शासन व्यवस्था
दिव्यांगजनों के लिये बाधा-मुक्त भारत का निर्माण
- 18 Mar 2026
- 200 min read
यह एडिटोरियल 17/03/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘For persons with disabilities, doors to theatres now open’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय भारत में दिव्यांग जन के अधिकारों के बदलते परिदृश्य का विश्लेषण करता है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता से एकीकृत सहायक प्रौद्योगिकी और डिजिटल समावेशन के लिये न्यायिक आदेशों की ओर परिवर्तन पर प्रकाश डाला गया है। यह प्रणालीगत बाधाओं का समालोचनात्मक विश्लेषण करते हुए वास्तविक समानता के लिये एक बहुआयामी रोडमैप का प्रस्ताव करता है।
प्रिलिम्स के लिये: दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016, सुगम्य भारत 2.0, दिव्यांगजन कौशल योजना, UDID पारिस्थितिकी तंत्र
मेन्स के लिये: भारत में दिव्यांगजनों को सशक्त बनाने के लिये उठाए गए कदम, प्रमुख मुद्दे और आवश्यक उपाय।
भारत में 2.68 करोड़ से अधिक दिव्यांग जन (जनगणना 2011) निवास करते हैं, जो जनसंख्या का लगभग 2.2% है, जिससे सुगम्यता संबंधी चुनौतियों के व्यापक स्तर का संकेत मिलता है। दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016 के तहत सार्वभौमिक सुलभता एवं समावेशी भागीदारी अनिवार्य होने के बावजूद, भौतिक, डिजिटल और सांस्कृतिक क्षेत्रों में बाधाएँ बनी हुई हैं। मार्च 2026 से फिल्मों में अनिवार्य ऑडियो विवरण और समान भाषा में कैप्शन जैसे हालिया उपाय सुलभ मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र की दिशा में एक परिवर्तन को दर्शाते हैं। इसलिये सार्वभौमिक डिज़ाइन, सहायक प्रौद्योगिकी और बाधा-मुक्त अधोसंरचना को मज़बूत करना वास्तविक समानता एवं समावेशी नागरिकता को साकार करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
भारत में दिव्यांग जनों के लिये अधिकार-आधारित ढाँचे के मूलभूत स्तंभ क्या हैं?
- संवैधानिक आधार: संविधान अपने मूल अधिकारों में 'अक्षमता' का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं करता है, किंतु यह वास्तविक समानता के माध्यम से व्यापक संरक्षण प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 14 और 15: ये विधि के समक्ष समता की गारंटी देते हैं तथा भेद-भाव का निषेध करते हैं।
- विकास कुमार बनाम संघ लोक सेवा आयोग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि केवल ‘मानक दिव्यांगता’ (40%) की सीमा को पूरा न करने के आधार पर दिव्यांगजन को ‘युक्तियुक्त सुविधा’ से वंचित नहीं किया जा सकता।
- न्यायालय ने फैसला सुनाया कि परीक्षाओं में लेखक (scribe) की व्यवस्था ‘युक्तियुक्त सुविधा’ का एक रूप है तथा यह दिव्यांगजनों के लिये वास्तविक समानता और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है।
- अनुच्छेद 21: प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि डिजिटल एक्सेस अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक हिस्सा है तथा अधिकारियों को KYC प्रक्रियाओं को सुलभ बनाने का निर्देश दिया, जिसमें समावेशी प्रक्रियाओं, सुलभ प्रारूपों एवं दिव्यांगजनों के लिये शिकायत निवारण तंत्र को अनिवार्य किया गया।
- अनुच्छेद 41 (DPSP): राज्य को दिव्यांगता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता प्रदान करने का आदेश देता है, जो कल्याणकारी योजनाओं के लिये दिशा-निर्देश का गठन करता है।
- सातवीं अनुसूची: 'दिव्यांगजनों को राहत' राज्य सूची (प्रविष्टि 9) का विषय है, जिससे राज्य सरकारें प्रमुख क्रियान्वयनकर्त्ता बन जाती हैं।
- अनुच्छेद 14 और 15: ये विधि के समक्ष समता की गारंटी देते हैं तथा भेद-भाव का निषेध करते हैं।
