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बायोटेररिज़्म के रूप में रिसिन

  • 13 Feb 2026
  • 13 min read

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने गुजरात एंटी टेररिज़्म स्क्वाड (ATS) से देश के पहले कथित 'बायोटेररिज़्म' मामले की जाँच अपने हाथ में ले ली है।

  • यह मामला हैदराबाद-निवासी एक डॉक्टर पर केंद्रित है, जिस पर अरंडी के बीजों से निकाले जाने वाले घातक विष 'रिसिन' को वेपन के रूप में विकसित करने का आरोप है। यह घटना बायोटेररिज़्म की संज्ञा दी गई दोहरे उपयोग वाले जैविक एजेंटों के आतंकी गतिविधियों हेतु प्रयोग की दिशा में एक चिंताजनक बदलाव को चिह्नित करती है।
  • रिसिन: यह अरंडी के बीजों (रिसिनस कम्युनिस) से प्राप्त एक शक्तिशाली, प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली टाइप II राइबोसोम-इनएक्टिवेटिंग प्रोटीन (लेक्टिन) है।
    • निष्कर्षण: एसीटोन, एक औद्योगिक विलायक, का उपयोग अरंडी तेल के उत्पादन के पश्चात् बचे अवशिष्ट लुगदी से रिसिन को निकालने एवं परिष्कृत करने हेतु किया जा सकता है।
    • खतरा स्तर: रिसिन कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण को अवरुद्ध कर देता है, जिससे गंभीर कोशिकीय क्षति एवं उनकी मृत्यु हो जाती है। इसको श्वसन, अंतर्ग्रहण (ingestion) या इंजेक्शन के माध्यम से सूक्ष्म मात्रा में ग्रहण करने से इसका अत्यंत घातक प्रभाव होता है, इसका कोई ज्ञात एंटीडोट (विषनाशक) उपलब्ध नहीं है।
    • सुरक्षा स्थिति: बायोलॉजिकल वेपन के रूप में इसके दुरुपयोग की उच्च संभावना के कारण इसे केमिकल वेपन कन्वेंशन (CWC) के तहत अनुसूची 1 में आने वाले पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
  • परिचालन इतिहास: यद्यपि लक्षित हत्याओं में इसका प्रयोग किया गया है, रिसिन का सफलतापूर्वक बड़े पैमाने पर हताहत करने वाली घटनाओं में कभी उपयोग नहीं किया गया है।
  • सीमाएँ: बड़े पैमाने पर उत्पादन और प्रभावी एयरोसोल के प्रसार में तकनीकी चुनौतियों के कारण रिसिन का बड़े स्तर पर वेपनाइज़ेशन कठिन बना हुआ है।

और पढ़ें: रिसिन विषाक्तता

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