शासन व्यवस्था
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार
- 16 Mar 2026
- 173 min read
यह एडिटोरियल 12/03/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘SC allows passive euthanasia, Centre needs to take its cue’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह संपादकीय भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बहुआयामी परिदृश्य का विश्लेषण करता है। यह चिकित्सा नैतिकता, न्यायिक सुरक्षा उपायों और व्यवस्थागत दुरुपयोग को रोकने के लिये एक मानकीकृत विधायी ढाँचे की तत्काल आवश्यकता के महत्त्वपूर्ण अंतर्संबंधों का परीक्षण करता है।
प्रिलिम्स के लिये: हरीश राणा मामला 2026, लिविंग विल, कॉमन कॉज़ जजमेंट
मेन्स के लिये: निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है, इससे संबंधित निर्णय, निष्क्रिय इच्छामृत्यु की आवश्यकता, प्रमुख चिंताएँ और आवश्यक उपाय।
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के प्रति अपनाया गया दृष्टिकोण संवैधानिक मूल्यों, चिकित्सा नैतिकता और मानवीय गरिमा के बीच एक सावधानीपूर्वक संतुलन को दर्शाता है। अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ तथा कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ जैसे ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 एवं गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के व्यापक दायरे के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु और लिविंग विल की वैधता को मान्यता दी है। हर्षित राणा मामले में हाल के न्यायिक घटनाक्रम दुरुपयोग से सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए करुणामूलक जीवन-अंत देखभाल पर और अधिक बल देते हैं। भावी परिप्रेक्ष्य में एक व्यापक वैधानिक रूपरेखा इस मानवीय दृष्टिकोण को सुदृढ़ कर सकती है तथा रोगियों, परिवारों एवं चिकित्सा-व्यवसायियों सभी को स्पष्टता प्रदान कर सकती है।
इच्छामृत्यु क्या है?
- परिचय: इच्छामृत्यु से आशय उस प्रथा से है जिसमें किसी व्यक्ति को तीव्र पीड़ा या कष्ट से मुक्ति दिलाने के लिये उसके जीवन का जानबूझकर अंत किया जाता है, सामान्यतः तब जब वह असाध्य रोग या अंतिम अवस्था की बीमारी से ग्रस्त हो।
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प्रकार |
परिभाषा |
भारत में स्थिति |
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निष्क्रिय इच्छामृत्यु |
किसी व्यक्ति की स्वाभाविक रूप से मृत्यु के लिये जीवन रक्षक उपचार (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटा लेना या रोक देना। |
वैध (दिशानिर्देशों सहित) |
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सक्रिय इच्छामृत्यु |
किसी रोगी के जीवन का जानबूझकर अंत करने के लिये घातक पदार्थों का प्रयोग करना (उदाहरण के लिये, प्राणघातक इंजेक्शन)। |
अवैध |
भारत में न्यायिक न्यायशास्त्र ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधता को किस प्रकार आकार दिया है?
