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श्रीलंका के गृहयुद्ध पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट
- 16 Jan 2026
- 70 min read
चर्चा में क्यों?
मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार) ने "वी लॉस्ट एवरीथिंग - इवेन होप फॉर जस्टिस" शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें श्रीलंका में दशकों तक चले गृहयुद्ध के दौरान तमिल नागरिकों के साथ मुख्य रूप से सुरक्षा बलों द्वारा की गई यौन हिंसा को उजागर किया गया है।
श्रीलंका में हिंसा पर UN मानवाधिकार रिपोर्ट के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- गृहयुद्ध के दौरान हिंसा: श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान यौन हिंसा का सुनियोजित रूप देखा गया, मुख्य रूप से राज्य सुरक्षा बलों द्वारा डराने-धमकाने, दंड देने और नियंत्रण बनाए रखने के साधन के रूप में।
- इस हिंसा में मुख्यतः तमिल नागरिकों को निशाना बनाया गया, जिनके बारे में यह माना जाता था कि वे लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के समर्थक थे या उनसे संबंध रखते थे।
- जवाबदेही और न्याय का अभाव: वर्ष 2009 में गृहयुद्ध की समाप्ति के कई वर्षों बाद भी पीड़ित लोग न्याय से वंचित हैं।
- जाँच, अभियोजन और मुआवज़े (क्षतिपूर्ति) के अभाव ने दंडहीनता को स्थायी रूप से बढ़ावा दिया है।
- पीड़ितों पर प्रभाव: पीड़ित आज भी दीर्घकालिक शारीरिक चोटों, बांझपन, मनोवैज्ञानिक आघात और आत्मघाती प्रवृत्तियों से ग्रसित हैं। निरंतर निगरानी, सामाजिक दुराग्रह और धमकियों के कारण ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग बहुत कम हुई है।
- संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशें: संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि संघर्ष से जुड़ी यौन हिंसा युद्ध अपराधों या मानवता के विरुद्ध अपराधों की श्रेणी में आती है।
- इस रिपोर्ट में श्रीलंका सरकार से आग्रह किया गया है कि वह अतीत के अत्याचारों को स्वीकार करे, औपचारिक रूप से माफी मांगे, पीड़ित-केंद्रित सुधार लागू करे, एक स्वतंत्र अभियोजन तंत्र स्थापित करे और पीड़ितों के लिये मनोवैज्ञानिक व सामाजिक सहायता सुनिश्चित करे।
श्रीलंकाई गृहयुद्ध (1983–2009) से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- जातीय और सामाजिक पृष्ठभूमि: श्रीलंका की जनसंख्या में लगभग 75% आबादी सिंहली नागरिकों की (मुख्यतः बौद्ध) और लगभग 11% आबादी श्रीलंकाई तमिल नागरिकों (मुख्यतः हिंदू) की है। देश में भाषायी, धार्मिक और राजनीतिक विभाजन गहराई से विद्यमान हैं।
- तमिलों का ऐतिहासिक संबंध दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य से बताया जाता है, जहाँ से वे व्यापारी के रूप में श्रीलंका पहुँचे और स्थायी रूप से वहीं बस गए।
- आरंभिक तनाव सांस्कृतिक कारणों से कम लेकिन सत्ता, प्रतिनिधित्व व राज्य पर नियंत्रण को लेकर अधिक था।
- तनाव की औपनिवेशिक जड़ें: ब्रिटिश शासन के दौरान “फूट डालो और राज करो” की नीति तथा तमिलों (विशेषकर जाफना क्षेत्र में) को अंग्रेज़ी शिक्षा और सरकारी नौकरियों में दी गई प्राथमिकता ने बहुसंख्यक सिंहली समुदाय में असंतोष उत्पन्न किया।
- इस अवधि में बौद्ध धर्म और सिंहली भाषा की स्थिति कमज़ोर हुई, जिसने स्वतंत्रता के बाद जातीय प्रतिघात की नींव रखी।