- विधिक ढाँचा: दिव्यांगजन अधिनियम, 1995 से दिव्यांगजन अधिकार (RPwD) अधिनियम, 2016 की ओर संक्रमण, भारत के ‘संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD), 2007 के साथ समन्वय को दर्शाता है।
- RPwD अधिनियम, 2016: यह प्रमुख कानून है जिसने दिव्यांगता की श्रेणियों को 7 से बढ़ाकर 21 कर दिया। इसके अंतर्गत सरकारी नौकरियों में 4% और उच्च शिक्षा में 5% आरक्षण अनिवार्य है।
- राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999: यह अधिनियम ऑटिज़्म’, ‘सेरेब्रल पाल्सी’ तथा ‘बहु-दिव्यांगता’ के लिये विशेष समर्थन प्रदान करता है, जिसमें विधिक अभिभावकत्व एवं सामुदायिक जीवन पर बल दिया गया है।
- भारतीय पुनर्वास परिषद (RCI) अधिनियम, 1992: यह पुनर्वास पेशेवरों के प्रशिक्षण का मानकीकरण करता है, जिससे ‘देखभाल के अधिकार’ को ‘गुणवत्तापूर्ण देखभाल’ का समर्थन प्राप्त होता है।
- संस्थागत ढाँचा: एक बहुस्तरीय पदानुक्रम यह सुनिश्चित करता है कि अधिकार केवल कागज़ों तक सीमित न रहकर वास्तविक रूप से भी लागू हों।
- दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (सामाजिक न्याय मंत्रालय): नीति निर्माण और अंतर-मंत्रालयी समन्वय (जैसे, सुलभ भारत अभियान) के लिये नोडल राष्ट्रीय निकाय।
- दिव्यांगजनों के लिये ‘विशिष्ट पहचान पत्र’ परियोजना के अंतर्गत एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार किया जा रहा है तथा प्रत्येक व्यक्ति को ‘विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र (UDID)’ प्रदान किया जा रहा है।
- दिव्यांगजनों के लिये मुख्य आयुक्त कार्यालय और राज्य आयुक्त: ये अर्द्ध-न्यायिक निकाय हैं जो लोकपाल के रूप में कार्य करते हैं। इन्हें अधिकारियों को उपस्थित होने हेतु बाध्य करने तथा अभिगम्यता मानकों के उल्लंघन की स्थिति में दंड आरोपित करने की शक्ति प्राप्त है।
- दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (सामाजिक न्याय मंत्रालय): नीति निर्माण और अंतर-मंत्रालयी समन्वय (जैसे, सुलभ भारत अभियान) के लिये नोडल राष्ट्रीय निकाय।
नोट: 15 मार्च, 2026 से ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ ने यह अनिवार्य किया है कि सभी फिल्मों में ‘ऑडियो विवरण’ तथा ‘समान भाषा उपशीर्षक/बंद शीर्षक’ शामिल किये जाएँ, ताकि दृष्टि एवं श्रवण बाधित दिव्यांगजनों के लिये अभिगम्यता सुनिश्चित की जा सके।
भारत में दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण को बढ़ावा देने वाले प्रमुख उपाय क्या हैं?
- डिजिटल फ्रंटियर-AI-एकीकृत सहायक प्रौद्योगिकी: कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहायक उपकरणों में एकीकरण स्थिर सहायता उपकरणों को स्वायत्तता के गतिशील साधनों में रूपांतरित करता है, जिससे अक्षमता एवं सहभागिता के बीच के कार्यात्मक अंतर को प्रभावी ढंग से समाप्त किया जा सकता है।
- आयात पर निर्भरता कम करने और उच्च-तकनीकी सुविधाओं को अपनाने की लागत को कम करने के लिये अब ध्यान स्वदेशी उच्च-स्तरीय विनिर्माण की ओर केंद्रित हो गया है।
- उदाहरण के लिये, केंद्रीय बजट 2026-27 में दिव्यांग सहारा योजना शुरू की गई, जिसमें विशेष रूप से कृत्रिम अंग और श्रवण यंत्रों में AI को एकीकृत करने के लिये ALIMCO को वित्त पोषण प्रदान किया गया।
- परिणामस्वरूप, ‘सहायक प्रौद्योगिकी मार्ट’ की स्थापना से अब उपयोगकर्त्ताओं को खुदरा शैली के अनुभव केंद्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता सक्षम उपकरणों को परखने की सुविधा प्राप्त होती है।
- विशेषीकृत कौशल विकास ढाँचे: आधुनिक कौशल पहलों ने उच्च-विकास एवं प्रक्रिया-आधारित क्षेत्रों जैसे AVGC (एनीमेशन, दृश्य प्रभाव, गेमिंग तथा कॉमिक्स) को लक्षित करना प्रारंभ किया है, जहाँ विशेष कार्यात्मक क्षमताएँ प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ प्रदान करती हैं।