ऐतिहासिक रूप से भारतीय न्यायपालिका इस बात से जूझती रही है कि क्या 'जीवन का अधिकार' (अनुच्छेद 21) में 'मृत्यु का अधिकार' भी निहित है।
- पी. रतिनम मामला (1994): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि जीवन के अधिकार में 'मृत्यु का अधिकार' भी निहित है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य मौलिक अधिकारों के साथ समानता स्थापित करते हुए कहा कि जिस प्रकार अनुच्छेद 19 के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, उसी प्रकार वह ‘न बोलने का अधिकार भी’ समाहित करता है; इसी तर्क से अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन का अधिकार और न जीने के अधिकार को भी सम्मिलित करता है।
- ज्ञान कौर मामला (1996): न्यायालय ने पी. रतिनम बनाम भारत संघ के पूर्व के फैसले को निरस्त कर दिया और यह कहा कि अनुच्छेद 21 जीवन और वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है तथा इसकी व्याख्या इस प्रकार नहीं की जा सकती कि उसमें अपने जीवन का अंत करने का अधिकार भी सम्मिलित हो। न्यायालय ने यह भी कहा कि आत्महत्या जीवन का अप्राकृतिक अंत है।
- अरुणा शानबाग मामला (2011): इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणा शानबाग के लिये निष्क्रिय इच्छामृत्यु के मुद्दे पर विचार किया, जो दशकों से लगातार कोमा जैसी स्थिति में थीं।
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त सुरक्षा उपायों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
- न्यायालय ने कहा कि अक्षम रोगी के लिये जीवन-समर्थन हटाने की अनुमति कुछ परिस्थितियों में दी जा सकती है, किंतु ऐसा निर्णय केवल परिजनों या चिकित्सकों द्वारा अकेले नहीं लिया जा सकता।
- इसके स्थान पर संबंधित उच्च न्यायालय को भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन, 'अभिभावक राष्ट्र (Parens patriae doctrine)' सिद्धांत के तहत कार्य करते हुए, रोगी के हितों की रक्षा हेतु इस निर्णय को स्वीकृति देनी होगी।
- न्यायालय ने अनुमोदन प्रदान करने से पहले विशेषज्ञों के एक चिकित्सा बोर्ड की राय और रिश्तेदारों/निकटतम मित्र से परामर्श की आवश्यकता वाली एक प्रक्रिया भी निर्धारित की।
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त सुरक्षा उपायों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी।
- कॉमन कॉज़़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018): संविधान पीठ ने घोषणा की कि गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक मूल अधिकार है। इसने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध ठहराया और 'लिविंग विल्स' की वैधता को मान्यता दी।
- वर्ष 2018 में निर्धारित दिशा-निर्देशों को आगे चलकर वर्ष 2023 में और परिष्कृत किया गया तथा संयुक्त रूप से इन्हें 'कॉमन कॉज़ दिशा-निर्देश' कहा जाता है।
- ये दिशानिर्देश दो प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित हैं: हस्तक्षेप का 'चिकित्सीय उपचार' होना आवश्यक है और उसका हटाया जाना रोगी के 'सर्वोत्तम हित' में होना चाहिये।
- दुरुपयोग की आशंका को रोकने के लिये न्यायालय ने प्राथमिक और द्वितीयक चिकित्सा मंडलों की स्वीकृति सहित अनेक सुरक्षा-उपबंध भी प्रस्तुत किये।
- हरीश राणा बनाम भारत संघ व अन्य (2026): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 32 वर्षीय हरीश राणा के लिये निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अधिकृत किया, जो वर्ष 2013 की एक दुर्घटना के बाद से लगातार निश्चेत अवस्था में थे।
- न्यायालय ने कहा कि चिकित्सकीय सहायता से प्रदान किया जाने वाला पोषण और जलयोजन 'चिकित्सीय उपचार' की श्रेणी में आता है, क्योंकि इसके लिये विशिष्ट चिकित्सकीय पर्यवेक्षण एवं सतत निगरानी आवश्यक होती है।
- चूँकि स्वास्थ्य-लाभ की कोई संभावना नहीं थी और उपचार से कोई चिकित्सीय लाभ प्राप्त नहीं हो रहा था, इसलिये उसका हटाया जाना रोगी के 'सर्वोत्तम हित' में माना गया।
- न्यायालय ने अपने दृष्टिकोण को 'गरिमापूर्ण विदाई सुनिश्चित करने' की दिशा में उन्मुख करते हुए यह आवश्यक ठहराया कि AIIMS में जीवन-समर्थन हटाने की प्रक्रिया एक सशक्त प्रशामक देखभाल योजना के साथ संपन्न हो, जिससे रोगी को किसी प्रकार की पीड़ा न हो।
- न्यायालय ने कहा कि चिकित्सकीय सहायता से प्रदान किया जाने वाला पोषण और जलयोजन 'चिकित्सीय उपचार' की श्रेणी में आता है, क्योंकि इसके लिये विशिष्ट चिकित्सकीय पर्यवेक्षण एवं सतत निगरानी आवश्यक होती है।
भारत में जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की वर्तमान प्रक्रिया क्या है?
जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की प्रक्रिया: कॉमन कॉज़़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिये गए दिशानिर्देशों के आधार पर, अग्रिम निर्देश (लिविंग विल) मौजूद होने पर जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से चरण-दर-चरण तरीके से संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है:
- अग्रिम निर्देश का सत्यापन: उपचार करने वाला चिकित्सक रोगी की वसीयत की प्रामाणिकता की जाँच करता है तथा यह पुष्टि करता है कि रोगी लाइलाज बीमारी से ग्रसित है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है। इसके बाद चिकित्सक वसीयत में नामित व्यक्ति/व्यक्तियों को रोगी की स्थिति और उपचार के विकल्पों के बारे में सूचित करता है।
- 'लिविंग विल' (अग्रिम चिकित्सकीय निर्देश) किसी व्यक्ति को पूर्व में ही अपनी चिकित्सकीय उपचार-संबंधी इच्छाएँ व्यक्त करने में सक्षम बनाती है, विशेषकर जीवन-रक्षक उपचार से अस्वीकार के संबंध में, यदि बाद में वह निर्णय लेने की क्षमता खो दे।
- यह रोगी की स्वायत्तता को बनाए रखता है, साथ ही परिवार के सदस्यों और डॉक्टरों पर भावनात्मक एवं विधिक बोझ को कम करता है।
- वर्ष 2023 में भारत के उच्चतम न्यायालय ने 'लिविंग विल' (अग्रिम निर्देश) की प्रक्रिया को सरल बनाते हुए जीवन-रक्षक उपचार वापस लेने के लिये न्यायिक दंडाधिकारी (JMFC), प्रथम श्रेणी की अनुमोदन की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया।
- अब 'लिविंग विल' पर निष्पादक द्वारा दो गवाहों की उपस्थिति में हस्ताक्षर किये जा सकते हैं तथा उसका प्रमाणीकरण किसी नोटरी या राजपत्रित अधिकारी द्वारा किया जा सकता है, जिसे यह सुनिश्चित करना होगा कि यह स्वेच्छा से और पूर्ण समझ के साथ निष्पादित की गई है।
- 'लिविंग विल' (अग्रिम चिकित्सकीय निर्देश) किसी व्यक्ति को पूर्व में ही अपनी चिकित्सकीय उपचार-संबंधी इच्छाएँ व्यक्त करने में सक्षम बनाती है, विशेषकर जीवन-रक्षक उपचार से अस्वीकार के संबंध में, यदि बाद में वह निर्णय लेने की क्षमता खो दे।
- प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड का गठन: अस्पताल एक प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड का गठन करता है, जिसमें निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं:
- इलाज करने वाले चिकित्सक, और
- संबंधित विशेषज्ञता में न्यूनतम 5 वर्ष के अनुभव वाले कम-से-कम दो विषय-विशेषज्ञ।
- यह मंडल परिजनों या संरक्षकों की उपस्थिति में रोगी की जाँच करता है तथा 48 घंटे के भीतर इस विषय पर प्रारंभिक मत देता है कि निर्देश को लागू किया जाना चाहिये या नहीं।
- द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड का गठन: यदि प्राथमिक मंडल उपचार वापस लेने को अनुमोदित कर देता है तो अस्पताल एक द्वितीयक चिकित्सकीय मंडल का गठन करता है, जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होते हैं:
- ज़िला मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा नामित एक चिकित्सक, और
- दो विषय-विशेषज्ञ (जो प्राथमिक बोर्ड का हिस्सा नहीं हैं)।
- बोर्ड मामले की समीक्षा करता है और 48 घंटों के भीतर अपनी राय देता है।
- नामित व्यक्ति की सहमति: द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड द्वारा अनुमोदन के बाद सहमति प्राप्त की जाती है। यदि रोगी संवाद करने में असमर्थ है तो अग्रिम निर्देश में नामित व्यक्ति (व्यक्तियों) से रोगी के निर्देशों के अनुरूप सहमति प्राप्त की जानी चाहिये।
- यदि द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड अनुमति देने से इनकार कर देता है तो रिश्तेदार, नामित व्यक्ति या अस्पताल अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं, जो एक स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड का गठन कर सकता है तथा रोगी के सर्वोत्तम हित में मामले का निर्णय कर सकता है।
- अस्पताल द्वारा सूचना एवं दस्तावेज़ीकरण: प्राथमिक और द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड उपचार वापस लेने के अपने निर्णय की सूचना रोगी के निकट संबंधी या संरक्षक की सहमति के साथ न्यायिक दंडाधिकारी, प्रथम श्रेणी को देते हैं।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु के पक्ष में प्रमुख तर्क क्या हैं?
