जैव विविधता और पर्यावरण
भारत में जल सुरक्षा हेतु सफल प्रबंधन
- 17 Mar 2026
- 240 min read
यह एडिटोरियल 16/03/2026 को द हिंदू में प्रकाशित “Building India’s climate resilience with water at the core” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय भारत की वर्ष 2026 की जल सुरक्षा स्थिति का बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसके तहत डिजिटल गवर्नेंस, कृषि-पारिस्थितिक सुधारों और चक्रीय शहरी अर्थव्यवस्थाओं के समन्वय का मूल्यांकन किया गया है, ताकि जल संकट से निपटने के लिये एक कारगर उपाय विकसित किया जा सके।
प्रिलिम्स के लिये: अटल भूजल योजना, COP-30, मिशन अमृत सरोवर, ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज, जल जीवन मिशन
मेन्स के लिये: भारत में जल सुरक्षा की वर्तमान स्थिति, भारत में जल-शासन, जल असुरक्षा को बढ़ाने में जलवायु परिवर्तन की भूमिका, केस स्टडी, जल सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये आवश्यक उपाय।
भारत की जल सुरक्षा जलवायु परिवर्तन से निपटने की अग्रिम पंक्ति के रूप में उभर रही है, जैसा कि बेलेम (2025) में आयोजित COP-30 के परिणामों से स्पष्ट होता है, जिसमें जल प्रणालियों को वैश्विक अनुकूलन ढाँचों के केंद्र में रखा गया है। भारत में जलवायु संबंधी अधिकांश आपदाएँ जल से संबंधित हैं, जो बाढ़, सूखा एवं अनियमित मानसून के रूप में प्रकट होती हैं तथा कृषि, शहरी अवसंरचना और आजीविका को खतरे में डालती हैं। 6 करोड़ से अधिक भारतीय उच्च से अत्यधिक जल संकट का सामना कर रहे हैं (NITI आयोग के अनुसार), जिसमें चुनौती संरचनात्मक और जलवायु संबंधी दोनों है। इसलिये समुत्थानशील और जलवायु-सहिष्णु जल प्रणालियों को सुदृढ़ करना भारत की प्रभावी जल प्रबंधन एवं सतत विकास रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बन रहा है।
भारत में प्रभावी जल प्रबंधन के लिये वर्तमान ढाँचा क्या है?
- संवैधानिक आयाम: जल मूलतः राज्य सूची का विषय है, किंतु साझा संसाधनों पर केंद्र का रणनीतिक नियंत्रण बना रहता है।
- 7वीं अनुसूची:
- राज्य सूची (प्रविष्टि 17): राज्यों को जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरों, जल निकासी और जल विद्युत पर अधिकार प्रदान करता है।
- संघ सूची (प्रविष्टि 56): केंद्र को जनहित में अंतर-राज्यीय नदियों तथा नदी घाटियों के विनियमन एवं विकास का अधिकार देती है।
- न्यायनिर्णय (अनुच्छेद 262): यह एक विशिष्ट तंत्र प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत संसद किसी भी न्यायालय (जिसमें सर्वोच्च न्यायालय भी सम्मिलित है) के अधिकार-क्षेत्र को अंतर-राज्यीय जल विवादों पर प्रतिबंधित कर सकती है, जिससे समर्पित अधिकरणों की स्थापना होती है।
- मूल अधिकार (अनुच्छेद 21): न्यायपालिका ने जीवन के अधिकार की व्याख्या प्रदूषण मुक्त जल के अधिकार (सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991) को शामिल करने के लिये लगातार की है। न्यायपालिका ने निरंतर जीवन के अधिकार की व्याख्या ‘प्रदूषण-रहित जल के अधिकार’ (सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991) को सम्मिलित करते हुए की है।
- स्थानीय शासन: 73 वें और 74वें संशोधन (11वीं एवं 12वीं अनुसूची) के तहत जल प्रबंधन, लघु सिंचाई और स्वच्छता का अधिकार पंचायतों एवं नगरपालिकाओं को सौंप दिया गया है।
- 7वीं अनुसूची:
- विधायी ढाँचा:
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम (1956): यह अधिनियम तदर्थ न्यायाधिकरणों के माध्यम से तटवर्ती राज्यों के बीच संघर्षों को हल करने के लिये विधिक आधार प्रदान करता है।
- जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम (1974): CPCB और SPCB की स्थापना की गई।
- वर्ष 2026 का संशोधन: संचालन की सहमति (CTO) अब रद्द न किये जाने तक अनिश्चित काल के लिये वैध है, जिससे नवीनीकरण की आवश्यकता समाप्त हो गई है।
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (1986): एक व्यापक अधिनियम जिसका उपयोग भूजल निष्कर्षण को विनियमित करने के लिये केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) की स्थापना के लिये किया गया था।
- भूजल के संरक्षण, सुरक्षा, विनियमन और प्रबंधन हेतु आदर्श विधेयक, 2016: यह राज्यों के लिये एक नमूना रूपरेखा प्रदान करता है, जिसके माध्यम से जल अधिकारों को भूमि स्वामित्व से पृथक करते हुए ‘जलभृत-आधारित’ प्रबंधन को प्रोत्साहित किया जाता है।
- संस्थागत संरचना: वर्ष 2019 में, भारत ने एक एकीकृत मंत्रालय बनाकर 'एक जल' दृष्टिकोण की ओर कदम बढ़ाया।
- जल शक्ति मंत्रालय: प्रशासनिक बाधाओं को दूर करने के लिये जल संसाधन और पेयजल एवं स्वच्छता विभागों का विलय करके गठित किया गया।
- केंद्रीय जल आयोग (CWC): सतही जल, बाढ़ नियंत्रण और बाँध सुरक्षा के लिये सर्वोच्च तकनीकी निकाय।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB): यह राष्ट्रीय स्तर पर जलभृत मानचित्रण तथा भूमिगत जल की निगरानी करता है।
- NITI आयोग: प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को बढ़ावा देने के लिये समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI) के माध्यम से प्रदर्शन की निगरानी करता है।
- प्रमुख नीतियाँ और डिजिटल ढाँचे:
- राष्ट्रीय जल नीति (2012): बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद जल को एक आर्थिक वस्तु के रूप में मानने पर बल देती है।
- सुजलाम भारत पहल: जल जीवन मिशन के अंतर्गत एक डिजिटल प्लेटफॉर्म जो सभी ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं को अधोसंरचना, जल गुणवत्ता एवं सेवा प्रदाय पर रियल टाइम डेटा के साथ एक समेकित प्रणाली में एकीकृत करता है।
- जल जीवन मिशन (वर्ष 2028 तक विस्तारित): प्रत्येक ग्रामीण घर में कार्यात्मक घरेलू नल कनेक्शन (FHTC) उपलब्ध कराने का लक्ष्य।
- अटल भूजल योजना: विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित एक परियोजना जिसका उद्देश्य जल संकटग्रस्त ब्लॉकों में व्यवहार परिवर्तन और समुदाय के नेतृत्व में वाटर बजटिंग को बढ़ावा देना है।
भारत में जल सुरक्षा को बढ़ावा देने वाले प्रमुख घटनाक्रम क्या हैं?
