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सामाजिक न्याय

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट

  • 11 May 2023
  • 14 min read

प्रिलिम्स के लिये:

संयुक्त राष्ट्र (UN), मातृ मृत्यु दर अनुपात, रक्तस्राव, जननी-शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK), लक्ष्य

मेन्स के लिये:

मातृ और शिशु मृत्यु के प्रमुख कारण, मातृ और शिशु स्वास्थ्य से संबंधित सरकारी पहल

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र (United Nations- UN) की एक नई रिपोर्ट में पाया गया है कि वर्ष 2015 के बाद से प्रत्येक वर्ष गर्भावस्था, प्रसव या जन्म के पहले सप्ताह के दौरान मरने वाली महिलाओं और शिशुओं की संख्या में आ रही कमी में बाधा उत्पन्न हुई है

प्रमुख बिंदु  

  • वैश्विक मातृ और नवजात स्वास्थ्य चुनौतियाँ:  
    • रिपोर्ट में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारत मातृ मृत्यु, स्टिलबर्थ/मृत जन्म और नवजात मृत्यु के वैश्विक बोझ में सबसे आगे है, जो कुल मृत्यु का 17% है।
      • भारत के बाद वर्ष 2020 में सबसे अधिक निरपेक्ष मातृ और नवजात मृत्यु तथा मृत जन्म वाले देश नाइजीरिया, पाकिस्तान, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, इथियोपिया, बांग्लादेश, चीन, इंडोनेशिया, अफगानिस्तान एवं तंज़ानिया हैं।
    • रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों से पता चलता है कि वर्ष 2000 और 2010 के बीच हुए सुधार वर्ष 2010 के बाद के वर्षों की तुलना में तेज़ थे, साथ ही यह भी दर्शाया गया है कि वैश्विक लक्ष्यों को पूरा करने हेतु अगले दशक में यह कैसा होना चाहिये।
  • प्रवृत्ति:  
    • मातृ मृत्यु दर अनुपात (Maternal Mortality Ratio- MMR): 
      • MMR में वर्ष 2000 और 2009 के बीच 2.8% की दर से वार्षिक कमी देखी गई, जो वर्ष 2010 एवं 2020 के बीच घटकर 1.3% हो गई है।
        • मातृ मृत्यु अनुपात किसी दी गई जनसंख्या या क्षेत्र में प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर मातृ मृत्यु की संख्या को संदर्भित करता है।
        • यह गर्भावस्था, प्रसव और प्रसवोत्तर अवधि के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य एवं कल्याण का महत्त्वपूर्ण संकेतक है।
      • प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 70 मौतों के MMR के वैश्विक लक्ष्यों को पूरा करने हेतु अगले दशक में इस सूचक को 11.9% तक कम करने हेतु सुधार की आवश्यकता है।
    • स्टिलबर्थ रेट (SBR):  
      • SBR वर्ष 2000 और 2009 के बीच 2.3% एवं वर्ष 2010 और 2021 के बीच 1.8% कम हो गया था। 
        • प्रति 1,000 जन्मों पर ऐसे बच्चों का जन्म जिनके विषय में गर्भावस्था के 28 सप्ताह अथवा उसके बाद के समय में भी बच्चे के विषय में कोई संकेत नहीं मिल रहे होते हैं, SBR कहा जाता है।
      • वर्ष 2022 और 2030 के बीच प्रति 1,000 जीवित जन्मों पर 12 से कम मृत जन्मों के वैश्विक लक्ष्य को पूरा करने के लिये 5.2% की दर से इस प्रकार की मौतों में कमी लाने की आवश्यकता है।
    • नवजात मृत्यु दर (Neonatal Mortality Rate- NMR):  
      • NMR में समान पैटर्न दर्ज किया गया है; वर्ष 2000 और 2009 के बीच 3.2% की कमी, वर्ष 2010 और 2021 के बीच 2.2% की कमी।
        • प्रति 1,000 जीवित जन्मों के बाद जीवन के पहले 28 दिनों के भीतर शिशुओं की मृत्यु की संख्या को नवजात मृत्यु दर कहा जाता है।
      • नवजात मृत्यु दर को पूरी तरह नियंत्रित करने के वैश्विक लक्ष्य को पूरा करने के लिये वर्ष 2022 और 2030 के बीच NMR को और 7.2% कम करने की आवश्यकता है।
  • सुझाए गए उपाय:  
    • मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ाकर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। सुविधाओं की उपलब्धता का आकलन करने के तीन तरीके हैं: प्रसव-पूर्व देखभाल हेतु कम-से-कम चार बार चिकित्सीय सलाह लेना, जन्म के समय कुशल परिचारक की उपलब्धता और जन्म के बाद पहले दो दिनों के भीतर प्रसवोत्तर देखभाल
      • प्रसव-पूर्व देखभाल कवरेज वर्ष 2010 के 61% से बढ़कर वर्ष 2022 में 68% हो गया है, जिसमें वर्ष 2025 तक 69% की वृद्धि अनुमानित है।
      • वर्ष 2010 और 2022 के बीच जन्म के समय कुशल परिचर (attendant) की सुविधा कवरेज 75% से बढ़कर 86% हो गया है तथा वर्ष 2025 तक 88% तक पहुँचने की उम्मीद है।
      • प्रसवोत्तर देखभाल कवरेज में उच्चतम सुधार देखा गया है, वर्ष 2010 और 2022 के बीच 54% से 66% तक की वृद्धि के साथ वर्ष 2025 तक यह कवरेज 69% तक पहुँचने का अनुमान है। 