- व्यावसायिक प्रशिक्षण को 'विकसित भारत' के आर्थिक लक्ष्यों के साथ जोड़कर, राज्य दिव्यांगजनों को श्रम बाज़ार के हाशिये से डिजिटल अर्थव्यवस्था के केंद्र में ला रहा है।
- उदाहरण के लिये, दिव्यांगजन कौशल योजना के तहत, सरकार समावेशी कौशल विकास को बढ़ावा दे रही है, जिससे 1.44 लाख दिव्यांगजनों को लाभ हो रहा है, जिनमें से 93,700 से अधिक लोगों को रोज़गार क्षमता एवं आर्थिक सशक्तीकरण बढ़ाने के लिये पहले ही प्रशिक्षण प्राप्त हो चुका है।
- सुगम्य भारत का नया स्वरूप: सुलभ भारत अभियान (AIC) का 'सुगम्य भारत 2.0' में विकास उन्नत मोबाइल अनुप्रयोगों के माध्यम से एक समुदाय-संचालित ऑडिट मॉडल पर केंद्रित है।
- सुगम्य भारत ऐप (2025) के नए संस्करण में एक 'एक्सेसिबिलिटी मैपिंग' टूल शामिल है जो उपयोगकर्त्ताओं को सार्वजनिक स्थानों को वास्तविक समय में रेट करने में सहायता प्रदान करता है।
- इसके अलावा, दिसंबर 2024 तक सुगम्य भारत अभियान के तहत लगभग 1,700 सरकारी भवनों का ऑडिट और नवीनीकरण किया जा चुका है।
- सुगम्य भारत ऐप (2025) के नए संस्करण में एक 'एक्सेसिबिलिटी मैपिंग' टूल शामिल है जो उपयोगकर्त्ताओं को सार्वजनिक स्थानों को वास्तविक समय में रेट करने में सहायता प्रदान करता है।
- शैक्षिक समानता: दिव्यांगजनों की शिक्षा केवल 'नामांकन' से आगे बढ़कर भारतीय सांकेतिक भाषा (ISL) को एक औपचारिक शैक्षणिक विषय के रूप में मानकीकृत करने के माध्यम से 'वास्तविक समावेशन' की ओर अग्रसर हुई है।
- समग्र राष्ट्रीय पाठ्यक्रम को सुलभ प्रारूपों में अनुवादित करके, राज्य उस प्रणालीगत 'सूचना की कमी' को दूर कर रहा है जिसने ऐतिहासिक रूप से बधिर और दृष्टिहीन छात्रों को बाधित किया है।
- इससे एक ऐसा जीवनचक्र समर्थन मॉडल तैयार होता है जहाँ शिक्षा का माध्यम प्रतियोगी परीक्षाओं या उच्च शिक्षा के लिये बाधा नहीं रह जाता है।
- ISLRTC ने अपने डिजिटल भंडार को 10,000 से अधिक शब्दों तक विस्तारित कर लिया है तथा वर्ष 2026 के अंत तक सभी NCERT पाठ्यपुस्तकों का ISL अनुवाद पूरा करने की दिशा में अग्रसर है।
- साथ ही PRASHAST ऐप ने स्कूलों में प्रारंभिक दिव्यांगता पहचान के लिये 92 लाख से अधिक छात्रों की स्क्रीनिंग की है।
- समग्र राष्ट्रीय पाठ्यक्रम को सुलभ प्रारूपों में अनुवादित करके, राज्य उस प्रणालीगत 'सूचना की कमी' को दूर कर रहा है जिसने ऐतिहासिक रूप से बधिर और दृष्टिहीन छात्रों को बाधित किया है।
- सामाजिक-सांस्कृतिक दृश्यता: 'पर्पल फेस्ट' और 'दिव्य कला मेला' आंदोलन सामाजिक दृष्टिकोण में एक प्रतिमान परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ दया-आधारित आख्यानों से हटकर ‘दिव्यांग’ उत्कृष्टता तथा उद्यमशीलता का उत्सव मनाया जाता है।
- ये राष्ट्रीय मंच दिव्यांगजनों द्वारा संचालित स्टार्टअप और कारीगरों के लिये एक प्रत्यक्ष बाज़ार प्रदान करते हैं, जिससे आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता है, साथ ही सक्षम जनता को जागरूक किया जाता है।
- गोवा में आयोजित होने वाला इंटरनेशनल पर्पल फेस्ट 2025-26, दिव्यांगता ब्रांडिंग और नीतिगत संवाद के लिये एक महत्त्वपूर्ण आयोजन बन गया है।
- जम्मू जैसे शहरों में हाल ही में आयोजित दिव्य कला मेलों ने 'वोकल फॉर लोकल' अभियान के तहत दिव्यांग कारीगरों के लिये महत्त्वपूर्ण राजस्व सृजन किया है।
- वास्तविक समानता के जनादेश: भारतीय न्यायपालिका ने विधि की 'औपचारिक' व्याख्या से आगे बढ़कर 'वास्तविक' व्याख्या की ओर कदम बढ़ाया है और जिसमें ‘युक्तिसंगत समायोजन’ को अनुच्छेद 14 के अंतर्गत अपरिहार्य मूल अधिकार घोषित किया है।
- न्यायिक दबाव के कारण राज्य और निजी संस्थाओं को शिकायत की प्रतीक्षा करने के बजाय सक्रिय रूप से वातावरण में परिवर्तन करने के लिये विवश होना पड़ता है।