- ग्रामीण जल शासन और सेवा वितरण में सुधार: अधोसंरचना के निर्माण से नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण मॉडल की ओर संक्रमण भारत के ग्रामीण जल शासन में एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार को दर्शाता है।
- यह रणनीतिक परिवर्तन मात्र स्थापना लक्ष्यों के बजाय दीर्घकालिक परिचालन स्थिरता, समुदाय-संचालित स्वामित्व और सख्त डिजिटल निगरानी पर ज़ोर देता है।
- स्थानीय जवाबदेही और स्मार्ट मैपिंग को लागू करके, राज्य का लक्ष्य विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों में कार्यात्मक विश्वसनीयता सुनिश्चित करना तथा आपूर्ति विसंगतियों को समाप्त करना है।
- मार्च 2026 में, मंत्रिमंडल ने 8.69 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ जल जीवन मिशन को वर्ष 2028 तक विस्तारित किया तथा स्रोत से नल तक की मैपिंग के लिये 'सुजलाम भारत' डिजिटल फ्रेमवर्क शुरू किया। परिणामस्वरूप, भारत के 82% ग्रामीण परिवारों में अब नल कनेक्शन उपलब्ध हैं।
- सहभागी भूजल प्रबंधन: भारत ज़मीनी स्तर पर व्यवहारगत परिवर्तन तथा मांग-पक्ष प्रबंधन को प्रोत्साहित करते हुए सामुदायिक-नेतृत्व वाले भूजल पुनर्स्थापन का एक वैश्विक मॉडल सफलतापूर्वक विकसित कर रहा है।
- यह दृष्टिकोण शीर्ष-स्तरीय विनियमन से हटकर एक सहभागी ढाँचे की ओर अग्रसर है, जहाँ गाँव स्थानीय डिजिटल मॉनिटरिंग स्टेशनों से प्राप्त वास्तविक समय के आँकड़ों के आधार पर अपनी 'जल सुरक्षा योजना' तैयार करते हैं।
- अटल भूजल योजना ने जल सुरक्षा योजनाओं के निर्माण को सुगम बनाया है, जिससे ड्रिप सिंचाई जैसी जल-कुशल पद्धतियों के तहत व्यापक क्षेत्र को शामिल किया गया है।
- वर्ष 2025 के उत्तरार्द्ध के आँकड़ों से पता चलता है कि 229 उच्च प्राथमिकता वाले ब्लॉकों में से 83 में इन सामुदायिक हस्तक्षेपों के कारण भूजल स्तर में गिरावट में उल्लेखनीय उलट-फेर देखने को मिल चुका है।
- स्मार्ट शहरी अवसंरचना और 24/7 आपूर्ति: 'स्मार्ट जल प्रबंधन' (SWM) के माध्यम से शहरी जल प्रणालियों का तीव्र आधुनिकीकरण प्रणालीगत अक्षमताओं को काफी हद तक कम कर रहा है तथा भारत के बढ़ते शहरों में अधिक न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित कर रहा है।
- IoT-सक्षम सेंसर, SCADA सिस्टम और AI-ड्रिवेन लीक का पता लगाने वाली प्रणालियों को एकीकृत करके, नगर निकाय अब उन उच्च गैर-राजस्व जल (NRW) स्तरों से प्रभावी रूप से निपट रहे हैं, जो पहले शहरी क्षेत्रों को प्रभावित करते थे।
- उदाहरण के लिये, हाल ही में नागपुर नगर निगम ने रोबोटिक हस्तक्षेप और IoT निगरानी के माध्यम से गैर-राजस्व जल (NRW) को 29% से नीचे लाने की रिपोर्ट दी है।
- साथ ही, केंद्रीय बजट 2025-26 में 'स्मार्ट वाटर ग्रिड' को प्राथमिकता दी गई है, जिन्हें अब जल की गुणवत्ता और वितरण की वास्तविक काल में निगरानी सुनिश्चित करने के लिये बड़े पैमाने पर लागू किया जा रहा है।
- नदी अंतर्संबंध और क्षेत्रीय पुनर्वितरण: नदी अंतर्संबंध जैसे मैक्रो-इंजीनियरिंग हस्तक्षेपों का उद्देश्य बेसिन के अधिशेष जल को चिरस्थायी रूप से सूखाग्रस्त, कृषि-निर्भर क्षेत्रों में स्थानांतरित करके जल संसाधनों का लोकतंत्रीकरण करना है।
- हालाँकि यह रणनीति स्थानीय मानसून की विफलताओं के विरुद्ध एक मज़बूत सुरक्षा कवच प्रदान करती है और क्षेत्रीय आर्थिक समानता को बढ़ावा देती है, लेकिन साथ ही साथ इससे पर्याप्त पारिस्थितिक व्यवधान एवं जैव विविधता के नुकसान का खतरा भी है।
- उदाहरण के लिये, केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना में शुष्क बुंदेलखंड क्षेत्र की सिंचाई के लिये दाउधान बाँध और 221 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण शामिल है।
