रैपिड फायर
न्यूक्लिक अम्ल प्रवर्द्धन परीक्षण
- 03 Mar 2026
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भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी अस्पतालों में न्यूक्लिक अम्ल प्रवर्द्धन परीक्षण (NAT) लागू करने के लिये आवश्यक लागत, व्यावहारिकता (Feasibility) और अवसंरचना से संबंधित विस्तृत जानकारी मांगी है, यह जानकारी रक्त आधान‑जनित संक्रमणों की रोकथाम हेतु दायर एक जनहित याचिका (PIL) के उत्तर में मांगी गई है।
- संवैधानिक आयाम: जनहित याचिका में न्यायालय से आग्रह किया गया है कि ‘सुरक्षित रक्त का अधिकार’ को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत निहित जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग घोषित किया जाए।
- याचिका में पूरे भारत के सभी रक्त बैंकों में NAT को अनिवार्य बनाए जाने के निर्देश देने की मांग की गई है।
- इसका उद्देश्य रक्त आधान से पूर्व HIV, हेपेटाइटिस‑B (HBV), हेपेटाइटिस‑C (HCV), मलेरिया तथा सिफलिस सहित रक्त आधान‑जनित संक्रमणों (TTI) का सटीकता से पता लगाना है।
- विनियामक ढाँचा: वर्तमान में औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत भारत में अनिवार्य रक्त‑जाँच केवल सेरोलॉजिकल परीक्षणों (जैसे- एंज़ाइम‑लिंक्ड इम्यूनोसॉरबेंट असेज़ (ELISA)) तक ही सीमित है।
- न्यूक्लिक एसिड परीक्षण (NAT) को अभी देश भर में कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं बनाया गया है।
- थैलेसीमिया संकट: याचिका अत्यधिक संवेदनशील रोगियों की सुरक्षा में तंत्रगत विफलता को रेखांकित करती है और यह उल्लेख करती है कि भारत को ‘विश्व का थैलेसीमिया कैपिटल’ माना जाता है।
- थैलेसीमिया एक वंशानुगत (आनुवंशिक) रक्त विकार है, जिसकी विशेषता यह है कि शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन (वह प्रोटीन जो लाल रक्त कणों के माध्यम से ऑक्सीजन वहन करता है) का उत्पादन नहीं कर पाता।
- थैलेसीमिया से पीड़ित रोगियों को प्राणरक्षक रक्त आधान (blood transfusion) प्रत्येक 15 से 20 दिन में करना पड़ता है, जिस कारण यदि रक्त की जाँच समुचित रूप से न हो तो वे TTI के प्रति अत्यंत संवेदनशील हो जाते हैं।
- याचिका में मध्य प्रदेश, झारखंड और उत्तर प्रदेश में ऐसे रोके जा सकने वाले मामलों को रेखांकित किया गया, जहाँ बच्चों को असुरक्षित रक्त आधान के कारण HIV और हेपेटाइटिस का संक्रमण हो गया।
- थैलेसीमिया एक वंशानुगत (आनुवंशिक) रक्त विकार है, जिसकी विशेषता यह है कि शरीर पर्याप्त मात्रा में हीमोग्लोबिन (वह प्रोटीन जो लाल रक्त कणों के माध्यम से ऑक्सीजन वहन करता है) का उत्पादन नहीं कर पाता।
न्यूक्लिक अम्ल प्रवर्द्धन परीक्षण (NAT)
- यह एक अत्यंत संवेदनशील तकनीक है, जो रक्तदान का परीक्षण वायरल राइबोन्यूक्लिक एसिड (RNA) या डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड (DNA) के लक्षित खंडों के प्रवर्द्धन के माध्यम से करती है।
- परंपरागत सीरोलॉजिकल परीक्षणों में संक्रमण की पहचान हेतु मानव शरीर द्वारा प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (एंटीबॉडी) उत्पन्न होने की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
- न्यूक्लिक एसिड परीक्षण प्रत्यक्ष रूप से वायरस का पता लगाता है, जिससे ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV), हेपेटाइटिस B वायरस (HBV) तथा हेपेटाइटिस C वायरस (HCV) के लिये “विंडो अवधि” (प्रारंभिक संक्रमण से पहचान योग्य होने तक का समय) में उल्लेखनीय कमी आती है।
- यह उन्नत परीक्षण उन “फाल्स रिएक्टिव” रक्तदानों की पहचान में भी सहायक है, जिन्हें मानक सीरोलॉजी विधियाँ त्रुटिवश संक्रमित घोषित कर देती हैं।
- इससे सुरक्षित रक्त अनावश्यक रूप से नष्ट होने से बचता है तथा दाताओं के सटीक परामर्श में सहायता मिलती है।
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