- प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (वर्ष 2025) मामले के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल एक्सेस को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत एक अभिन्न अधिकार के रूप में मान्यता देते हुए इसे गरिमा एवं प्रभावी सहभागिता के लिये अनिवार्य माना।
- न्यायालय ने नियामकों और सरकारों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि दिव्यांगजनों के अनुकूल ई-गवर्नेंस प्लेटफॉर्म, सुलभ डिजिटल भुगतान और स्क्रीन-रीडर के अनुकूल प्रणालियाँ उपलब्ध हों।
- वित्तीय समावेशन में वृद्धि: दिव्यांगजनों के नेतृत्व वाले उद्यमों को 'प्राथमिकता क्षेत्र ऋण' के रूप में मान्यता देने वाली विशेष वित्तीय योजनाओं के माध्यम से आर्थिक सशक्तीकरण को गति दी जा रही है, जिनमें ब्याज दरों पर भारी सब्सिडी दी जाती है।
- ये ऋण योजनाएँ पारंपरिक संपार्श्विक संबंधी बाधाओं को दरकिनार करने के लिये बनाई गई हैं, यह मानते हुए कि वित्तीय स्वतंत्रता सामाजिक गरिमा की अंतिम पूर्व शर्त है।
- स्वयं सहायता समूहों और सूक्ष्म उद्यमों को वित्त पोषण करके, राज्य द्वारा सबसे उपेक्षित दिव्यांग समूहों के बीच एक ज़मीनी स्तर का 'उद्यमी पारिस्थितिकी तंत्र' विकसित किया जा रहा है।
- राष्ट्रीय दिव्यांगजन वित्त एवं विकास निगम (NDFDC) अब दिव्यांगजन स्वावलंबन योजना को अत्यधिक रियायती ब्याज दरों के साथ संचालित कर रहा है।
भारत में दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण में कौन-सी बाधाएँ हैं?
- सार्वभौमिक पहुँच में संरचनात्मक कमियाँ: वास्तविक सशक्तीकरण तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक भौतिक एवं डिजिटल अधोसंरचना दिव्यांगजनों की स्वतंत्र और समान भागीदारी में बाधा उत्पन्न करती है।
- यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर अनेक महत्त्वाकांक्षी पहलें संचालित की गई हैं, तथापि शहरी नियोजन एवं डिजिटल संरचना में विद्यमान प्रणालीगत उदासीनता के कारण सुलभता को मूल अधिकार के स्थान पर एक गौण विषय के रूप में देखा जाता है।
- उदाहरणार्थ, सुगम्य भारत अभियान जैसी पहलों के बावजूद पहुँच संबंधी कमियाँ बनी हुई हैं—जहाँ सभी 35 अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे तथा 709 रेलवे स्टेशन पूर्णतः सुलभ हैं, वहीं लगभग 1.45 लाख बसों में से केवल 8,695 बसें (लगभग 6%) ही पूर्णतः सुलभ हैं (अप्रैल 2023 तक)।
- यह तथ्य भारत में बाधा-मुक्त सार्वजनिक परिवहन एवं अधोसंरचना के विकास की धीमी प्रगति को स्पष्ट करता है।
- यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर अनेक महत्त्वाकांक्षी पहलें संचालित की गई हैं, तथापि शहरी नियोजन एवं डिजिटल संरचना में विद्यमान प्रणालीगत उदासीनता के कारण सुलभता को मूल अधिकार के स्थान पर एक गौण विषय के रूप में देखा जाता है।
- कॉर्पोरेट कार्यबल में अल्पप्रतिनिधित्व: निजी क्षेत्र में दिव्यांगजनों के समावेशन के प्रति दृष्टिकोण अभी भी प्रायः दान-आधारित है, न कि उन्हें प्रतिस्पर्द्धी प्रतिभा-संसाधन के रूप में स्वीकार करने वाला।
- कॉर्पोरेट परिवेश में समुचित सुविधाओं, सुलभ सॉफ्टवेयर तथा समावेशी भर्ती नीतियों के अभाव के कारण एक अदृश्य बाधा निर्मित होती है। परिणामस्वरूप, उच्च योग्यता प्राप्त दिव्यांगजन या तो चयन प्रक्रिया में ही बाहर कर दिये जाते हैं अथवा उन्हें सीमित प्रगति वाली प्रारंभिक स्तर की भूमिकाओं तक ही सीमित कर दिया जाता है।
- इस प्रवृत्ति की पुष्टि ‘मार्चिंग शीप PwD इन्क्लूज़न इंडेक्स 2025’ से होती है, जिसके अनुसार 876 सूचीबद्ध भारतीय संगठनों में कार्यरत कुल कर्मचारियों में दिव्यांगजनों की भागीदारी 1% से भी कम है तथा लगभग 37.9% कंपनियों में एक भी स्थायी दिव्यांग कर्मचारी कार्यरत नहीं है।
