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लोक संपत्तियों के नुकसान की क्षतिपूर्ति

  • 30 Dec 2019
  • 6 min read

प्रीलिम्स के लिये:

लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984

मेन्स के लिये:

लोक संपत्ति की क्षतिपूर्ति से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए दिशा-निर्देश

चर्चा में क्यों?

हाल ही में नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 [The Citizenship (Amendment) Act, 2019-CAA] के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान लोक-संपत्तियों को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति हेतु नागरिक समाज (सिविल सोसायटी) द्वारा दी गई क्षतिपूर्ति राशि को स्वीकार करने में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए दिशा-निर्देशों की उपेक्षा की गई है।

मुख्य बिंदु:

  • वर्ष 2009 में ‘डिस्ट्रक्शन ऑफ पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टीज़ Vs स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश एंड अदर्स’ (Destruction of Public & Private Properties v State of AP and Others) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए लोक संपत्तियों को हुए नुकसान और देयता संबंधी दिशा-निर्देश दिया था।

उपरोक्त संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए दिशा-निर्देश एवं प्रक्रिया:

  • हिंसा की घटनाओं में नष्ट की गई संपत्ति के लिये ‘अनुकरणीय क्षति’ (Exemplary Damages) का आकलन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया/निजी वीडियो सबूतों पर आधारित होना चाहिये।
  • अभियोजन पक्ष (Prosecution) को भी पृथक रूप से यह साबित करना होता है कि किसी संगठन द्वारा की गई प्रत्यक्ष कार्रवाई में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा है और यह संबंधित व्यक्तियों के ‘प्रत्यक्ष कार्यों’ का परिणाम था।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को भी ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेने के लिये दिशा-निर्देश जारी किये हैं तथा सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान के कारणों को जानने तथा क्षतिपूर्ति की जाँच के लिये एक तंत्र की स्थापना करने के लिये कहा था।
  • ऐसे प्रत्येक मामले में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय को क्षतिपूर्ति का अनुमान लगाने एवं देयता की जाँच के लिये उच्च न्यायालय के वर्तमान/सेवानिवृत्त न्यायाधीश या वर्तमान/सेवानिवृत्त ज़िला न्यायाधीश को दावा आयुक्त (Claims Commissioner) के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिये। दावा आयुक्त की सहायता के लिये एक परामर्शदाता की नियुक्ति भी की जानी चाहिये।
  • दावा आयुक्त और मूल्यांकनकर्त्ता, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार कार्य करते हुए, क्षति को परिभाषित करने तथा क्षति के लिये ज़िम्मेदार व्यक्तियों से संपर्क स्थापित करने के लिये निजी और सार्वजनिक स्रोतों से वीडियो या अन्य रिकॉर्डिंग का भी प्रयोग कर सकते हैं।
  • लोक संपत्ति के नुकसान संबंधी मामले में पूर्ण देयता का सिद्धांत केवल उन्हीं मामलों में लागू होगा, जिन मामलों में आरोप सिद्ध हो चुके हैं। यह देयता वास्तविक आरोपियों के साथ इसके आयोजकों द्वारा वहन की जाएगी। ज्ञातव्य है कि क्षतिपूर्ति के रूप में वसूली जाने वाली राशि में इन दोनों की देयता न्यायालय द्वारा तय की जाएगी।
  • ‘अनुकरणीय क्षति’ की राशि भुगतान की जाने वाली क्षतिपूर्ति के दुगने से अधिक नहीं होनी चाहिये।
  • क्षतिपूर्ति की राशि का आकलन नष्ट की गई सार्वजनिक या निजी संपत्ति के मूल्य, मृतकों एवं घायलों को हुए नुकसान तथा हिंसा को रोकने में अधिकारियों एवं पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई पर आने वाली लागत के आधार पर किया जाना चाहिये। दावा आयुक्त अंत में उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा, जो दोनों पक्षों को सुनने के बाद देयता का निर्धारण करेगा।

लोक संपत्तियों के संरक्षण से संबंधित भारतीय कानून:

लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984:

(The Prevention of Damage to Public Property Act, 1984)

  • इस अधिनियम के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति किसी भी सार्वजनिक संपत्ति को दुर्भावनापूर्ण कृत्य द्वारा नुकसान पहुँचाता है तो उसे पाँच साल तक की जेल अथवा जुर्माना या दोनों सज़ा से दंडित किया जा सकता है।
  • इस अधिनियम के अनुसार, लोक संपत्तियों में निम्नलिखित को शामिल किया गया है-
    • कोई ऐसा भवन या संपत्ति जिसका प्रयोग जल, प्रकाश, शक्ति या उर्जा के उत्पादन और वितरण किया जाता है।
    • तेल संबंधी प्रतिष्ठान
    • खान या कारखाना
    • सीवेज संबंधी कार्यस्थल
    • लोक परिवहन या दूर-संचार का कोई साधन या इस संबंध में उपयोग किया जाने वाला कोई भवन, प्रतिष्ठान और संपत्ति।

हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय ने कई अवसरों पर इस कानून को अपर्याप्त बताया है और दिशा-निर्देशों के माध्यम से अंतराल को भरने का प्रयास किया है।

स्रोत- द हिंदू, द इंडियन एक्सप्रेस

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