- दार्शनिक और नैतिक आयाम
- शारीरिक अखंडता: यह 'नकारात्मक स्वतंत्रता' के सिद्धांत से व्युत्पन्न है। इसके अनुसार राज्य या चिकित्सा व्यवसाय को किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध उसके शरीर में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिये।
- द्वितीयक प्रभाव का सिद्धांत: चिकित्सा नैतिकता में यह बताता है कि यदि प्राथमिक उद्देश्य पीड़ा का निवारण करना है (व्यर्थ उपचार को रोककर) तो उसका द्वितीयक और अनपेक्षित परिणाम यदि मृत्यु हो तब भी उसे नैतिक रूप से स्वीकार्य माना जा सकता है।
- परोपकार बनाम अभिभावकवादी दृष्टिकोण: यह चिकित्सा के केंद्र को ‘Doctor knows Best (चिकित्सक ही सर्वोत्तम जानता है)’ वाली अभिभावकवादी प्रवृत्ति से हटाकर 'रोगी-केंद्रित देखभाल' पर केंद्रित करता है, जहाँ 'सम्मानजनक मृत्यु' के संदर्भ में रोगी द्वारा निर्धारित अवधारणा का सम्मान किया जाता है।
- विधिक और संवैधानिक आयाम (भारतीय संदर्भ)
- अनुच्छेद 21 का विस्तार: कॉमन कॉज़ (2018) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि 'जीवन के अधिकार' में गरिमा के साथ मरने का अधिकार शामिल है।
- 'लिविंग विल्स' की अवधारणा: निष्क्रिय इच्छामृत्यु अग्रिम चिकित्सा निर्देशों की अनुमति देती है, जिससे व्यक्तियों को स्वस्थ दिमाग होने पर निर्णय लेने का अधिकार मिलता है तथा यह सुनिश्चित होता है कि अक्षम होने पर उनकी भविष्य की इच्छाओं को नज़रअंदाज़ न किया जाए।
- उपचार से इनकार करने का अधिकार: कोई सजग और सक्षम वयस्क चिकित्सकीय उपचार को विधिक रूप से अस्वीकार करने का अधिकार प्राप्त है, भले ही उस अस्वीकृति का परिणाम मृत्यु हो। निष्क्रिय इच्छामृत्यु वस्तुतः इसी अधिकार की नैदानिक अभिव्यक्ति है।
- सामाजिक-आर्थिक आयाम
- 'चिकित्सकीय निर्धनता' से बचाव: अनेक मामलों में अंतिम अवस्था के रोगियों को दीर्घकाल तक जीवन-समर्थन पर रखने से 'विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय' उत्पन्न होता है, जिससे परिवार ऐसे उपचार हेतु गहरे ऋण में डूब जाते हैं, जिनसे स्वस्थ होने की कोई आशा नहीं होती।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु के विरुद्ध प्रमुख तर्क क्या हैं?