- स्वतंत्रता के बाद भेदभाव: वर्ष 1948 में स्वतंत्रता के बाद विभिन्न सरकारों ने तमिलों के अधिकारों को सीमित करने वाली नीतियाँ लागू कीं। इसमें सीलोन सिटिज़नशिप एक्ट (1948), सिंहली ओनली एक्ट (1956) और विश्वविद्यालय में प्रवेश हेतु मानकीकरण नीतियाँ शामिल थीं।
- तमिल क्षेत्रों में राज्य-प्रायोजित सिंहली उपनिवेशन ने असंतोष व शिकायतों को और अधिक बढ़ा कर दिया।
- बढ़ते सिंहली राष्ट्रवाद के कारण भारतीय मूल के तमिलों को और अधिक वंचनाओं का सामना करना पड़ा, उन्हें नागरिकता के अधिकार से वंचित कर दिया गया और राज्यविहीन कर दिया गया (ऐसी स्थिति जिसमें एक व्यक्ति को किसी भी देश द्वारा नागरिक के रूप में मान्यता नहीं दी जाती)।
- तमिल उग्रवाद का उदय: व्यवस्थित भेदभाव के परिणामस्वरूप तमिल युवाओं में कट्टरपंथ की प्रवृत्ति बढ़ी और उग्रवादी समूहों का गठन हुआ।
- लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE), जिसकी स्थापना वर्ष 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरण के नेतृत्व में हुई, ने पृथक तमिल राज्य की मांग की, जबकि तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (TULF) जैसे राजनीतिक संगठन पृथक तमिल ईलम की मांग कर रहे थे।
- गृहयुद्ध का आरंभ (1983): वर्ष 1983 के 'ब्लैक जुलाई' दंगों के बाद इस संघर्ष ने एक पूर्ण गृहयुद्ध का रूप लिया, जब सैनिकों पर लिट्टे (LTTE) के हमले के बाद तमिल विरोधी दंगे शुरू हो गए थे।
- हज़ारों तमिलों की हत्या कर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप यह द्वीप लगभग तीन दशकों तक निरंतर सशस्त्र संघर्ष की सामना करता रहा।
- भारत की भागीदारी: सिरिमावो–शास्त्री (1964) और सिरिमावो–इंदिरा गांधी (1974) संधियों में छह लाख भारतीय मूल के तमिलों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अपर्याप्त कार्यान्वयन तथा श्रीलंका में जारी गृहयुद्ध के कारण यह प्रक्रिया रुक गई, परिणामस्वरूप कई लोग राज्यविहीन हो गए।
- प्रारंभ में भारत ने क्षेत्रीय सुरक्षा कारणों से तमिल उग्रवादियों का समर्थन किया, लेकिन बाद में भारत-श्रीलंका समझौता, 1987 के तहत दिशा बदल दी, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और राष्ट्रपति जे.आर. जयवर्धने ने हस्ताक्षरित किया। इसके तहत भारतीय शांति रक्षा बल (IPKF) को तैनात किया गया।
- ऑपरेशन पवन भारत का IPKF मिशन था, जिसे भारत-श्रीलंका समझौता, 1987 के तहत श्रीलंका में लागू किया गया और यह भारत का पहला प्रमुख विदेश शांति-रक्षा अभियान था।
- IPKF का उद्देश्य LTTE को निरस्त्रीकृत करना और जाफना प्रायद्वीप की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। इसने वर्ष 1987 से 1990 तक विद्रोह-रोधी अभियान संचालित किये, जिसके परिणामस्वरुप LTTE को जाफना पर पुनः नियंत्रण स्थापित करने से रोका जा सका।
- वर्ष 1991 में LTTE के आत्मघाती हमलावर द्वारा प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या श्रीलंका में भारत के हस्तक्षेप का प्रत्यक्ष परिणाम थी।
- श्रीलंका के संविधान में 13वाँ संशोधन: इसे भारत-श्रीलंका समझौता, 1987 के बाद लागू किया गया था और इसका उद्देश्य प्रांतीय परिषदों को शक्तियाँ हस्तांतरित करके जातीय संघर्ष का समाधान करना था।
- इसने प्रांतों को शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और परिवहन जैसे विषयों पर कानून बनाने की अनुमति दी, जबकि भूमि तथा पुलिस संबंधी अधिकार केंद्र के पास बने रहे।
- हालाँकि सत्ता हस्तांतरण आंशिक ही रहा और तमिल-बहुल उत्तर और पूर्वी प्रांतों में लंबे समय तक केंद्र का शासन रहा, जिसके चलते संशोधन के उद्देश्य की पूर्ण प्रभावशीलता सीमित ही रही।