- जलभृत मानचित्रण और तकनीकी हस्तक्षेप: भूमिगत जल विज्ञान निगरानी में उच्च-रिज़ॉल्यूशन, अत्याधुनिक तकनीकी निगरानी का एकीकरण सक्रिय भूजल प्रबंधन में मूल रूप से क्रांति ला देता है।
- व्यापक अनुमानों से हटकर अत्यधिक स्थानीयकृत, डेटा-संचालित जलभृत मानचित्रण की ओर संक्रमण करने से नीति निर्माताओं को लक्षित, स्थल-विशिष्ट कृत्रिम पुनर्भरण हस्तक्षेपों को क्रियान्वित करने में सहायता मिलती है।
- उदाहरण के लिये, केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) NAQUIM को लागू कर रहा है, जिसमें जलभृतों का मानचित्रण करने, पुनर्भरण क्षेत्रों का अभिनिर्धारण करने तथा भूजल स्थिरता का आकलन करने के लिये रिमोट सेंसिंग एवं GIS जैसे उन्नत उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है तथा हेलीकॉप्टर आधारित सर्वेक्षण हाई-रिज़ॉल्यूशन वाले उपसतही विश्लेषण को सक्षम बना रहे हैं।
- केंद्रीय जल आयोग द्वारा आंतरिक रूप से विकसित 'फ्लड वॉच इंडिया' ऐप, सटीक और समय पर बाढ़ पूर्वानुमान प्रदान करने के लिये सैटेलाइट डेटा एनालिसिस, गणितीय मॉडलिंग और वास्तविक समय की निगरानी जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करता है।
- अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और चक्रीय अर्थव्यवस्था: नगरपालिका और औद्योगिक अपशिष्ट जल का व्यवस्थित उपचार एवं गैर-पेय अनुप्रयोगों के लिये पुन: उपयोग करने से तनावग्रस्त प्राथमिक अलवण जल के जलाशयों पर निष्कर्षण का दबाव काफी हद तक कम हो जाता है।
- विकेंद्रीकृत जल-शोधन अवसंरचना की स्थापना न केवल शहरी जल चक्र को पूर्ण करती है बल्कि प्राकृतिक नदी पारिस्थितिक तंत्रों में अनुपचारित सीवेज के निर्वहन के कारण होने वाले गंभीर पर्यावरणीय क्षरण को भी कम करती है।
- प्रमुख महानगर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की क्षमता को सक्रिय रूप से बढ़ा रहे हैं, अकेले बंगलूरू में वर्ष 2026 के मध्य तक 26 नए संयंत्र जोड़े जाने की योजना है ताकि इसकी परिशोधित जल क्षमता को 2,200 MLD तक बढ़ाया जा सके।
- कृषि सूक्ष्म सिंचाई और दक्षता: भारत की जल सुरक्षा को सुनिश्चित करना काफी हद तक कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने पर निर्भर करता है, जो देश के अलवण जल के संसाधनों के विशाल बहुमत का असमान रूप से उपभोग करता है।
- पुरातन और अपव्ययी फ्लड इरीगेशन से हटकर परिशुद्ध सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने से वाष्पीकरण एवं अपवाह में भारी कमी आती है, जिससे जड़ों तक सीधे नमी की इष्टतम आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
- चल रही 'Per Drop More Crop (प्रति बूॅंद अधिक फसल)' योजना के तहत, केंद्र सरकार ने खेती के कारण होने वाले 87-90% भूजल दोहन को कम करने के लिये ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों को व्यापक रूप से अपनाने हेतु सक्रिय रूप से प्रोत्साहन दिया है।
नोट: इन विकासों के बावजूद, अनियमित मानसून और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चरम मौसमी घटनाओं, भूजल के अत्यधिक दोहन, जनसंख्या एवं शहरीकरण से बढ़ती मांग तथा अक्षमता व प्रदूषण जैसी स्थायी समस्याओं के कारण भारत में जल सुरक्षा अभी भी दबाव में बनी हुई है।
- जल संकट तब उत्पन्न होता है जब किसी निश्चित अवधि के दौरान जल की मांग उपलब्ध मात्रा से अधिक हो जाती है या जब निम्न गुणवत्ता के कारण इसका उपयोग सीमित हो जाता है।
- यह किसी विशिष्ट क्षेत्र में जल की स्थिति के 'तनाव' का एक माप है, जिसकी गणना कुल जल निकासी और उपलब्ध नवीकरणीय आपूर्ति के अनुपात के रूप में की जाती है।
- विश्व की जल आपूर्ति का मात्र 4% हिस्सा होने के बावजूद, भारत की जनसंख्या विश्व की 18% है, जिसके कारण यह विश्व के सबसे अधिक जल संकटग्रस्त देशों में से एक है।
जलवायु परिवर्तन भारत में जल संकट को किस प्रकार बढ़ा रहा है?
