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डांसिंग गर्ल मूर्ति

  • 29 May 2023
  • 6 min read

मोहनजोदड़ो की डांसिंग गर्ल मूर्ति का "समकालीन" संस्करण दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय एक्सपो 2023 के शुभंकर के रूप में इस्तेमाल किया गया था। इस शुभंकर को बनाने हेतु भौगोलिक संकेतक (Geographical indication- GI) द्वारा संरक्षित चन्नापटना खिलौनों के पारंपरिक शिल्प का उपयोग किया गया था।

  • हालाँकि इसने हाल ही में मूल रूप से विकृति के कारण विवाद खड़ा कर दिया है।
  • संस्कृति मंत्रालय ने प्रेरित शिल्प कार्य और द्वारपालों या द्वारपाल के समकालीन प्रतिनिधित्व के रूप में इसका बचाव किया।

डांसिंग गर्ल मूर्ति का महत्त्व:

  • परिचय:  
    • डांसिंग गर्ल मूर्ति सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) की सबसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित कलाकृतियों में से एक है, जिसे हड़प्पा सभ्यता के रूप में भी जाना जाता है।
    • इसकी खोज वर्ष 1926 में पुरातत्त्वविद् अर्नेस्ट मैके ने मोहनजोदड़ो में की थी, जो प्राचीन विश्व की सबसे बड़ी और सबसे उन्नत शहरी बस्तियों में से एक थी।
    • यह मूर्ति काँसे से बनी है और इसे लॉस्ट वैक्स तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है।
  • डांसिंग गर्ल का महत्त्व:
    • मूर्ति का अस्तित्व हड़प्पा समाज में उच्च कला की उपस्थिति को इंगित करता है, जो उनके कलात्मक परिष्कार को दर्शाता है।
      • डांसिंग गर्ल के अभूतपूर्व शिल्प कौशल और प्रतीकात्मक सौंदर्य से पता चलता है कि इसे उपयोगितावादी उद्देश्यों के लिये नहीं बनाया गया था बल्कि सांस्कृतिक महत्त्व के प्रतीक के रूप में बनाया गया था।
    • मूर्ति में यथार्थवाद और प्रकृतिवाद की उल्लेखनीय भावना प्रदर्शित की गई है, जो डांसिंग गर्ल की शारीरिक रचना, अभिव्यक्ति और मुद्रा के सूक्ष्म विवरणों पर प्रकाश डालती है। इतिहासकार ए.एल बाशम ने भी इसे अन्य प्राचीन सभ्यताओं के कार्यों से अलग करते हुए इसकी जीवंतता की प्रशंसा की है। 
  • डांसिंग गर्ल की वर्तमान स्थिति:
    • विभाजन के बाद मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के पाकिस्तान में शामिल होने के बावजूद डांसिंग गर्ल, एक समझौते के तहत भारत को प्राप्त हुई
    • वर्तमान में इस काँस्य मूर्ति को भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है, जो संग्रहालय की सिंधु-घाटी सभ्यता गैलरी में आगंतुकों को "स्टार ऑब्जेक्ट" के रूप में आकर्षित करती है।

लॉस्ट वैक्स तकनीक:

  • इस प्रक्रिया में वांछित वस्तु का मोम का मॉडल बनाना शामिल है, जिसे बाद में एक साँचे में बंद कर दिया जाता है। साँचा प्राय: ऊष्मा प्रतिरोधी सामग्री जैसे प्लास्टर या सिरेमिक से बना होता है।
    • एक बार साँचा बन जाने के बाद इसे पिघलाने और मोम को हटाने के लिये गर्म किया जाता है जिससे मूल मोम मॉडल के आकार का एक खोखला साँचा बन जाता है।
  • पिघला हुआ धातु, जैसे कांस्य या चाँदी को फिर साँचे में डाला जाता है, जिससे मोम द्वारा छोड़ा गया स्थान भर जाता है।
    • मूल मोम मॉडल का आकार लेते हुए धातु को ठंडा और जमने दिया जाता है। एक बार जब धातु ठंडी हो जाती है तो साँचा टूट जाता है या अन्यथा हटा दिया जाता है जिससे अंतिम धातु की वस्तु का पता चलता है।
  • लॉस्ट वैक्स तकनीक अंतिम धातु की ढलाई में बड़ी सटीकता तथा विस्तार की अनुमति देती है, क्योंकि मोम मॉडल को बनाने से पहले जटिल रूप से उकेरा या तराशा जा सकता है। इस तकनीक का उपयोग प्राय: मूर्तियों, गहनों और अन्य सजावटी धातु की वस्तुओं के निर्माण में किया जाता है जहाँ बारीक विवरण वांछित होते हैं।
  • समकालीन अभ्यास में लॉस्ट वैक्स तकनीक को प्राय: प्रारंभिक मोम मॉडल बनाने के लिये 3D प्रिंटिंग या कंप्यूटर-एडेड डिज़ाइन (Computer-Aided Design- CAD) जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ा जाता है, जिससे प्रक्रिया की सटीकता और दक्षता बढ़ जाती है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी सिंधु सभ्यता के लोगों की विशेषता/विशेषताएँ है/हैं? (2013)

  1. उनके पास बड़े-बड़े महल और मंदिर थे। 
  2. वे देवी और देवताओं दोनों की पूजा करते थे। 
  3. उन्होंने युद्ध में घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले रथों का उपयोग किया।

नीचे दिये गए कूट का उपयोग करके सही विकल्प चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) 1, 2 और 3
(d) उपर्युक्त कोई भी कथन सही नहीं है

उत्तर: (b)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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