रैपिड फायर
शहरी हरियाली में हरित विरोधाभास
- 06 Jan 2026
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भारत सहित 105 देशों के 761 शहरों पर आधारित एक वैश्विक अध्ययन से पता चला है कि शहरी हरितकरण सदैव शहरों को ठंडा नहीं करता। यदि पेड़ों और वनस्पति का रोपण सही योजना के बगैर किया जाए, तो विशेषतः शुष्क और जल की कमी वाले क्षेत्रों में इससे गर्मी में और वृद्धि की संभावना होती है।
- शहरी ऊष्मा के प्रेरक कारक: वैश्विक जलवायु परिवर्तन और नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव के कारण शहर निरंतर अधिक गर्म हो रहे हैं। इस प्रभाव में कंक्रीट और डामर जैसी सतहें आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक ऊष्मा को अवशोषित कर उसे लंबे समय तक संचित रखती हैं।
- तापमान विनियमन क्षमता: अध्ययन ने तापमान विनियमन क्षमता नामक एक मापदंड का उपयोग किया, जिसे वनस्पति-आच्छादित सतहों और कंक्रीट व डामर जैसी विनिर्मित सतहों के बीच तापांतर के रूप में परिभाषित किया गया है।
- एक नकारात्मक मान इंगित करता है कि वनस्पति विनिर्मित क्षेत्रों की तुलना में ठंडी है (शीतलन प्रभाव) और सकारात्मक मान इंगित करता है कि वनस्पति गर्म है (तापन प्रभाव)। यह मापदंड अध्ययन को यह आकलन करने में मदद करता है कि शहरी हरियाली कब और कहाँ नगरीय ऊष्मा को कम करती है या उसमें वृद्धि करती है।
- अध्ययन के निष्कर्ष: समग्र रूप से, वनस्पति ने अधिकांश शहरों को ठंडा किया, जबकि लगभग एक-चौथाई शहरों, मुख्यतः कम वर्षा (<1,000 मिमी.) वाले, ने शुद्ध तापन का अनुभव किया।
- शुष्क क्षेत्रों में हरित विरोधाभास: शुष्क और अर्द्ध-शुष्क शहरों में सीमित जल उपलब्धता वाष्पोत्सर्जन को कमज़ोर करती है, जिससे वनस्पति के शीतलन प्रभाव में कमी आती है।
- साथ ही, वनस्पति विनिर्मित क्षेत्रों की तुलना में अधिक सौर विकिरण अवशोषित कर सकती है, जिससे सतही तापमान में वृद्धि हो सकती है।
- उष्णता के तीव्र दबाव और कम आर्द्रता की स्थिति में पौधे जल की हानि को और अधिक सीमित कर देते हैं, जिससे वाष्पीकरणीय शीतलन में तीव्र कमी आ जाती है तथा नगरीय ऊष्मा और अधिक बढ़ जाती है।
- यह भारत के लिये महत्त्वपूर्ण है, जहाँ विभिन्न शहरों को जलवायु-अनुकूल वनस्पति और समेकित ऊष्मा-शमन (heat-mitigation) योजना की आवश्यकता है।
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