- हिमनदों का विगलन और बारहमासी नदी प्रवाह का क्षरण: वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण हिमालय क्षेत्रों में हिमनदों के तेज़ी से पिघलने से भारत की प्रमुख नदियों के बारहमासी स्वरूप को खतरा उत्पन्न हो रहा है।
- यद्यपि प्रारंभिक विगलन कृत्रिम रूप से अपवाह को बढ़ाता है, किंतु 'पीक वाटर' सीमा को पार करने के बाद आधारभूत प्रवाह में स्थायी और विनाशकारी कमी आ जाती है।
- इससे शुष्क ग्रीष्म ऋतुओं के दौरान उत्तरी मैदानी इलाकों में कृषि और घरेलू जल सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा 30 वर्षों के उपग्रह आँकड़ों का उपयोग करके किये गए एक अध्ययन से पता चलता है कि हिमालय में 676 हिमनद झीलें (10 हेक्टेयर से अधिक) विस्तृत हुई हैं (1984-2023), जिनमें भारत में 130 झीलें शामिल हैं, जिससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा बढ़ गया है।
- इसके अलावा, अनुमानों से संकेत मिलता है कि यदि शमन उपाय नहीं किये गए तो सिंधु और गंगा बेसिन में महत्त्वपूर्ण नदी प्रवाह 2050 के दशक तक गंभीर रूप से कम हो सकता है।
- यद्यपि प्रारंभिक विगलन कृत्रिम रूप से अपवाह को बढ़ाता है, किंतु 'पीक वाटर' सीमा को पार करने के बाद आधारभूत प्रवाह में स्थायी और विनाशकारी कमी आ जाती है।
- शहरी विस्तार और भूजल का पतन: जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित मानसून के साथ-साथ तीव्र, अनियोजित शहरीकरण ने भारत के प्रमुख महानगरों में प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण तंत्र को गतिहीन बना दिया है।
- प्राकृतिक भूभागों का व्यापक रूप से कंक्रीटीकरण होने से जल का रिसाव बाधित होता है, जिसके कारण शहरों को बढ़ती नगरपालिका मांगों को पूरा करने के लिये सीमित जलभृतों से अत्यधिक दोहन करना पड़ता है। यह अस्थिर निर्भरता स्थानीय स्तर पर जलभृतों के गंभीर रूप से नष्ट होने और दीर्घकालिक सूखे के प्रति सुभेद्यता बढ़ने का कारण बनती है।
- सत्र 2024-2025 के बंगलूरू के गंभीर जल संकट के दौरान, शहर के 14,000 नगरपालिका बोरवेलों में से लगभग आधे सूख गए क्योंकि बाह्य क्षेत्रों में भूजल स्तर 15 मीटर तक गिर गया था।
- केंद्रीय भूजल बोर्ड के वर्ष 2025 के आकलन में शहर की सभी शहरी इकाइयों को 'अति-शोषित' के रूप में वर्गीकृत किया गया, जिसमें जल दोहन की दर को उजागर किया गया जो इसके मामूली 10% प्राकृतिक पुनर्भरण से कहीं अधिक है।
- कृषि संबंधी भेद्यता और अनियमित मानसून: जलवायु परिवर्तन पारंपरिक मानसून के पैटर्न को तेज़ी से बदल रहा है, जिससे स्थिर मौसमी वर्षा की जगह तीव्र, अल्पकालिक क्लाउड बर्स्ट की घटनाएँ हो रही हैं, जिसके बाद लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है।
- इस अस्थिरता के कारण मृदा की प्रभावी नमी में भारी कमी आती है और कृषि सिंचाई के लिये जलाशयों में अपवाह जल के कुशल संग्रहण में बाधा उत्पन्न होती है।
- परिणामस्वरूप, किसानों को जल-गहन फसलों को बनाए रखने के लिये पहले से ही तनावग्रस्त भूजल भंडारों पर अत्यधिक निर्भर रहना पड़ता है, जिससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को सीधा खतरा होता है।
- सुधारों के बावजूद, भूजल पर दबाव बना हुआ है, जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर भूजल निष्कर्षण का स्तर 60.63% है तथा अनेक क्षेत्र अभी भी संकटग्रस्त, अर्द्ध-संकटग्रस्त एवं अतिदोहन श्रेणियों में आते हैं, जो क्षेत्रीय अति-उपयोग एवं स्थिरता संबंधी चिंताओं को दर्शाता है।
- इस अस्थिरता के कारण मृदा की प्रभावी नमी में भारी कमी आती है और कृषि सिंचाई के लिये जलाशयों में अपवाह जल के कुशल संग्रहण में बाधा उत्पन्न होती है।
- तटीय लवणता का प्रवेश और समुद्र-स्तर वृद्धि: भूमंडलीय तापमान में वृद्धि और उसके परिणामस्वरूप समुद्र स्तर में वृद्धि भारत के विशाल तटीय क्षेत्रों के सुभेद्य अलवण जल के जलभृतों में तीव्र रूप से लवणीय जल के प्रवेश को बढ़ावा दे रही है।
- लवणता का यह क्रमिक प्रसार महत्त्वपूर्ण भूजल संसाधनों को स्थायी रूप से दूषित कर रहा है, जिससे तटीय कृषि भूमि नष्ट हो रही है तथा स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र ध्वस्त हो रहे हैं।
- सुंदरबन और तटीय गुजरात जैसे सुभेद्य क्षेत्रों में, समुद्री जल के इस अतिक्रमण से पहले ही लाखों वंचित निवासियों के लिये पेय जल की उपलब्धता को काफी कम कर दिया है।
