन किया जा सके।

विपक्ष में तर्क:

  • अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन: UAPA लंबे समय तक हिरासत में रखने, ज़मानत से इनकार करने और निर्दोषता की धारणा को परिवर्तित करने में सक्षम बनाता है, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता संवैधानिक सुरक्षा उपायों के विपरीत, नियम के बजाय अपवाद बन जाती है।
    • भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा NIA बनाम जहूर अहमद शाह वटाली (2020) मामले में दिये गए निर्णय के बाद, न्यायालयों को ज़मानत का निर्णय करते समय साक्ष्यों की विस्तार से जाँच करने से हतोत्साहित किया जा रहा है, जिससे न्यायिक निगरानी कम हो रही है।
  • व्यक्तियों को मनमाने ढंग से आतंकवादी घोषित करना: राज्य बिना किसी पूर्व दोषसिद्धि के व्यक्तियों को ‘आतंकवादी’ करार दे सकता है, जिससे निर्दोषता की धारणा कमज़ोर होती है तथा प्रतिष्ठा एवं निजता के अधिकार प्रभावित होते हैं।
  • आतंकवाद की अति व्यापक परिभाषा: ‘धमकी देने की संभावना’ या ‘आतंक फैलाने की संभावना’ जैसे शब्द संभावित या प्रत्याशित कृत्यों के लिये दंड की अनुमति देते हैं, जो कानूनी निश्चितता और आनुपातिकता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।
  • पुलिस की विवेकाधीन शक्तियाँ: पुलिस अधिकारियों के व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर तलाशी, ज़ब्ती और गिरफ्तारियाँ की जा सकती हैं, जिसमें न्यायिक निगरानी सीमित होती है, जिससे मनमानी सरकारी कार्रवाई का खतरा बढ़ जाता है।
  • असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अपराधीकरण: शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक भाषण तथा राज्य नीतियों पर प्रश्न उठाना अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा बताकर अपराध माना जाता है, जिससे अनुच्छेद 19 द्वारा सुरक्षित स्वतंत्र अभिव्यक्ति एवं संघ बनाने का अधिकार कमज़ोर होता है।
    • गिरफ्तारी का डर, लंबी अवधि तक कारावास और सामाजिक पूर्वाग्रह सक्रियता, पत्रकारिता तथा राजनीतिक भागीदारी को प्रभावित हैं, जिससे लोकतांत्रिक मूल्य तथा संस्कृति कमज़ोर होते हैं।

UAPA को मज़बूत बनाने के लिये किन सुधारों की आवश्यकता है?

  • अस्पष्ट परिभाषाओं को स्पष्ट करना: आतंकवादी कृत्य, अवैध गतिविधि और साज़िश जैसे शब्दों को संकुचित रूप से परिभाषित किया जाना चाहिये ताकि दुरुपयोग से बचा जा सके।
  • सख्त ज़मानत प्रावधानों में सुधार: UAPA के तहत सख्त ज़मानत प्रावधानों में संशोधन किया जाना चाहिये ताकि निर्दोषता की पूर्वधारणा को पुनः स्थापित किया जा सके, जो अनुच्छेद 21 और स्थापित आपराधिक विधिशास्त्र का मूल सिद्धांत है, जबकि अनुच्छेद 20(3) न्यायसंगत सुनवाई की सुरक्षा को मज़बूत करता है।

UAPA के तहत कठोर जमानत प्रावधानों में संशोधन किया जाना चाहिए ताकि निर्दोषता की पूर्वधारणा को पुनः स्थापित किया जा सके, जो अनुच्छेद 21 और स्थापित आपराधिक न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है; साथ ही अनुच्छेद 20(3) निष्पक्ष सुनवाई और आत्म-अभियोग से संरक्षण के अधिकार को और सुदृढ़ करता है।

  • त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करना: लंबित मामलों की लंबी सुनवाई न्याय को कमज़ोर करती है और सार्वजनिक संसाधनों का अपव्यय करती है।
    • PUCL की एक रिपोर्ट (2022) में उल्लेख किया गया कि वर्ष 2015–20 के बीच UAPA मामलों में 3% से कम मामलों में ही दोषसिद्धि हुई, जो फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स और सख्त समय-सीमाओं की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • मुआवज़ा ढाँचा लागू करना: गलत गिरफ्तारी और लंबी हिरासत के पीड़ितों को पर्याप्त मुआवज़ा  दिया जाना चाहिये।
    • रूदुल साह बनाम बिहार राज्य (1983) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध हिरासत के लिये मुआवज़ा को एक उपाय के रूप में मान्यता दी थी, जिसे UAPA के तहत भी कानूनी रूप से संहिताबद्ध किया जाना चाहिये।
  • निगरानी और पारदर्शिता को मज़बूत करना: नियमित संसदीय समीक्षा, UAPA डेटा का सार्वजनिक खुलासा और एजेंसियों के लिये स्पष्ट संचालनात्मक दिशानिर्देश जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं तथा मनमाने तौर पर कानून के लागू होने को रोक सकते हैं।

निष्कर्ष

UAPA राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसका विस्तृत दायरा और कठोर प्रक्रियाएँ संवैधानिक स्वतंत्रताओं के लिये खतरा हैं। सुरक्षा उपायों के बिना यह हिरासत को सामान्य बनाने तथा असहमति दबाने का जोखिम उत्पन्न करता है। सुरक्षा एवं लोकतंत्र के बीच संतुलन बनाए रखने के लिये लक्षित सुधार आवश्यक हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  आतंकवाद विरोधी कानूनों को प्रभावी बनाने के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु आवश्यक सुधारों का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. UAPA का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भारत की संप्रभुता, अखंडता, एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाली गतिविधियों को रोकना।

2. UAPA की धारा 15 विवादित क्यों है?
यह आतंकवाद को व्यापक शब्दों में परिभाषित करती है, जिसमें "किसी भी अन्य तरीके" से किये गए कार्य शामिल हैं, जिससे व्यापक व्याख्या संभव हो पाती है।

3. UAPA से सबसे अधिक कौन-सी संवैधानिक चिंता जुड़ी हुई है?
लंबे समय तक हिरासत में रखने, ज़मानत न देने और निर्दोष माने जाने के अधिकार को कमज़ोर करने के कारण अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हुआ।

4. UAPA को बेहतर बनाने के लिये क्या सुधार सुझाए गए हैं?
अधिक सटीक परिभाषा, निष्पक्ष ज़मानत के प्रावधान, त्वरित सुनवाई, गलत हिरासत के लिये मुआवज़ा, और मज़बूत निगरानी तंत्र।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

मेन्स

प्रश्न. भारत सरकार ने हाल ही में विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (यूएपीए), 1967 और एनआईए अधिनियम के संशोधन के द्वारा आतंकवाद-रोधी कानूनों को मज़बूत कर दिया है। मानवाधिकार संगठनों द्वारा विधि विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम का विरोध करने के विस्तार और कारणों पर चर्चा करते समय वर्तमान सुरक्षा परिवेश के संदर्भ में परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिये।  (2019) 

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