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भारतीय अर्थव्यवस्था

खुला बाज़ार परिचालन

  • 05 Mar 2019
  • 3 min read

चर्चा में क्यों?

कुछ समय पूर्व भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने खुला बाज़ार परिचालन (Open Market Operations-OMO) के माध्यम से अर्थव्यवस्था में पूंजी डालने का निर्णय लिया था। हाल ही में OMO के ज़रिये पूंजी डालने के बावजूद तरलता परिदृश्य में कमी होने की बात सामने आई है।

प्रमुख बिंदु

  • खुला बाज़ार परिचालन (OMO) धन की कुल मात्रा को विनियमित या नियंत्रित करने के लिये मात्रात्मक मौद्रिक नीति उपकरणों में से एक है, जो केंद्रीय बैंक द्वारा अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति को नियंत्रित करने के लिये नियोजित की गई है।
  • RBI द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री या खरीद के माध्यम से मुद्रा आपूर्ति की स्थिति को समायोजित करने के लिये खुले बाज़ार का संचालन किया जाता है।
  • केंद्रीय बैंक, आर्थिक प्रणाली के अंतर्गत तरलता में कमी लाने के लिये सरकारी प्रतिभूतियाँ बेचता है और इस प्रणाली को नियंत्रित रखने के लिये सरकारी प्रतिभूतियाँ खरीदता है।
  • अक्सर ये परिचालन दिन-प्रतिदिन के आधार पर किये जाते हैं, जो बैंकों को उधार देने में मदद के साथ-साथ मुद्रास्फीति को संतुलित करते हैं।
  • RBI द्वारा अर्थव्यवस्था में रुपए के मूल्य को समायोजित करने के लिये अन्य मौद्रिक नीति उपकरणों जैसे रेपो दर, नकद आरक्षित अनुपात और वैधानिक तरलता अनुपात के साथ OMO का उपयोग किया जाता है।

क्या है मामला?

  • CARE रेटिंग रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा खुले बाज़ार परिचालन (Open Market Operations-OMO) के माध्यम से बाज़ार में डाली गई मुद्रा (12,500 करोड़ रुपए) तथा वेतन और पेंशन के उच्च सरकारी खर्चों के बावजूद 34,266 करोड़ रुपए की कमी आई है।
  • 15 फरवरी को समाप्त पखवाड़े के दौरान गैर-खाद्य ऋण या व्यक्तियों और कंपनियों के लिये ऋण 14.3 प्रतिशत प्रति वर्ष बढ़ा, जो पिछले एक पखवाड़े में 14.4 प्रतिशत (पिछले वर्षों की तुलना में) धीमा था। इसने जमा वृद्धि को पार कर 10.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है।
  • बैंक विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च ऋण वृद्धि के बीच कम जमा वृद्धि बैंकिंग प्रणाली में तरलता की कमी में योगदान करने वाला एक कारक रहा है।

स्रोत – इंडियन एक्सप्रेस

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