- सिंहली राष्ट्रवादियों के विरोध और प्रांतीय चुनावों में देरी ने इसके कार्यान्वयन को और कमज़ोर कर दिया है।
- संघर्ष में वृद्धि और ईलम युद्ध: भारत की वापसी के पश्चात युद्ध कई चरणों में बढ़ा, जिसमें आत्मघाती हमले, बड़े पैमाने पर हत्याएँ और सैन्य अभियान शामिल थे।
- जाफना, एलीफेंट पास (जाफना प्रायद्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला रणनीतिक स्थल) एवं मुल्लैटीवु की प्रमुख लड़ाइयों में दोनों पक्षों का भारी नुकसान हुआ और सामान्य जनमानस को व्यापक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
- युद्ध का समापन (2009): मई 2009 में श्रीलंकाई सेना ने LTTE को हराया और इसके नेता वेलुपिल्लई प्रभाकरण की हत्या कर दी, जिससे राज्य को निर्णायक सैन्य सफलता मिली।
- युद्धोत्तर वास्तविकता: युद्ध के समाप्त होने के बावजूद बहुत से तमिल विस्थापित हैं और मानवाधिकार उल्लंघनों, निगरानी तथा भेदभाव के आरोप बने हुए हैं, सांस्कृतिक सिंहलीकरण सामंजस्य प्रक्रिया को प्रभावित करता रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्रीलंकाई गृहयुद्ध क्या था?
यह लगभग तीन दशकों तक चला सशस्त्र संघर्ष (1983–2009) था, जो श्रीलंका सरकार और लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) के बीच तमिलों के लिये एक पृथक राज्य की मांग को लेकर हुआ।
2. श्रीलंकाई गृहयुद्ध के प्रमुख कारण क्या थे?
जातीय भेदभाव, सिंहली ओनली एक्ट (1956) जैसी भाषा नीतियों, शिक्षा और रोज़गार तक असमान पहुँच तथा तमिल क्षेत्रों में राज्य-प्रायोजित उपनिवेशन ने तमिलों में अलगाव की भावना और उग्रवाद को जन्म दिया।
3. लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) क्या था?
LTTE एक तमिल पृथकतावादी उग्रवादी संगठन था, जिसकी स्थापना वर्ष 1976 में वेलुपिल्लई प्रभाकरण के नेतृत्व में हुई। इसका उद्देश्य श्रीलंका के उत्तर और पूर्वी भागों में एक स्वतंत्र तमिल ईलम की स्थापना करना था।
4. 1983 में किस घटना ने गृहयुद्ध की शुरुआत को चिह्नित किया?
ब्लैक जुलाई दंगे (1983) के बाद संघर्ष में वृद्धि हुई। इन दंगों की शुरुआत LTTE के एक हमले में 13 सैनिकों की हत्या के बाद हुई और इसके परिणामस्वरूप व्यापक तमिल-विरोधी हिंसा हुई।
5. श्रीलंकाई गृहयुद्ध में भारत की क्या भूमिका रही?
भारत ने भारत-श्रीलंका समझौते (1987) के माध्यम से हस्तक्षेप किया और ऑपरेशन पवन के तहत भारतीय शांति सेना (IPKF) तैनात की, ताकि LTTE को निरस्त्र किया जा सके और शांति बहाल हो।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2020)
- पिछले दशक में भारत-श्रीलंका व्यापार के मूल्य में सतत् वृद्धि हुई है।
- भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले व्यापार में ‘कपड़े और कपड़े से बनी चीज़ों’ का व्यापार प्रमुख है।
- पिछले पाँच वर्षों में, दक्षिण एशिया में भारत के व्यापार का सबसे बड़ा भागीदार नेपाल रहा है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. कभी-कभी समाचारों में देखे जाने वाले एलीफेंट पास का उल्लेख निम्नलिखित में से किसके संदर्भ में किया जाता है? (2009)
(a) बांग्लादेश
(b) भारत
(c) नेपाल
(d) श्रीलंका
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. भारत-श्रीलंका संबंधों के संदर्भ में, विवेचना कीजिये कि किस प्रकार आंतरिक (देशीय) कारक विदेश नीति को प्रभावित करते हैं? (2013)