- वर्ष 2100 के लिये सबसे प्रतिकूल परिदृश्य के अनुसार मुंबई में समुद्र-स्तर में 101.4 सेमी. तक वृद्धि हो सकती है, जिससे व्यापक तटीय जलमग्नता और जलभृतों की अपरिवर्तनीय हानि का खतरा है।
- अत्यधिक उष्ण तरंगें और वाष्पोत्सर्जन में वृद्धि: भारत में वर्तमान में हीट वेव्स वाले दिनों में भीषण वृद्धि देखी जा रही है तथा वर्ष 2030 तक दिल्ली और चेन्नई जैसे प्रमुख महानगरीय क्षेत्रों में इनकी संख्या दोगुनी होने का अनुमान है।
- भारतीय उपमहाद्वीप में भीषण हीट वेव्स की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता के कारण मृदा एवं सतही जल निकायों से वाष्पोत्सर्जन की दर में तेज़ी से वृद्धि हो रही है।
- इस तीव्र नमी की कमी से महत्त्वपूर्ण बाँधों और झीलों की भंडारण क्षमता ऐतिहासिक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से घट रही है।
- साथ ही, भीषण गर्मी के कारण सबसे चरम ग्रीष्म महीनों के दौरान शीतलन, घरेलू उपयोग और फसलों के उत्तरजीविता के लिये जल की अधिकतम मांग बढ़ जाती है।
- जल गुणवत्ता का अवनयन और प्रदूषण की सांद्रता: जलवायु परिवर्तन के कारण अनावृष्टि (सूखे) की अवधि बढ़ने और नदियों के आधार प्रवाह में कमी आने के कारण भारत के प्रमुख जलमार्गों की प्राकृतिक जल निकासी क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है।
- परिणामस्वरूप, जल में औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित शहरी सीवेज और जहरीले कृषि अपवाह शेष की खतरनाक रूप से सांद्रता बढ़ जाती है।
- इससे घटते मीठे (अलवण) जल के स्रोत विषाक्त, अनुपयोगी जलाशयों में परिवर्तित हो जाते हैं, जो गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करते हैं तथा जलीय जैव विविधता को नष्ट करते हैं।
- NITI आयोग और हालिया पर्यावरणीय आकलनों के अनुसार भारत का लगभग 70% सतही जल प्रदूषित है, जिससे वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में देश 122 में से 120वें स्थान पर है।
- यमुना जैसी प्रमुख नदियों में लंबे शुष्क काल के दौरान जल का प्रवाह कम होने से भारी धातुओं और नाइट्रेट की सांद्रता लाखों लोगों के लिये प्राण-घातक स्तर तक बढ़ गई है।
- परिणामस्वरूप, जल में औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित शहरी सीवेज और जहरीले कृषि अपवाह शेष की खतरनाक रूप से सांद्रता बढ़ जाती है।
भारत में जल संकट के अन्य कारण क्या हैं?
- कृषि सब्सिडी विकृतियाँ: अनुचित प्रोत्साहन संरचनाएँ, जैसे बिना मीटर की कृषि विद्युत आपूर्ति और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, फसल चयन को अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में धान और गन्ना जैसी अत्यधिक जल-उपभोगी फसलों के लिये अत्यधिक प्रेरित करती हैं।
- नीतिगत कारणों से उत्पन्न यह ‘जल-संबंधी तर्कहीनता’ अक्षम फ्लड इरीगेशन के माध्यम से अनियंत्रित भूजल दोहन को प्रोत्साहित करती है, जिससे गहन जलभृतों का अपनी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक पूर्णतः ह्रास हो जाता है।
- परिणामस्वरूप, कृषि में भारत के कुल ताजे (अलवण) जल का 85% से अधिक उपभोग होता है तथा पंजाब जैसे राज्यों में भूजल दोहन उसकी प्राकृतिक पुनर्भरण दर के अत्यंत विनाशकारी स्तर तक पहुँच चुका है।
- नीतिगत कारणों से उत्पन्न यह ‘जल-संबंधी तर्कहीनता’ अक्षम फ्लड इरीगेशन के माध्यम से अनियंत्रित भूजल दोहन को प्रोत्साहित करती है, जिससे गहन जलभृतों का अपनी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से कहीं अधिक पूर्णतः ह्रास हो जाता है।
- अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद और राजनीतिक गतिरोध: जल शासन का विखंडन और अंतर-सीमावर्ती नदी घाटियों पर गहन राजनीतिक गतिरोध एक समन्वित, वैज्ञानिक आधार वाले राष्ट्रीय जल-वितरण ढाँचे के निर्माण को बाधित करता है।
- जब राज्य राजनीतिक लाभ हेतु नदी तटीय अधिकारों का उपयोग करते हैं, तब आवश्यक अधोसंरचना परियोजनाएँ तथा आपातकालीन सूखा-साझाकरण प्रोटोकॉल निरंतर ठप्प पड़ जाते हैं, जिससे क्षेत्रीय जल-अभाव और बढ़ जाता है, जैसा कि कर्नाटक एवं तमिलनाडु के बीच लंबे समय से चल रहे कावेरी जल विवाद में देखा गया है।
- अधोसंरचना का क्षरण और उच्च गैर-राजस्व जल (NRW): शहरी उपयोगिता तंत्र में दीर्घकालिक निवेश की कमी के कारण भारत के नगरपालिका जल वितरण नेटवर्क में अदृश्य रिसाव, पुरानी औपनिवेशिक काल की पाइपें और बड़े पैमाने पर अनधिकृत जल-दोहन जैसी समस्याएँ व्याप्त हैं।