- अपर्याप्त वित्तपोषण एवं क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ: यद्यपि भारत में RPwD, 2016 जैसे प्रगतिशील विधिक प्रावधान विद्यमान हैं, तथापि पर्याप्त वित्तीय संसाधनों तथा प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में इनका प्रभावी क्रियान्वयन बाधित रहता है।
- अनेक महत्त्वपूर्ण कल्याणकारी तंत्र, पुनर्वास केंद्र एवं विशेष न्यायालय व्यावहारिक रूप से सक्रिय होने के बजाय प्रायः औपचारिकता तक सीमित रह जाते हैं, क्योंकि राज्य सरकारें समयबद्ध रूप से नियम अधिसूचित करने एवं बजटीय प्रावधान सुनिश्चित करने में विफल रहती हैं।
- RPwD अधिनियम, 2016 के कार्यान्वयन पर CAG द्वारा वर्ष 2024 में किये गए एक ऑडिट में पुनर्वास सेवाओं में बड़ी कमियाँ पाई गईं, जिसमें 310 ज़िला दिव्यांगता पुनर्वास केंद्रों (DDRC) के लक्ष्य की तुलना में संपूर्ण देश में केवल 264 केंद्र ही कार्यरत थे।
- समावेशी शैक्षिक अवसंरचना का अभाव: भारतीय शिक्षा प्रणाली में विशेष शिक्षकों, सुलभ शिक्षण-सामग्री तथा समावेशी शिक्षण ढाँचों की निरंतर कमी के कारण विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CWSN) का समुचित शैक्षिक विकास बाधित होता है।
- मुख्यधारा की शिक्षा में समावेशन सुनिश्चित करने के स्थान पर संस्थागत कमियाँ दिव्यांगजनों को शिक्षा से बाहर धकेल देती हैं, जिससे कम आयु में ही उनके बौद्धिक एवं व्यावसायिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- अधोसंरचनात्मक स्तर पर भी सुलभता की कमी स्पष्ट है—केवल 49.7% विद्यालयों में रेलिंग सहित कार्यात्मक रैंप उपलब्ध हैं, जबकि केवल 25–30% विद्यालय ही CWSN के लिये सुलभ शौचालय की सुविधा प्रदान करते हैं।
- यह स्थिति भारत में समावेशी शिक्षा के सीमित प्रसार को रेखांकित करती है।
- दिव्यांग महिलाओं की अंतर्संबंधी उपेक्षा: दिव्यांगता स्वयं में एक पृथक स्थिति नहीं है; जब इसे लिंग के साथ जोड़ा जाता है, तब दिव्यांग महिलाएँ बहुस्तरीय भेदभाव, हिंसा तथा सामाजिक-आर्थिक बहिष्करण का सामना करती हैं।
- इस दोहरी उपेक्षा के परिणामस्वरूप उनकी कार्यबल में भागीदारी अत्यंत सीमित हो जाती है तथा वे व्यवस्थागत दुर्व्यवहार के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार, जहाँ लगभग 47% दिव्यांग पुरुष रोज़गार में संलग्न हैं, वहीं दिव्यांग महिलाओं की भागीदारी मात्र 23% है, जो गंभीर असमानता को दर्शाती है।
- विश्वसनीय एवं अद्यतन ऑंकड़ों का अभाव: दिव्यांगजनों के सामाजिक-आर्थिक वितरण, नव-मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं के प्रकार तथा उनके भौगोलिक प्रसार के अभाव में कल्याणकारी नीतियाँ प्रभावी रूप से लक्षित नहीं हो पातीं।
- आँकड़ों की कमी के कारण व्यापक बहिष्करण त्रुटियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे सर्वाधिक वंचित दिव्यांगजन सामाजिक सुरक्षा तंत्र से बाहर रह जाते हैं।
- वर्तमान में भारत की दिव्यांगता नीति मुख्यतः जनगणना 2011 के आँकड़ों (2.68 करोड़ दिव्यांगजन) पर आधारित है, जो अब पुरानी आधारशिला सिद्ध हो रही है। इसके अतिरिक्त, आधे से भी कम दिव्यांगजनों के पास UDID कार्ड उपलब्ध है, जिसके कारण प्रक्रियात्मक विलंब तथा डिजिटल साक्षरता की कमी के चलते सरकारी लाभों तक उनकी पहुँच सीमित हो जाती है।
- स्वास्थ्य सेवा प्रौद्योगिकी तक पहुँच में वित्तीय बाधाएँ: जीवन-गुणवत्ता को बेहतर बनाने वाले सहायक उपकरणों, कृत्रिम अंगों तथा विशिष्ट स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अधिकांश दिव्यांगजनों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों के लिये अभी भी अत्यधिक महँगी सिद्ध होती है।
- सहायक प्रौद्योगिकी के बढ़ते व्यावसायीकरण तथा कराधान के कारण पहले से ही आर्थिक रूप से वंचित परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
- न्यूनतम आय वाले ग्रामीण परिवार को गुणवत्तापूर्ण व्हीलचेयर क्रय करने हेतु 3–5 वर्ष तक बचत करनी पड़ सकती है, जबकि उसके रखरखाव एवं मरम्मत का व्यय प्रायः सरकारी सहायता में शामिल नहीं होता।