- सामाजिक-आर्थिक 'कमज़ोरी' का तर्क
- आर्थिक दबाव: सार्वभौमिक उपशामक देखभाल के अभाव में मृत्यु का चयन ‘स्वतंत्र इच्छा’ का कृत्य न होकर ‘गरीबी’ का परिणाम हो सकता है, जहाँ रोगी मृत्यु का विकल्प इसलिये चुनता है क्योंकि वह जीवित रहने का व्यय वहन नहीं कर सकता।
- ग्रामीण असमानता: आलोचकों का तर्क है कि ग्रामीण भारत में 'मेडिकल बोर्ड' जैसे सुरक्षा उपायों को लागू करना और उनकी निगरानी करना मुश्किल है, जिससे स्थानीय स्तर पर चिकित्सा कदाचार का उच्च जोखिम होता है।
- नैदानिक एवं परीक्षणगत संबंधी जोखिम
- चिकित्सा की त्रुटिहीनता का अभाव: चिकित्सा विज्ञान पूर्णतः त्रुटिहीन नहीं है। सदैव यह सांख्यिकीय संभावना बनी रहती है कि निदान में त्रुटि हो सकती है या चिकित्सा प्रौद्योगिकी में ऐसी आकस्मिक प्रगति हो जाए, जिससे ‘असाध्य’ अवस्था का उपचार संभव हो सके।
- चमत्कारिक पहलू: नैदानिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ रोगी वर्षों बाद निरंतर वनस्पति (निश्चेतन) अवस्था (PVS) से वापस सामान्य अवस्था में लौट आए हैं। निष्क्रिय इच्छामृत्यु वर्तमान तथा संभवतः सीमित चिकित्सा ज्ञान के आधार पर ‘जीवन के अधिकार’ को अपरिवर्तनीय बना देती है।
- ध्यान का विचलन: विरोधियों का तर्क है कि इच्छामृत्यु को वैध बनाने से राज्य के लिये प्रशामक देखभाल (पीड़ा-नियंत्रण) और आश्रय-गृह संरचना में निवेश करने की प्रेरणा कम हो जाती है।
- नैतिक और न्यायशास्त्रीय चिंताएँ
- क्रमिक विकृति की आशंका: आलोचकों का तर्क है कि 'मृत्यु का अधिकार' अंततः 'मृत्यु के कर्त्तव्य' में परिवर्तित हो सकता है।
- PVS रोगियों के लिये एक विकल्प के रूप में शुरू होने वाली इस सुविधा का विस्तार अवसाद, मनोभ्रंश या स्थायी दिव्यांगता वाले लोगों तक होने की संभावना बन सकती है।
- जीवन की शुचिता बनाम जीवन की गुणवत्ता: कर्त्तव्य-आधारित नैतिकता के दृष्टिकोण से, जीवन एक अंतर्निहित मूल्य है।
- जब राज्य ‘अस्तित्व’ की अपेक्षा ‘गुणवत्ता’ को प्राथमिकता देता है, तब वह मानव जीवन पर एक 'कीमत' या 'मूल्य' निर्धारित करने लगता है, जो एक खतरनाक विधिक दृष्टांत बन सकता है।
- चिकित्सकों की ‘उपचारकर्त्ता’ पहचान का क्षरण: चिकित्सीय व्यवसाय जीवन को बचाने के उद्देश्य पर आधारित है।
- जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने में चिकित्सकों को सम्मिलित करने से, उनकी पेशेवर पहचान 'प्राणतत्त्ववाद' (किसी भी कीमत पर जीवन की रक्षा करना) के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता से परिवर्तित होकर 'सापेक्षतावादी दृष्टिकोण' की ओर स्थानांतरित हो जाती है, जिसमें यह निर्णय करना पड़ता है कि किस जीवन को बचाया जाना चाहिये।
- यह ‘नैतिक आघात’ उन स्वास्थ्यकर्मियों में मनोवैज्ञानिक विश्रांति उत्पन्न कर सकता है, जिन्हें मृत्यु को एक सुगम परिणाम के बजाय एक पेशेवर विफलता के रूप में देखने के लिये प्रशिक्षित किया जाता है।
- क्रमिक विकृति की आशंका: आलोचकों का तर्क है कि 'मृत्यु का अधिकार' अंततः 'मृत्यु के कर्त्तव्य' में परिवर्तित हो सकता है।
भारत निष्क्रिय इच्छामृत्यु में नैतिक एवं विधिक सुरक्षा को और किस प्रकार सुनिश्चित कर सकता है?
