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सम्मक्का-सरलम्मा जतारा
- 21 Jan 2026
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तेलंगाना मुलुगु ज़िले के मेदराम गाँव में 28 जनवरी, 2026 से सम्मक्का–सरलम्मा जतारा (मेदराम जतारा) का आयोजन करेगा।
सम्मक्का-सरलम्मा जतारा
- परिचय: मेदराम जतारा कोया समुदाय का तीन दिवसीय द्विवार्षिक आदिवासी उत्सव है, जो माघ माह (फरवरी) में आयोजित होता है। इसे विश्व के सबसे बड़े स्वदेशी आध्यात्मिक समागमों में से एक माना जाता है और वर्ष 1996 में इसे राज्य उत्सव घोषित किया गया था।
- स्थान: यह उत्सव दंडकारण्य के वन में स्थित एटुरनागरम वन्यजीव अभयारण्य के भीतर, गोदावरी नदी की सहायक नदी जंपन्ना वागु के तट पर आयोजित किया जाता है।
- जंपन्ना वागु का नाम योद्धा जंपन्ना के नाम पर रखा गया है, जो काकतीय सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
- ऐतिहासिक और लोककथात्मक उत्पत्ति: सम्मक्का को शैशव अवस्था में बाघों के बीच पाया गया थ, आगे चलकर वे आदिवासी समुदाय की नेता बनीं और पागिदिद्दा राजू से विवाह किया, जिनसे सरलम्मा, नागुलम्मा और जंपन्ना का जन्म हुआ।
- सम्मक्का ने अकाल और अन्यायपूर्ण कर‑वसूली के खिलाफ काकतीय शासकों का डटकर विरोध किया। इस संघर्ष में उनके परिवार के कई सदस्य मारे गए और युद्ध के बाद सम्मक्का रहस्यमय ढंग से वन में लापता हो गईं। जाते समय उन्होंने अपने कड़े (चूड़ियाँ) और कुमकुम पीछे छोड़ दिये, जो आज भी उनके पवित्र प्रतीक माने जाते हैं और श्रद्धापूर्वक पूजे जाते हैं।
- सम्मक्का ने अकाल और अन्यायपूर्ण कराधान के विरोध में काकतीय शासकों का प्रतिरोध किया। एक भीषण युद्ध में अपने परिवार को खोने के बाद वे जंगल में ओझल हो गईं और अपने पीछे चूड़ियाँ और कुमकुम छोड़ गईं, जो आज भी उनके पवित्र प्रतीक माने जाते हैं।
- मुख्य आस्था प्रणाली: यह उत्सव कुटुंब/रिश्तेदारी आधारित पूजा पर केंद्रित है, जिसमें सम्मक्का, सरलम्मा, पागिदिद्दा राजू और गोविंदा राजू का किसी दूरस्थ दैवी पंथ के रूप में नहीं, बल्कि एक परिवार के रूप में आह्वान किया जाता है।
- इस पर वैदिक या ब्राह्मणिक परंपराओं का कोई प्रभाव नहीं है, यह पूरी तरह से कोया समुदाय की जीववादी (एनिमिस्ट) तथा कबीलाई/वंश-आधारित आस्था प्रणालियों में निहित है।
- मुख्य अनुष्ठान: श्रद्धालु अपने शरीर के वज़न के बराबर “बंगारम” (गुड़) अर्पित करते हैं और जंपन्ना वागु में पवित्र स्नान करते हैं। देवी-देवताओं को हर दो वर्ष में एक बार चिलकलागुट्टा पहाड़ी से प्रतीकात्मक रूप से गड्डे (मंच) तक लाया जाता है, जबकि सामान्यतः श्रद्धालु पूजा के लिये पहाड़ी पर नहीं जाते।
- सांस्कृतिक महत्त्व: यह जतारा आदिवासी स्मृति, प्रतिरोध और पहचान का प्रतीक है। यह आदिवासी ब्रह्मांड-दृष्टि तथा रिश्तेदारी-आधारित पूजा परंपरा को प्रतिबिंबित करती है तथा अब इसमें गैर-आदिवासी श्रद्धालुओं की भागीदारी भी देखने को मिलती है।
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