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भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा खुला बाज़ार परिचालन (OMO) क्रय

  • 09 Mar 2026
  • 19 min read

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग प्रणाली में चलनिधि उपलब्ध कराने हेतु दो चरणों में 1 लाख करोड़ रुपये का खुला बाज़ार परिचालन (OMO) क्रय की घोषणा की है।

  • प्रत्येक 50,000 करोड़ रुपये के OMO क्रय को अग्रिम कर के बहिर्गमन से ठीक पूर्व निर्धारित किया गया है। सामान्यतः मार्च के मध्य में लगभग 2 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग प्रणाली से बाहर चले जाते हैं, अर्थात इस रणनीतिक समयावधि के चयन का उद्देश्य संभावित चलनिधि संकट के मध्य  संतुलन स्थापित करना है।

खुला बाज़ार परिचालन (OMO)

  • परिचय: OMO मौद्रिक नीति का मात्रात्मक साधन है, जिसके अंतर्गत सरकारी प्रतिभूतियों (G-Secs), जैसे- दिनांकित प्रतिभूतियाँ तथा ट्रेज़री बिल का क्रय-विक्रय किया जाता है।
    • प्रतिभूतियों का क्रय बैंकिंग प्रणाली में चलनिधि का प्रवेशन कराता है (विस्तारवादी प्रभाव), जबकि प्रतिभूतियों का विक्रय चलनिधि का अवशोषण करता है (संकुचनकारी प्रभाव)।
    • इस प्रकार यह प्रक्रिया मुद्रा आपूर्ति को प्रभावित करती है।
  • भारत में क्रियान्वयन: भारत में RBI, OMO को नीलामी अथवा प्रत्यक्ष बाज़ार परिचालन के माध्यम से संचालित करता है। इसमें प्राथमिक डीलर, वाणिज्यिक बैंक तथा अन्य पात्र प्रतिभागी सम्मिलित होते हैं। समस्त लेन-देन RBI के इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म ई-कुबेर प्रणाली के माध्यम से संपन्न होते हैं।
  • उद्देश्य: बैंकिंग प्रणाली में दीर्घकालिक चलनिधि आपूर्ति स्थिति को संतुलित करना तथा अल्पकालिक ब्याज दरों को स्थिर बनाकर मौद्रिक नीति के प्रेषण तंत्र को सुदृढ़ करना।
    • इसके अलावा इसका उद्देश्य अतिरिक्त चलनिधि का अवशोषण कर मुद्रास्फीति प्रबंधन करना भी है, ताकि चलनिधि की कमी की स्थिति में चलनिधि प्रविष्ट कर आर्थिक संवृद्धि को समर्थन प्रदान किया जा सके
  • OMO के प्रकार:
    • एकमुश्त (आउटराइट) OMO: इसमें प्रतिभूतियों का स्थायी क्रय या विक्रय किया जाता है, जिससे चलनिधि में दीर्घकालिक परिवर्तन होता है। उदाहरण: हाल ही में घोषित 1 लाख करोड़ रुपये का क्रय।
    • अस्थायी परिचालन: अल्पकालिक तरलता समायोजन के लिये चलनिधि समायोजन सुविधा (LAF) के माध्यम से परिचालित किये जाते हैं। इसमें रेपो तथा रिवर्स रेपो परिचालन सम्मिलित होते हैं।
  • महत्त्व: यह आरक्षित नकदी निधि अनुपात (CRR) तथा सांविधिक चलनिधि अनुपात (SLR) जैसे अन्य मात्रात्मक साधनों का पूरक है। इसके माध्यम से RBI सीजनल फैक्टर्स (जैसे- अग्रिम कर बहिर्गमन), बाह्य आघात अथवा पूंजी प्रवाह के प्रभावों के अनुसार चलनिधि का सूक्ष्म समायोजन कर सकता है। यह प्रक्रिया नीतिगत दरों में प्रत्यक्ष परिवर्तन किये बिना चलनिधि प्रबंधन को प्रभावी बनाती है।

और पढ़ें: मौद्रिक नीति का मात्रात्मक साधन

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