- इसके अतिरिक्त, RPwD, 2016 के अंतर्गत निशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं का प्रावधान कठोर प्रक्रियात्मक शर्तों के कारण प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाता, जिससे अनेक दिव्यांगजन आवश्यक शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाते हैं।
- सहायक प्रौद्योगिकी के बढ़ते व्यावसायीकरण तथा कराधान के कारण पहले से ही आर्थिक रूप से वंचित परिवारों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।
- राजनीतिक मताधिकार से वंचित होना और प्रतिनिधित्व का अभाव: दिव्यांगजनों को राजनीतिक प्रक्रिया में भी संरचनात्मक रूप से हाशिये पर रखा जाता है, चाहे वह सुलभ मतदान केंद्रों का अभाव हो या नीति-निर्माण में उनकी सीमित भागीदारी।
- वर्तमान भारतीय चुनावी व्यवस्था में संसद एवं राज्य विधानसभाओं में दिव्यांगजनों के लिये आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप उनके मुद्दे प्रायः मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श में उपेक्षित रह जाते हैं।
- इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय सहित विभिन्न उच्च न्यायालयों में जनहित याचिकाएँ (PIL) दायर कर संसद एवं राज्य विधानसभाओं में दिव्यांगजनों के लिये 7% आरक्षण की मांग भी उठाई गई है।
दिव्यांगजनों के सशक्तीकरण के लिये भारत किन उपायों को अपना सकता है?
- सार्वभौमिक संरचना और डिजिटल पहुँच को अनिवार्य बनाना: सार्वभौमिक संरचना सिद्धांतों का अनुपालन स्वैच्छिक दिशानिर्देशों तक सीमित न रहकर सभी नगरपालिका स्वीकृतियों तथा डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना के कार्यान्वयन हेतु एक अनिवार्य शर्त के रूप में स्थापित किया जाना चाहिये।
- अनुपालन न करने पर कठोर वित्तीय दंड का प्रावधान तथा शहरी योजनाकारों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स के लिये सतत क्षमता निर्माण, प्रतिक्रियात्मक समावेशन के स्थान पर पूर्व-सक्रिय समावेशन को सुनिश्चित करेगा।
- यह प्रतिमान परिवर्तन वर्तमान में दिव्यांगजनों के बीच विद्यमान संरचनात्मक बाधाओं को समाप्त कर उनकी निर्भरता को कम करेगा।
- समावेशी कॉर्पोरेट पारिस्थितिकी तंत्र की ओर संक्रमण: कॉर्पोरेट रोज़गार ढाँचे को प्रतीकात्मक CSR पहलों से आगे बढ़ाकर अनिवार्य एवं संस्थागत समावेशन की दिशा में परिवर्तित करना आवश्यक है, जिसके लिये वैधानिक दिव्यांगता एवं न्यूरोडायवर्सिटी भर्ती कोटा निर्धारित किये जाने चाहिये।
- इस प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने हेतु राज्य द्वारा कर प्रोत्साहन तथा सहायक प्रौद्योगिकी पर सब्सिडी प्रदान की जानी चाहिये।
- साथ ही व्यावसायिक प्रशिक्षण को पारंपरिक निम्न-कौशल क्षेत्रों से आगे बढ़ाकर उभरते तकनीकी क्षेत्रों के अनुरूप उच्च स्तरीय डिजिटल दक्षताओं पर केंद्रित किया जाना आवश्यक है।
- यह आर्थिक भागीदारी दिव्यांगजनों की वित्तीय स्वायत्तता को सुदृढ़ करते हुए कॉर्पोरेट स्तर पर व्याप्त पूर्वाग्रहों को भी समाप्त करेगी।
- समर्पित दिव्यांग न्याय ढाँचे की स्थापना: दिव्यांगजनों से संबंधित अधिकार उल्लंघन एवं भेदभाव के मामलों के त्वरित निपटान हेतु ज़िला स्तर पर विशेष दिव्यांग न्यायालयों की स्थापना आवश्यक है।
- इसके साथ ही पंचायत स्तर पर विकेंद्रीकृत एकल-खिड़की सेवा केंद्र स्थापित कर दिव्यांगता प्रमाणन एवं कल्याणकारी योजनाओं तक पहुँच को सरल बनाया जाना चाहिये।
- न्याय प्रणाली को अधिक संवेदनशील एवं सुलभ बनाने हेतु विधिक पेशेवरों तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों को दिव्यांगता-समावेशी प्रशिक्षण प्रदान करना भी आवश्यक है।