- 'अधिकार-आधारित' विधि का संहिताकरण: वर्तमान में निष्क्रिय इच्छामृत्यु न्यायिक दिशा-निर्देशों के अधीन संचालित होती है, जो अस्थायी ‘सेतु’ के समान है। संसद को जीवन-अंत देखभाल हेतु एक समर्पित अधिनियम पारित करना चाहिये, जिसमें निम्नलिखित प्रावधान किये जा सकें—
- अनुमोदित प्रोटोकॉल का पालन करने पर ‘भारतीय न्याय संहिता (BNS)’ के तहत चिकित्सकों को दंडात्मक दायित्व से स्पष्ट संरक्षण प्रदान किया जाए।
- ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ जैसे अप्रासंगिक शब्द के स्थान पर अधिक चिकित्सीय रूप से उपयुक्त ‘जीवन-समर्थन उपचार का निरसन या निरोध’ शब्दावली का प्रयोग किया जाए।
- अग्रिम निर्देशों का डिजिटल एकीकरण: अग्रिम चिकित्सीय निर्देशों को आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाता (ABHA) प्रणाली के साथ एकीकृत करने से एक केंद्रीकृत, छेड़छाड़-रहित डिजिटल रजिस्ट्री स्थापित होती है जो देशभर के आपातकालीन चिकित्सकों के लिये सुलभ है।
- इससे फिज़िकल डॉक्यूमेंट्स पर निर्भरता समाप्त हो जाती है और गहन चिकित्सा में भर्ती के दौरान पारिवारिक दमन या विलंबित निष्पादन का जोखिम कम हो जाता है।
- इस प्रकार का परस्पर-संगत डिजिटल शासन रोगी की पूर्व-निर्धारित जैव-नैतिक सीमाओं के अनुरूप तात्कालिक स्तर पर चिकित्सकीय अनुपालन को सुनिश्चित करता है।
- यह विभिन्न अस्पताल नेटवर्कों में सत्यापन प्रक्रिया को मानकीकृत करता है, जिससे संरचनात्मक स्तर पर रोगी की स्वायत्तता सुनिश्चित होती है।
- अनिवार्य उपशामक चरणबद्ध प्रक्रिया: गहन चिकित्सा से विशेषीकृत उपशामक देखभाल की ओर अनिवार्य संक्रमण को संस्थागत रूप देने से यह सुनिश्चित होता है कि जीवन रक्षक प्रणाली को हटाना सुदृढ़ आरामदायक देखभाल की शुरुआत करने के समान है।
- यह संरचनात्मक जनादेश रोगी का परित्याग किये जाने से रोकता है और गहन उपचारात्मक हस्तक्षेपों को उच्च स्तरीय समग्र लक्षण प्रबंधन एवं मनोसामाजिक सहायता से प्रतिस्थापित करता है।
- देखभाल की इस निरंतरता का विनियमन जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने और जैविक मृत्यु के बीच उत्पन्न होने वाली चिकित्सीय शून्यता को समाप्त करता है तथा मानवीय गरिमा को पूर्णतः संरक्षित रखता है।
- यह चिकित्सा उद्देश्य को मात्र जैविक विस्तार से पुनर्परिभाषित करके पीड़ा-रहित, गरिमापूर्ण जीवन-अंत अनुभव को प्राथमिकता देने की दिशा में पुनर्संतुलित करता है।
- वैधानिक ज़िला स्तरीय नैतिकता समितियाँ: ज़िला अस्पताल स्तर पर स्थायी, बहु-विषयक जैव-नैतिकता समितियों की स्थापना से अनुमोदन प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण होता है, जिससे ग्रामीण–शहरी जैव-नैतिक असमानता के गंभीर अंतराल को समाप्त किया जा सकता है।
- तात्कालिक कॉर्पोरेट अस्पताल बोर्डों से हटकर वैधानिक ज़िला निकायों की ओर संक्रमण महानगर-केंद्रित स्वास्थ्य केंद्रों के बाहर जीवन-अंत से जुड़ी दुविधाओं के लिये समान, निष्पक्ष तथा त्वरित निर्णय सुनिश्चित करता है।