- इस परिचालन अक्षमता के कारण समान आपूर्ति बुरी तरह बाधित होती है, जिससे बिजली कंपनियों को वास्तविक खपत के बजाय भारी संचरण हानि की भरपाई के लिये कच्चे जल का अत्यधिक दोहन करने के लिये मजबूर होना पड़ता है।
- भारत की शहरी बिजली कंपनियाँ औसतन 38% पेय जल को गैर-राजस्व जल के रूप में खो देती हैं, जो वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य मानक (ORF) 15-20% से लगभग दोगुना है।
- अनियमित रेत खनन और नदी तल का क्षरण: तेज़ी से बढ़ते रियल एस्टेट क्षेत्र के कारण नदी रेत की अतृप्त एवं प्रायः अवैध मांग उत्पन्न होती है, जिससे आक्रामक यांत्रिक उत्खनन द्वारा प्राकृतिक तटीय अवरोधों और नदी तल संरचनाओं का पूर्ण विनाश हो जाता है।
- यह व्यवस्थित विनाश नदी के जल-प्रवाह विज्ञान को गंभीर रूप से परिवर्तित करता है, जिससे स्थानीय जलस्तर में भारी गिरावट आती है, अपरदन बढ़ता है और पारिस्थितिकी तंत्र की आधारभूत प्रवाह के स्वाभाविक जल-संरक्षण एवं निस्यंदन क्षमता को समाप्त कर देता है।
- अपर्याप्त सीवेज उपचार और चक्रीय अर्थव्यवस्था की कमी: नगरपालिका जल-शोधन अवसंरचना की भारी कमी के कारण वस्तृत होते शहर एवं उद्योग बिना उपचारित विषैले अपशिष्ट को सीधे महत्त्वपूर्ण अलवण जल स्रोतों में छोड़ देते हैं।
- नदियों को आधुनिक चक्रीय उपयोगिता व्यवस्था में अपशिष्ट जल पुनःउपयोग के बजाय खुले अपशिष्ट निस्तारण माध्यम के रूप में उपयोग करना देश के उपलब्ध सतही जल संसाधनों को स्वयं नष्ट करने के समान है।
- स्थानिक अतिजनसंख्या और मांग-आपूर्ति विषमता: तीव्र आर्थिक प्रवासन के कारण टियर-1 मेगासिटी (जैसे, नई दिल्ली, बंगलूरू) में बड़े पैमाने पर स्थानीय घनत्व में वृद्धि एक ऐसी दुर्गम मांग-आपूर्ति विषमता उत्पन्न करती है, जो स्थानीय जल संग्रहण क्षमताओं को पूरी तरह से विफल कर देती है।
- जब ये शहरी केंद्र अपनी स्थानीय जल-स्रोत क्षमता से आगे बढ़ जाते हैं, तब सरकारों को केवल बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु पारिस्थितिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक महँगी अंतर-बेसिन जल अंतरण मेगा-परियोजनाओं का सहारा लेना पड़ता है।
भारत में प्रभावी जल प्रबंधन के प्रमुख केस स्टडी कौन-कौन से हैं?
- हिवरे बाज़ार, अहमदनगर (महाराष्ट्र): 'मिलियनेयर विलेज' मॉडल
- हिवरे बाज़ार सहभागितापूर्ण भूजल प्रबंधन का सर्वोत्तम उदाहरण है, जिसने सूखा-ग्रस्त और निर्धन गाँव से भारत के सबसे समृद्ध गाँवों में स्थान प्राप्त किया है।
- लापोरिया, जयपुर (राजस्थान): 'चौका' प्रणाली नवोन्मेष: लापोरिया अपनी पारंपरिक ‘चौका’ प्रणाली के लिये प्रसिद्ध है।
- यह प्रणाली उथले, आयताकार गड्ढों (चौका) की एक शृंखला होती है, जो तटबंधों द्वारा जुड़े होते हैं जो अपवाह को धीमा कर देती है, जिससे जल मिट्टी में समाहित हो जाता है तथा अपरदन नहीं होता।
- इसने क्षतिग्रस्त सामुदायिक भूमि को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित कर हरे-भरे चरागाहों में परिवर्तित कर दिया है, जिससे वर्षभर चारे की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है तथा बिना किसी महॅंगे इंजीनियरिंग खर्च के स्थानीय जलभृत का पुनर्भरण संभव हुआ है।
- थुरुथिक्करा, एर्नाकुलम (केरल): ‘ऊर्जा निर्मला हरित’ मॉडल
- यह एक सामुदायिक, वैज्ञानिक आधार पर विकसित मॉडल है, जिसमें परिवारों ने छतों पर वर्षा जल संचयन और कुओं की पुनर्भरण प्रणालियों को अपनाया है, जिससे वर्षभर जल उपलब्धता सुनिश्चित हुई है।
- यह गाँव स्थानीय भागीदारी के माध्यम से जल गुणवत्ता निगरानी और पुन: उपयोग को भी प्रोत्साहित करता है, जिससे यह एक आत्मनिर्भर एवं सतत 'हरित ग्राम' मॉडल बन जाता है।
- सीतामढ़ी ज़िला (बिहार): 'सोख्ता गड्ढा' क्रांति: सीतामढ़ी ने जलभराव और भूजल की कमी की दोहरी समस्याओं से निपटने के लिये एक ही दिन में 2,000 से अधिक सामुदायिक एवं घरेलू सोख्ता गड्ढों का निर्माण कर कीर्तिमान स्थापित किया।
- इस आंदोलन ने हैंडपंपों और स्कूलों से निकलने वाले अपशिष्ट जल को वैज्ञानिक रूप से डिज़ाइन किये गए गड्ढों में प्रवाहित कर ज़िले के ‘अपशिष्ट से जल’ के दृष्टिकोण को साकार किया, जो कृत्रिम पुनर्भरण संरचनाओं के रूप में कार्य करते हैं।
- यह बाढ़ प्रभावित किंतु भूजल संकटग्रस्त क्षेत्र में कम लागत और उच्च गति वाले प्रशासनिक हस्तक्षेप का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
भारत में जल सुरक्षा को सुदृढ़ करने के लिये आवश्यक उपाय क्या हैं?