- यह समग्र ढाँचा विधिक प्रावधानों को व्यवहारिक स्तर पर प्रभावी बनाते हुए दिव्यांगजनों के अधिकारों की वास्तविक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा।
- शिक्षाशास्त्र-प्रथम समावेशी शिक्षा का कार्यान्वयन: शैक्षिक पारिस्थितिकी तंत्र को प्रारंभिक बाल्यावस्था से ही एकीकृत और सार्वभौमिक रूप से सुलभ शिक्षण वातावरण के पक्ष में पृथक स्कूली व्यवस्था से क्रमिक रूप से मुक्त किया जाना चाहिये।
- इसके लिये सभी मुख्यधारा शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विशेष शिक्षा से संबंधित मॉड्यूल का अनिवार्य समावेशन आवश्यक है, ताकि प्रत्येक शिक्षक न्यूरोडाइवर्जेंट तथा शारीरिक रूप से दिव्यांग विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को प्रभावी ढंग से संबोधित कर सके।
- एक समावेशी शैक्षणिक आधार का निर्माण करने से दिव्यांग बच्चों के साथ होने वाली प्रारंभिक उपेक्षा से बचा जा सकता है, जिससे उनकी भविष्य की सामाजिक-आर्थिक गतिशीलता सीधे तौर पर सुनिश्चित होती है।
- स्वास्थ्य सेवा और सहायक प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण: दिव्यांगता क्षेत्र में उन्नत सहायक प्रौद्योगिकियों के तीव्र स्वदेशी विकास हेतु राज्य-समर्थित, उच्च सब्सिडी वाले नवाचार इनक्यूबेटरों की स्थापना आवश्यक है।
- स्वतंत्र जीवन को प्रतिबंधित करने वाली कृत्रिम वित्तीय बाधाओं को दूर करने के लिये आवश्यक गतिशीलता सहायक उपकरणों, कृत्रिम अंगों और संवेदी उपकरणों से सभी कराधान संरचनाओं को तत्काल हटाना अनिवार्य है।
- साथ ही, ग्रामीण क्षेत्रों तक प्रभावी पहुँच सुनिश्चित करने के लिये प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में व्यापक, सुलभ मनोरोग एवं शारीरिक पुनर्वास सेवाओं का एकीकरण किया जाना आवश्यक है। इससे दिव्यांगजनों की स्वतंत्र जीवन क्षमता और जीवन-गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होगा।
- नागरिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक कोटा का सुदृढ़ीकरण: वास्तविक सशक्तीकरण के लिये पंचायत से लेकर संसद तक शासन के सभी स्तरों पर दिव्यांगजनों के लिये लक्षित राजनीतिक आरक्षण का संस्थागतकरण आवश्यक है।
- चुनावी तंत्र को पूर्णतः सुलभ बनाने हेतु ऑडियो-टैक्टाइल इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों जैसी समावेशी प्रौद्योगिकियों का व्यापक उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिये।
- साथ ही, राजनीतिक दलों के संगठनात्मक ढाँचे में दिव्यांग नेतृत्व के विकास को वैधानिक रूप से प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है।
- प्रत्यक्ष विधायी प्रतिनिधित्व से यह सुनिश्चित होगा कि दिव्यांगजनों के अधिकारों की पैरवी स्वयं उनके अनुभव-आधारित दृष्टिकोण से हो, न कि केवल परोक्ष प्रतिनिधित्व के माध्यम से।
- अंतरक्षेत्रीय सामाजिक सहायता प्रणालियों का सुदृढ़ीकरण: नीति-निर्माण में एक समग्र अंतरक्षेत्रीय दृष्टिकोण को अपनाना आवश्यक है, जो दिव्यांग महिलाओं, समलैंगिक व्यक्तियों तथा अन्य उपेक्षित समुदायों द्वारा अनुभव की जाने वाली बहुआयामी संवेदनशीलताओं का समाधान कर सके।
- इसके लिये राज्य को स्थानीय स्तर पर विशेषीकृत सहायता तंत्र विकसित करने होंगे, जिनमें सुलभ प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ, हिंसा-निवारण हेल्पलाइन तथा लक्षित वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम सम्मिलित हों।
- दिव्यांग महिलाओं के नेतृत्व में सुदृढ़ सामुदायिक पुनर्वास नेटवर्क की स्थापना, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, सामाजिक कलंक और संरचनात्मक दुर्व्यवहार को प्रभावी रूप से कम कर सकती है।
- इस अंतर्संबंध को स्वीकार करना और उसका समाधान करना, दिव्यांगता संबंधी मानक नीतियों को अनजाने में दिव्यांगजन समुदाय के सबसे अधिक उपेक्षित वर्गों को बाहर करने से रोकता है।