- इससे गरिमापूर्ण मृत्यु तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण होता है, जिससे ग्रामीण आबादी को एक स्थानीय, विधिक रूप से संरक्षित एवं सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील शिकायत और अनुमोदन तंत्र प्रदान किया जाता है।
- यह वर्तमान में स्तर-2 और स्तर-3 के चिकित्सकों को विधिक-चिकित्सीय उत्पीड़न के भय से बाधित करने वाली प्रक्रियात्मक जटिलताओं को दूर करता है।
- पूर्वव्यापी नैदानिक लेखापरीक्षा: प्रत्येक क्रियान्वित निष्क्रिय इच्छामृत्यु प्रकरण के लिये राज्य चिकित्सा परिषदों द्वारा अनिवार्य, गोपनीय पूर्वव्यापी नैदानिक लेखा-परीक्षण की स्थापना प्रक्रियात्मक दुरुपयोग तथा वाणिज्यिक शोषण के विरुद्ध एक सशक्त निवारक तंत्र निर्मित करती है।
- यह परोक्ष नियामकीय परीक्षण सुनिश्चित करती है, ताकि अस्पताल प्रशासन स्थापित दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करे तथा विशिष्ट निजी संस्थानों में उपचार-निरसन की दरों में असामान्य वृद्धि की पहचान कर दंडात्मक कार्रवाई की जा सके।
- इन निर्णयों की कठोर महामारी-विज्ञान आधारित निगरानी, लाभ-केंद्रित गहन ICU बेड टर्नओवर रणनीतियों से समग्र तंत्र को सुरक्षित रखती है।
- यह पूर्ण संस्थागत उत्तरदायित्व का वातावरण स्थापित करता है, जिससे चिकित्सकीय समुदाय की नैतिक अखंडता संरक्षित रहती है।
- बीमा संबंधी कारकों को अलग करना: बीमा नियामक द्वारा नियामक ढाँचे का पुनर्गठन करते हुए यह स्पष्ट रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिये कि विधिक प्रोटोकॉल के माध्यम से संपन्न निष्क्रिय इच्छामृत्यु जीवन या स्वास्थ्य बीमा भुगतान को अमान्य नहीं करती है, जो एक अत्यावश्यक वित्तीय सुरक्षा उपाय है।
- यह महत्त्वपूर्ण पृथक्करण सुनिश्चित करता है कि जीवन-अंत के क्षणों से जुड़े पीड़ादायक निर्णय बीमा क्लेम के अस्वीकार होने की आशंका तथा निकटवर्ती चिकित्सकीय आर्थिक संकट के दबाव से पूर्णतः मुक्त रह सकें।
- इस वित्तीय अस्पष्टता को दूर करने से परिजन रोगी की नैदानिक वास्तविकता तथा अग्रिम निर्देशों के आधार पर ही निर्णय ले सकेंगे, न कि आर्थिक अस्तित्व के दबाव में।
- ‘मृत्यु साक्षरता’ का मुख्यधारा में समावेशन: सामुदायिक स्वास्थ्य नेटवर्क के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में 'मृत्यु साक्षरता' के समावेशन से पितृसत्तात्मक समाज में जीवन के अंत की योजना से जुड़े सांस्कृतिक वर्जनाओं को समाप्त किया जा सकता है।
- नियमित वृद्धावस्था देखभाल के दौरान अग्रिम निर्देशों पर संवाद को सक्रिय रूप से सामान्य बनाना, नागरिकों को संज्ञानात्मक ह्रास से पूर्व ही अपनी स्वायत्तता को अभिलेखित करने में सक्षम बनाता है।
- यह सामाजिक-सांस्कृतिक अभिक्रिया समाज की अंतर्निहित धारणा को प्रतिक्रियात्मक, संकट-प्रेरित गहन चिकित्सा दुविधाओं से हटाकर सक्रिय, सूचित चिकित्सा सहमति की दिशा में विकसित करती है। यह एक परिपक्व जन-स्वास्थ्य तंत्र का निर्माण करती है, जहाँ गरिमापूर्ण मृत्यु की तैयारी को एक मूलभूत नागरिक तथा पारिवारिक कर्त्तव्य के रूप में देखा जाता है।