- कृषि-पारिस्थितिक फसल पुनर्व्यवस्थापन: राज्य-निर्देशित कृषि-जलवायु क्षेत्रीकरण के अंतर्गत जल-गहन प्रमुख फसलों के स्थान पर सूखा-सहिष्णु कदन्न फसलों को लक्षित प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- यह पुनर्संरचना बिना मीटर वाली विद्युत जैसी अनुचित प्रोत्साहन व्यवस्थाओं को समाप्त करते हुए जलवायु-अनुकूल कृषि के लिये मज़बूत क्रय-संबद्धताओं की स्थापना करती है।
- सूक्ष्म सिंचाई और मृदा-नमी सेंसरों पर सार्वभौमिक सब्सिडी से अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में जल उपयोग दक्षता को अनुकूलित किया जा सकेगा।
- चक्रीय शहरी जल अर्थव्यवस्था को अनिवार्य बनाना: नगरपालिकाओं को विकेंद्रीकृत सीवेज शोधन और गैर-पेयजल की पुनर्प्राप्ति के लिये दोहरी पाइपिंग को अनिवार्य करके एक चक्रीय जल प्रतिमान को संस्थागत रूप देना चाहिये।
- यह क्लोज्ड-लूप सिस्टम प्राथमिक जलाशयों पर जल-निष्कर्षण के दबाव को कम करते हुए शहरी उपयोगिता के लिये विश्वसनीय, जलवायु-निरपेक्ष द्वितीयक जल भंडार निर्मित करती है।
- उद्योगों के लिये अनिवार्य शून्य-द्रव अपशिष्ट निर्वहन, निचले इलाकों के जलीय पारितंत्रों के विषैले प्रदूषण को एक साथ रोक सकेगा।
- यह क्लोज्ड-लूप सिस्टम प्राथमिक जलाशयों पर जल-निष्कर्षण के दबाव को कम करते हुए शहरी उपयोगिता के लिये विश्वसनीय, जलवायु-निरपेक्ष द्वितीयक जल भंडार निर्मित करती है।
- सहभागी जलभृत शासन का लोकतंत्रीकरण: ज़मीनी स्तर पर जल-भूवैज्ञानिक बजट को स्थानीय समुदायों को वास्तविक समय में जलभृत पुनर्भरण क्षमताओं के आधार पर सामूहिक भूजल निष्कर्षण की निगरानी एवं विनियमन करने के लिये सशक्त बनाना चाहिये।
- प्रकृति-आधारित समाधानों को ग्रामीण रोज़गार योजनाओं के साथ एकीकृत करने से स्वदेशी जल संचयन संरचनाओं और सूक्ष्म जल संग्रहण क्षेत्रों के पुनर्भरण का व्यापक पुनर्स्थापन संभव हो पाता है।
- यह विकेंद्रीकृत प्रबंधन साझा संसाधनों के दुरुपयोग की त्रासदी को रोकता है और भूजल को एक संरक्षित, साझा पारिस्थितिक धरोहर के रूप में मान्यता देता है।
- प्रकृति-आधारित समाधानों को ग्रामीण रोज़गार योजनाओं के साथ एकीकृत करने से स्वदेशी जल संचयन संरचनाओं और सूक्ष्म जल संग्रहण क्षेत्रों के पुनर्भरण का व्यापक पुनर्स्थापन संभव हो पाता है।
- जल-आर्थिक शुल्क युक्तिकरण: जल की वास्तविक जल-आर्थिक लागत को प्रतिबिंबित करने और अत्यधिक खपत पर दंड लगाने के लिये सार्वभौमिक स्मार्ट-मीटरिंग और टेलीस्कोपिक शुल्क संरचनाओं को लागू करना आवश्यक है। सार्वभौमिक स्मार्ट मीटरिंग और चरणबद्ध दर संरचनाओं का क्रियान्वयन जल की वास्तविक आर्थिक लागत को प्रतिबिंबित करने तथा अत्यधिक उपभोग पर दंड लगाने के लिये आवश्यक है।
- उत्पन्न राजस्व को नगरपालिका वितरण तंत्र के आधुनिकीकरण हेतु आरक्षित रखा जाना चाहिये ताकि वर्तमान में प्रचलित विनाशकारी संचरण हानियों को न्यूनतम किया जा सके।
- स्वतंत्र जल नियामकों की स्थापना से मूल्य निर्धारण का राजनीतिकरण समाप्त हो जाएगा तथा शहरी जल बोर्डों की दीर्घकालिक वित्तीय व्यवहार्यता सुनिश्चित होगी।
- एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन: खंडित तटीय प्रशासन के स्थान पर ऐसी तकनीकी नदी-घाटी प्राधिकरणों की स्थापना की जानी चाहिये जो हिमनदीय उद्गम से लेकर डेल्टा तक संपूर्ण नदी तंत्र का एकल पारिस्थितिक इकाई के रूप में प्रबंधन करें।
- इन प्राधिकरणों को न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह और प्राकृतिक अवसाद परिवहन को प्राथमिकता देनी चाहिये ताकि घाटी का जलवैज्ञानिक स्वास्थ्य बना रहे।
- गतिशील, डेटा-आधारित जल-वितरण विधायी व्यवस्था का निर्माण सूखा-चक्रों के दौरान अंतर-राज्यीय राजनीतिक गतिरोध को निष्प्रभावी करेगा।
- जलवायु-अनुकूल जलग्रहण पारिस्थितिकी तंत्रों का विकास: ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों और शहरी आर्द्रभूमियों का सशक्त पुनर्स्थापन मृदा को बाँधने तथा गहन स्तर पर जलभृत पुनर्भरण को सुगम बनाने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- बाढ़-मैदानों और पुनर्भरण क्षेत्रों के कंक्रीटीकरण के प्रति विधिक संरक्षण, चरम मौसमी घटनाओं के विरुद्ध परिदृश्य की अंतर्निहित अवशोषण क्षमता को पुनर्स्थापित करेगा।
- नीला-हरित अवसंरचना को पारंपरिक इंजीनियरिंग के साथ समन्वित करने से आधारभूत जल भंडारों का स्वाभाविक, दीर्घकालिक पुनर्भरण सुनिश्चित होता है।
- बाढ़-मैदानों और पुनर्भरण क्षेत्रों के कंक्रीटीकरण के प्रति विधिक संरक्षण, चरम मौसमी घटनाओं के विरुद्ध परिदृश्य की अंतर्निहित अवशोषण क्षमता को पुनर्स्थापित करेगा।
- डिजिटल जल शासन और स्मार्ट अवसंरचना: 'डिजिटल ट्विन्स' और IoT-सक्षम स्मार्ट ग्रिड का विस्तार संपूर्ण जल उपयोग शृंखला में रियल टाइम हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग और पूर्वानुमानित रिसाव पहचान को संभव बनाता है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता जलाशय संचालन और मांग पूर्वानुमान को अनुकूलित कर अस्थिर आपूर्ति एवं तीव्र शहरी मांग के बीच के अंतर को समाप्त किया जा सकता है।
