रैपिड फायर
हिमालय क्षेत्रों पर रेगिस्तानी बैक्टीरिया का प्रभाव
- 14 Feb 2026
- 14 min read
हाल ही में, एक नए अध्ययन में पश्चिमी भारत से पूर्वी हिमालय की चोटियों तक उठने वाली रेगिस्तानी धूल के ऊँचे गुबार के साथ ले जाए जाने वाले वायुजनित रोगजनकों की पहचान की गई है, जो श्वसन और त्वचा रोगों से संबंधित हैं।
- परिचय: यह अध्ययन विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के एक स्वायत्त संस्थान, बोस संस्थान के शोधकर्त्ताओं ने पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों से उठने वाली धूल भरी आंधियों की दो वर्षों से अधिक समय तक निरंतर निगरानी के आधार पर किया गया था।
- यह प्रयास इस बात की समझ की कमी को दूर करने के लिये किया गया था कि सीमा पार से आने वाली धूल द्वारा ले जाए जाने वाले वायुजनित सूक्ष्मजीव ठंडे, ऑक्सीजन की कमी के कारण होने वाले हिमालयी वातावरण में मानव स्वास्थ्य को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
- मुख्य निष्कर्ष: शक्तिशाली धूल भरी आंधियाँ सैकड़ों किमी. की दूरी तय करती हैं, इंडो-गंगा के मैदान को पार करने के बाद हिमालय की पहाड़ियों पर फैल जाती हैं। धूल के ये गुबार अपने साथ वायु में मौजूद जीवाणुओं को ले जाते हैं, जिनमें रोग उत्पन्न करने वाले रोगाणु भी शामिल हैं।
- विस्तार की प्रक्रिया: स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव एक दोहरी प्रक्रिया के कारण उत्पन्न होते हैं, रेगिस्तानी धूल और उससे जुड़े रोगजनकों का क्षैतिज लंबी दूरी का परिवहन और हिमालय की तलहटी से प्रदूषित हवा का लंबवत ऊपर की ओर उठना। ये दोनों प्रक्रियाएँ मिलकर उच्च-ऊँचाई वाले क्षेत्रों में वायुमंडलीय बैक्टीरिया समुदाय को बदल देती हैं।
- महत्त्व: अपनी तरह का यह पहला मात्रात्मक अध्ययन सीमा पार धूल परिवहन को हिमालयी वायुमंडलीय सूक्ष्मजीव विज्ञान में परिवर्तन और संबंधित सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों से जोड़ता है, जो विकसित भारत @ 2047 की परिकल्पना के अनुरूप राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्ययोजनाओं और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के लिये महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करता है।
|
और पढ़ें: भारतीय हिमालयी क्षेत्र |