मातृ एवं शिशु मृत्यु का प्रमुख कारण:

  • मातृ मृत्यु: 
    • अधिक रक्तस्राव: यह मातृ मृत्यु का प्रमुख कारण है, जो अक्सर बच्चे के जन्म के दौरान अथवा तत्काल प्रसवोत्तर अवधि में होता है।
    • उच्च रक्तचाप विकार (प्री-एक्लेमप्सिया और एक्लम्पसिया): इन स्थितियों के परिणामस्वरूप अंग विफलता, दौरा पड़ना और यहाँ तक कि मातृ मृत्यु भी हो सकती है।
    • असुरक्षित गर्भपात: ऐसे क्षेत्र जहाँ सुरक्षित और कानूनी गर्भपात तक पहुँच सीमित है, महिलाएँ असुरक्षित प्रक्रियाओं का सहारा लेती हैं जिससे कई जटिलताएँ और मातृ मृत्यु हो सकती है।
    • अन्य कारक: मोटे तौर पर एक-तिहाई महिलाएँ अनुशंसित आठ प्रसव-पूर्व जाँचों में से चार भी नहीं करवाती हैं या फिर उन्हें आवश्यक प्रसवोत्तर देखभाल प्राप्त नहीं होती है, लगभग 270 मिलियन महिलाओं की आधुनिक परिवार नियोजन विधियों तक पहुँच नहीं है।
  • शिशु मृत्यु:
    • जन्म के समय वज़न कम होना: अतिशीघ्र (समय से पूर्व/प्रीटर्म) या जन्म के समय कम वज़न वाले बच्चे विभिन्न स्वास्थ्य जटिलताओं के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, उनमें मृत्यु दर का खतरा अधिक होता है।
    • बर्थ एस्फिक्सिया (जन्म के समय दम घुटना): जब बच्चे को प्रसव के दौरान पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है, तो इसका परिणाम बर्थ एस्फिक्सिया हो सकता है, यदि तुरंत उपचार नहीं किया जाता है तो मस्तिष्क क्षति या मृत्यु हो सकती है।
    • आकस्मिक शिशु मृत्यु सिंड्रोम (SIDS): SIDS एक वर्ष से कम उम्र के शिशु की आकस्मिक, अस्पष्टीकृत मृत्यु को संदर्भित करता है, यह सामान्यतः नींद के दौरान होती है।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से संबंधित सरकारी पहलें:

  • जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (JSSK): भारत सरकार ने 1 जून, 2011 को यह योजना शुरू की है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव कराने वाली सभी गर्भवती महिलाओं को सिजेरियन सेक्शन सहित बिल्कुल मुफ्त और बिना किसी खर्च के प्रसव कराने का अधिकार देती है।
    • यह पहल नि:शुल्क दवाओं, निदान, रक्त और आहार के अतिरिक्त घर से संस्था तक नि:शुल्क परिवहन जैसे- घर से ले जाने और वापस छोड़ने की सुविधाएँ निर्धारित करती है। वर्ष 2013 में इसे बीमार शिशुओं और प्रसव-पूर्व एवं प्रसवोत्तर जटिलताओं तक विस्तारित किया गया था।
    • जन्म के 30 दिन बाद तक इलाज के लिये सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुँचने वाले सभी बीमार नवजातों को इसी पात्रता की श्रेणी में रखा गया है
    • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA): इसे वर्ष 2016 में प्रत्येक महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं में गुणवत्तापूर्ण प्रसव-पूर्व देखभाल और उच्च जोखिम गर्भावस्था का पता लगाने हेतु प्रारंभ किया गया था।
    • लक्ष्य: आने वाले वर्षों में MMR (मातृ मृत्यु दर) में और गिरावट लाने के लिये सरकार ने 'लक्ष्य- लेबर रूम क्वालिटी इम्प्रूवमेंट इनिशिएटिव' लॉन्च किया है।
    • लक्ष्य कार्यक्रम लेबर रूम और मातृत्व ऑपरेशन थिएटर से संबंधित प्रमुख प्रक्रियाओं को मज़बूत करने के लिये एक केंद्रित और लक्षित दृष्टिकोण है, जिसका उद्देश्य जन्म के समय देखभाल की गुणवत्ता में सुधार करना और सम्मानजनक मातृत्व देखभाल सुनिश्चित करना है।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार की विधियाँ:    

  • सामाजिक-आर्थिक कारकों को संबोधित करना: गरीबी, शिक्षा और लैंगिक असमानता जैसे स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों को पहचानने और संबोधित करने की आवश्यकता है, जो मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।
  • गर्भ रक्षा हेल्पलाइन बनाना: विशेष रूप से वंचित क्षेत्रों में माताओं और शिशुओं के लिये गुणवत्तापूर्ण और समय पर स्वास्थ्य देखभाल के प्रावधान को बढ़ाने हेतु, चिकित्सा कर्मियों के सहयोग से ज़िला स्तरीय टास्क फोर्स का गठन करना अनिवार्य है।
    • ये टास्क फोर्स स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवा वितरण और परिणामों को बेहतर बनाने की दिशा में कार्य करेंगे। इसमें गर्भ रक्षा हेल्पलाइन नंबर और एम्बुलेंस तथा मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयाँ शामिल हो सकती हैं।
    • उदाहरण के लिये दिल्ली में महिलाओं द्वारा चलाई जाने वाली पिंक एम्बुलेंस महिला रोगियों के लिये महिलाओं द्वारा प्रबंधित है, यह कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू की गई थी।
  • पोषण और खाद्य सुरक्षा: मातृ और शिशु पोषण में सुधार के लिये नवीन दृष्टिकोणों को लागू करना जैसे कि सामुदायिक उद्यान, पोषक खाद्य कार्यक्रम और मोबाइल एप्लीकेशन जो व्यक्तिगत आहार अनुशंसाएँ प्रदान करते हैं। खाद्य बैंक एवं वाउचर प्रणाली जैसी पहलों के माध्यम से खाद्य असुरक्षा को संबोधित करना भी बेहतर स्वास्थ्य परिणामों में योगदान कर सकता है।
  • स्वास्थ्य शिक्षा और जागरूकता: मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिये माताओं, परिवारों तथा समुदायों को लक्षित करने वाले अभिनव शैक्षिक कार्यक्रम बनाने की आवश्यकता है।
    • आकर्षक और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील स्वास्थ्य जानकारी देने के लिये डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल एप्लीकेशन एवं इंटरैक्टिव मीडिया का उपयोग करना भी उपयोगी होगा।
    • साथ ही नियमित प्रसव-पूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य जाँच को शामिल करने की आवश्यकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में विशेषकर जरा चिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचना कीजिये। (2020) 

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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