निष्कर्ष:
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु का विकास जैविक संरक्षण से मानव गरिमा के संरक्षण की ओर एक महत्त्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है। ‘हरीश राणा मामले’ से प्राप्त न्यायिक स्पष्टता को सुदृढ़ उपशामक देखभाल तथा डिजिटल सुरक्षा उपायों के साथ समेकित कर भारत दुरुपयोग तथा चिकित्सकीय अतिक्रमण के जोखिमों को कम कर सकता है। अंततः इन न्यायिक दिशा-निर्देशों को सभी नागरिकों के लिये एक पूर्वानुमेय, करुणामय तथा नैतिक रूप से सुदृढ़ वास्तविकता में परिवर्तित करने हेतु एक वैधानिक ढाँचा आवश्यक है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की सामाजिक-आर्थिक आवश्यकता का मूल्यांकन कीजिये। राज्य किस प्रकार महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य अवसंरचना के युक्तिकरण तथा संवेदनशील वर्गों को दबाव से संरक्षण देने के संवैधानिक कर्त्तव्य के मध्य संतुलन स्थापित कर सकता है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. क्या सक्रिय इच्छामृत्यु भारत में वैध है?
नहीं, केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु (उपचार को रोकना या हटाना) वैध है; सक्रिय इच्छामृत्यु अभी भी दंडनीय कृत्य है।
प्रश्न 2. वर्तमान में ‘लिविंग विल’ का प्रमाणीकरण कौन कर सकता है?
वर्ष 2023 के संशोधन के पश्चात् ‘लिविंग विल’ को मजिस्ट्रेट के स्थान पर नोटरी या राजपत्रित अधिकारी द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है।
प्रश्न 3. क्या कोई परिवार लिविंग विल के बिना उपचार रोक सकता है?
हाँ, ‘सर्वोत्तम हित’ या ‘प्रतिस्थापित निर्णय’ परीक्षण के माध्यम से, जिसे दो-स्तरीय चिकित्सकीय बोर्ड द्वारा सत्यापित किया जाता है।
प्रश्न 4. ‘द्वि-प्रभाव सिद्धांत’ क्या है?
यह वह नैतिक सिद्धांत है जिसमें किसी कार्य का प्राथमिक उद्देश्य नैतिक होता है (पीड़ा को समाप्त करना), यद्यपि उसका पूर्वानुमेय परिणाम नकारात्मक (मृत्यु) हो सकता है।
प्रश्न 5. क्या चिकित्सकीय रूप से सहायक पोषण (CANH) को उपचार माना जाता है?
हाँ, वर्ष 2026 के ‘हरिश राणा प्रकरण’ ने पुष्टि की कि यह एक चिकित्सकीय हस्तक्षेप है, जिसे विधिक रूप से हटाया जा सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. निजता के अधिकार को जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्भूत भाग के रूप में संरक्षित किया जाता है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से किससे उपर्युक्त कथन सही एवं समुचित ढंग से अर्थित होता है? (2018)
(a) अनुच्छेद 14 एवं संविधान के 42वें संशोधन के अधीन उपबंध
(b) अनुच्छेद 17 एवं भाग IV में दिये राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व
(c) अनुच्छेद 21 एवं भाग III में गारंटी की गई स्वतंत्रताएँ
(d) अनुच्छेद 24 एवं संविधान के 44वें संशोधन के अधीन उपबंध
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न 1. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचन कीजिये। (2020)