- जनसांख्यिकीय डेटा पारिस्थितिकी तंत्र का संस्थानीकरण: दिव्यांगजनों के सामाजिक-आर्थिक तथा भौगोलिक वितरण के सटीक आकलन हेतु एक सुदृढ़, वास्तविक समय डिजिटल रजिस्ट्री प्रणाली की स्थापना अत्यंत आवश्यक है।
- दिव्यांगता मूल्यांकन के दायरे का विस्तार कर नव-मान्यता प्राप्त, अदृश्य एवं तंत्रिका-विकास संबंधी दिव्यांगताओं को समुचित रूप से शामिल किया जाना चाहिये, ताकि कल्याणकारी योजनाओं में बहिष्करण त्रुटियों को न्यूनतम किया जा सके।
- इस गतिशील डेटा तंत्र को संघ एवं राज्य स्तर की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से एकीकृत करने पर लाभों का वितरण अधिक पारदर्शी और स्वचालित हो सकेगा।
- एक सटीक एवं पारदर्शी डेटा पारिस्थितिकी तंत्र, वैज्ञानिक रूप से लक्षित तथा प्रभावी सशक्तीकरण नीतियों के निर्माण की आधारशिला सिद्ध होगा।
निष्कर्ष:
दिव्यांगजनों का वास्तविक सशक्तीकरण 'दान-आधारित' दृष्टिकोण से 'अधिकार-आधारित' ढाँचे की ओर एक मौलिक परिवर्तन की अपेक्षा करता है, जिसमें सुगम्यता को एक अनिवार्य संवैधानिक अनिवार्यता के रूप में माना जाता है। उन्नत कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सहायक प्रौद्योगिकियों के एकीकरण, 'प्रज्ञा प्रसून' डिजिटल एक्सेस अनिवार्यता के कठोर प्रवर्तन तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रोत्साहित करके भारत अपवर्जन की संरचनात्मक बाधाओं को समाप्त कर सकता है। अंततः 'विकसित भारत' की प्राप्ति इस बात पर निर्भर करती है कि दिव्यांगजनों को कल्याणकारी योजनाओं के हाशिये से निकालकर राष्ट्र के आर्थिक और नागरिक नेतृत्व के केंद्र में लाया जाए।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न 'सुदृढ़ विधिक संरचना के बावजूद, भारत में दिव्यांगजनों को समावेशन में बाधाओं का सामना करना पड़ता है।' परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1. दिव्यांग सहारा योजना क्या है?
यह वर्ष 2026 के बजट की एक पहल है, जिसके अंतर्गत ALIMCO को AI-इंटीग्रेटेड कृत्रिम अंग निर्माण के लिये वित्तपोषण प्रदान किया गया है तथा उपयोगकर्त्ता अनुभव हेतु 'सहायक प्रौद्योगिकी केंद्रों' की स्थापना की गई है।
प्रश्न 2. प्रज्ञा प्रसून बनाम भारत संघ (वर्ष 2025) मामले में ऐतिहासिक निर्णय क्या था?
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत डिजिटल एक्सेस को एक मूल अधिकार घोषित किया है, जिसमें दिव्यांगजनों के लिये सुलभ ‘KYC (अपने ग्राहक को जानें)’ प्रक्रियाओं को अनिवार्य किया गया है।
प्रश्न 3. विशिष्ट दिव्यांग पहचान पत्र (UDID) 'एकल सत्य स्रोत' के रूप में किस प्रकार कार्य करता है?
यह एक अखिल-भारतीय डिजिटल पहचान प्रदान करता है, जो विभिन्न राज्यों में पुनः प्रमाणन की आवश्यकता को समाप्त करता है तथा कल्याणकारी लाभों की निर्बाध पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करता है।
प्रश्न 4. 'सहायक प्रौद्योगिकी केंद्र' क्या हैं?
ये आधुनिक, खुदरा-शैली के अनुभव केंद्र होते हैं, जहाँ दिव्यांगजन उच्च तकनीक वाले उपकरणों को परख सकते हैं, उनका परीक्षण कर सकते हैं तथा व्यावसायिक परामर्श के साथ उन्हें प्राप्त कर सकते हैं।
प्रश्न 5. दिव्यांगता के संदर्भ में 'पर्पल रिवॉल्यूशन' क्या है?
जिसका उद्देश्य दिव्यांगता के प्रति दया भाव रखने के बजाय उसमें उत्कृष्टता और उद्यमिता का उत्सव मनाने की दिशा में दृष्टिकोण को परिवर्तित करना है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत लाखों विकलांगों का आश्रय है। कानून के तहत उन्हें क्या लाभ उपलब्ध हैं? (2011)
- सरकार द्वारा संचालित विद्यालयों में 18 वर्ष की आयु तक निःशुल्क स्कूली शिक्षा।
- व्यवसाय स्थापित करने के लिये भूमि का अधिमान्य आवंटन।
- सार्वजनिक भवनों में रैंप।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)