- यह डिजिटल परिवर्तन जल प्रबंधन को प्रतिक्रियात्मक संकट-प्रतिक्रिया से सक्रिय, आँकड़ा-आधारित शासन ढाँचे में रूपांतरित करता है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता जलाशय संचालन और मांग पूर्वानुमान को अनुकूलित कर अस्थिर आपूर्ति एवं तीव्र शहरी मांग के बीच के अंतर को समाप्त किया जा सकता है।
- लवण-उन्मूलन एवं गैर-पारंपरिक स्रोतों का एकीकरण: तटीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों को नवीकरणीय ऊर्जा संचालित लवण-उन्मूलन तथा वायुमंडलीय जल उत्पादन तकनीकों का उपयोग कर राष्ट्रीय जल संसाधन आधार का विविधीकरण करना चाहिये।
- इन अपारंपरिक स्रोतों के एकीकरण से अत्यधिक दबावग्रस्त नदी घाटियों पर निर्भरता घटेगी तथा आंतरिक जलभृतों का क्षय रोका जा सकेगा।
- लवणीय अपशिष्ट प्रबंधन हेतु सुदृढ़ नीतिगत ढाँचे की स्थापना यह सुनिश्चित करेगी कि प्रौद्योगिकी विस्तार समुद्री जैव-विविधता और तटीय स्वास्थ्य को क्षति न पहुँचाए।
निष्कर्ष:
भारत की जल सुरक्षा अब एक स्थानीयकृत अवसंरचनात्मक चुनौती मात्र नहीं रह गई है, बल्कि यह जलवायु-सहिष्णु राष्ट्रीय संप्रभुता का एक प्रमुख स्तंभ बन चुकी है। केवल परिसंपत्ति निर्माण से आगे बढ़कर एक परिष्कृत जल-आर्थिक चक्रीय प्रणाली की ओर संक्रमण करके राष्ट्र अपने आर्थिक विकास को जल संसाधनों के क्षय से संरक्षण कर सकता है। विकेंद्रीकृत सामुदायिक अभिरक्षण को उच्च-प्रौद्योगिकी आधारित डिजिटल शासन के साथ एकीकृत करना 21वीं शताब्दी के अनिश्चित मानसून के विरुद्ध एक निर्णायक सुरक्षा उपाय सिद्ध होगा। अंततः, भारत के 'नीले स्वर्ण' का सफल प्रबंधन ही उसे एक सतत वैश्विक शक्ति के रूप में उसकी दिशा निर्धारित करेगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न “भारत के तेज़ी से बढ़ते शहरी केंद्रों के लिये रैखिक जल अर्थव्यवस्था से चक्रीय जल अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण ही एकमात्र व्यवहार्य मार्ग है।” बढ़ते गैर-राजस्व जल (NRW) और तीव्र शहरीकरण के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. सुजलाम भारत क्या है?
यह वर्ष 2026 में विस्तारित जल जीवन मिशन के अंतर्गत प्रारंभ किया गया एक डिजिटल ढाँचा है, जो स्रोत से नल तक मानचित्रण और ग्रामीण जल आपूर्ति की वास्तविक काल निगरानी सुनिश्चित करता है।
प्रश्न 2. भारत की सिंचाई का कितना हिस्सा भूजल पर निर्भर करता है?
भारत की लगभग 65% सिंचाई और 85% ग्रामीण पेयजल आपूर्ति वर्तमान में भूमिगत जलभृतों पर आधारित है।
प्रश्न 3. 'गैर-राजस्व जल' (NRW) क्या है?
यह वह शोधित जल है जो उपभोक्ता तक पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाता है, जिसका कारण रिसाव, चोरी या मापन में त्रुटियाँ होती हैं; भारतीय शहरों में यह हानि 30% से 50% के बीच होती है।
प्रश्न 4. NAQUIM 2.0 क्या है?
यह भारत के राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण कार्यक्रम का उन्नत चरण है, जिसमें भू-भौतिकीय प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके जल-संकटग्रस्त और जल-गुणवत्ता प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की जाती है।
प्रश्न 5. 'पूर्ण जल संकट' की सीमा क्या है?
अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार, जब किसी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,000 घन मीटर से नीचे गिर जाती है, तब वह क्षेत्र पूर्ण जल अभाव की स्थिति का सामना करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-सा प्राचीन नगर अपने उन्नत जल संचयन और प्रबंधन प्रणाली के लिये सुप्रसिद्ध है, जहाँ बांधों की शृंखला का निर्माण किया गया था और संबद्ध जलाशयों में नहर के माध्यम से जल को प्रवाहित किया जाता था? (2021)
(a) धौलावीरा
(b) कालीबंगा
(c) राखीगढ़ी
(d) रोपड़
उत्तर:(a)
प्रश्न 2. ‘वाटरक्रेडिट’ के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये- (2021)
- यह जल एवं स्वच्छता क्षेत्र में कार्य के लिये सूक्ष्म वित्त साधनों (माइक्रोफाइनेंस टूल्स) को लागू करता है।
- यह एक वैश्विक पहल है जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक के तत्त्वावधान में प्रारंभ किया गया है।
- इसका उद्देश्य निर्धन व्यक्तियों को सहायिकी के बिना अपनी जल-संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये समर्थ बनाना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सेे सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. जल संरक्षण एवं जल सुरक्षा हेतु भारत सरकार द्वारा प्रवर्तित जल शक्ति अभियान की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? (2020)
प्रश्न 2. रिक्तीकरण परिदृश्य में विवेकी जल उपयोग के लिये जल भंडारण और सिंचाई प्रणाली में सुधार के उपायों को सुझाइये। (2020)