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अरुणाचल हिमालय का भूकंपीय अध्ययन

  • 27 Jul 2020
  • 8 min read

प्रीलिम्स के लिये:

पॉइसन अनुपात, भूकंप की गहराई, LVZ, हिमालय का निर्माण जैसे पारंपरिक मुद्दे 

मेन्स के लिये:

भूकंपीय अध्ययन का महत्त्व, मुख्य परीक्षा में उदाहरण के तौर पर इसे संदर्भित किया जा सकता है

चर्चा में क्यों?

'वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी' (WIHG) द्वारा भारत के सबसे पूर्वी हिस्से में अरुणाचल हिमालय (Arunachal Himalaya) के चट्टानों की लोचशीलता और भूकंपीयता के अध्ययन से पता चला है कि यह क्षेत्र दो अलग-अलग गहराई पर मध्यम तीव्रता के भूकंप उत्पन्न कर रहा है।

प्रमुख बिंदु:

  • WIGH भारत सरकार के 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग' (Department of Science & Technology- DST) के तहत एक स्वायत्त संस्थान है।
  • यह हिमालय के भू-आवेग संबंधी विकास के संबंध में नई अवधारणाओं और मॉडलों के विकास के लिये अनुसंधान कार्यों को संपन्न करता है।
  • अरुणाचल हिमालय को भूकंपीय ज़ोन-V में रखा गया है, इस प्रकार यह भूकंप के लिये सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। 

शोध के निष्कर्ष:

  • अरुणाचल हिमालयी क्षेत्र की भू-पर्पटी में दो अलग-अलग गहराईयों पर मध्यम तीव्रता के भूकंपीय क्षेत्र अवस्थित है।
    • कम परिमाण (Low magnitude) के भूकंप, जो कि  1-15 किमी. की गहराई पर उत्पन्न होते हैं।
    • 4.0 से अधिक परिमाण वाले भूकंप, जो अधिकतर 25-35 किमी. की गहराई पर उत्पन्न होते हैं। 
  • मध्यवर्ती गहराई का क्षेत्र भूकंपीयता से रहित है तथा यह आंशिक रूप से पिघलित अवस्था में है।
  • इस क्षेत्र में भू-पर्पटी की मोटाई ब्रह्मपुत्र घाटी में 46.7 किमी.  से लेकर अरुणाचल हिमालय में लगभग 55 किमी. तक विस्तृत है और सीमांत पर उत्थान के कारण भू-पर्पटी और मेंटल के बीच एक असंबद्धता पाई जाती है,  जिसे मोहो असंबद्धता (Moho D) कहा जाता है।
  • लोहित घाटी के उच्च भागों में अत्यधिक उच्च पॉइसन अनुपात (High Poisson’s Ratio) दर्ज  किया गया है,  जो अधिक गहराई पर भू-पर्पटी की आंशिक पिघलित अवस्था को दर्शाता है।

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पॉइसन अनुपात (Poisson’s Ratio):

  • पॉइसन अनुपात पॉइसन प्रभाव का एक मापक है, जो लोडिंग या बल की दिशा की  लंबवत दिशाओं में किसी सामग्री के विस्तार या संकुचन का वर्णन करता है।
  • सरल शब्दों में कहा जाए तो किसी सामग्री का जितना अधिक पॉइसन अनुपात होगा, वह सामग्री उतनी ही लोचदार विरूपण प्रदर्शित करती है।
  • रबड़ का पॉइसन अनुपात उच्च जबकि कॉर्क में शून्य के करीब होता है।

शोध की प्रक्रिया:

  • WIHG ने भारत के पूर्वी भाग में चट्टानों और भूकंपीय गुणों को समझने के लिये अरुणाचल हिमालय की लोहित नदी घाटी के किनारे  ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम (GPS) के माध्यम से जुड़े हुए 11 ब्रॉडबैंड भूकंपीय स्टेशन स्थापित किये हैं।
  • शोध के लिये टेलिसिस्मिक (Teleseismic) और सिस्मोमीटरों (Seismometers) की मदद से मापे गए स्थानीय भूकंप डेटा का उपयोग किया गया।
    • टेलिसिस्मिक ऐसे भूकंपों के विषय में जानकारी देता है जो माप स्थल से 1000 किमी. से अधिक दूरी पर उत्पन्न होते हैं। 

शोध का महत्त्व:

क्षेपण प्रक्रिया को समझने में सहायक:

  • प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, हिमालय का निर्माण भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के बीच लगभग 50-60 मिलियन वर्ष पूर्व टकराव के कारण हुआ। इस सिद्धांत के अनुसार यूरेशियन प्लेट के नीचे भारतीय प्लेट का निरंतर क्षेपण हो रहा है जिसके कारण अभी भी हिमालय का उत्थान जारी है।
  • यह अध्ययन, ट्यूटिंग-टिडिंग सेचर ज़ोन (Tuting-Tidding Suture Zone) में भारतीय प्लेट की क्षेपण प्रक्रिया को समझने में मदद करता है।
    • ट्यूटिंग-टिडिंग सेचर ज़ोन (TTSZ) पूर्वी हिमालय का एक प्रमुख हिस्सा है जहाँ हिमालय अक्षसंघीय  मोड़ (Syntaxial Bend) अर्थात् हेयरपिन मोड़ बनाता हुआ दक्षिण की तरफ  इंडो-बर्मा श्रेणी से जुड़ जाता है।
  • क्षेपण प्रक्रिया के क्षेत्र के अपवाह प्रतिरूप तथा स्थलाकृतियों में बदलाव आता है जिसके कारण हिमालय पर्वत बेल्ट और आसपास के क्षेत्रों में बड़े भूकंप आने का खतरा रहता है। अत: ऐसे क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की निर्माण गतिविधियों को शुरू करने से पूर्व भूकंप की संभावित गहराई और तीव्रता की जानकारी होना आवश्यक है।

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अवसंरचनात्मक विकास:

  • भारत पूर्वोत्तर राज्यों में अवसंरचनात्मक विकास कार्यों जैसे सड़कों और पनबिजली परियोजनाओं के निर्माण पर जोर दे रहा है, अत: इस क्षेत्र में भूकंपीयता के पैटर्न को समझने की आवश्यकता है।

भूकंप की गहराई (Depth of an Earthquake):

  • भूकंप, पृथ्वी की सतह तथा सतह से लगभग 700 किमी. की गहराई तक कहीं भी उत्पन्न हो सकते  है। वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिये 0-700 किमी. की इस भूकंप की गहराई की सीमा को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है; उथला,  मध्यवर्ती और गहरा।
  • उथले भूकंप 0-70 किमी. के बीच, मध्यवर्ती भूकंप 70-300 किमी. की गहराई पर और गहरे भूकंप 300-700 किमी. की गहराई पर उत्पन्न होते हैं।

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कम-वेग का क्षेत्र (Low-Velocity Zone-  LVZ):

  • ऊपरी मेंटल में कम भूकंपीय तरंगों के कम वेग के आधार पर LVZ की पहचान की जाती है। यह 180–220 किमी. की गहराई का क्षेत्र होता है। 
  • इस क्षेत्र में उच्च भूकंपीय ऊर्जा में कमी हो जाती है। 
  • यह क्षेत्र आंशिक पिघलित अवस्था में पाया जाता है, अत: यह उच्च विद्युत चालकता वाला क्षेत्र होता है।
  • LVZ के निचले भाग की असम्बद्धता को लेहमान की असम्बद्धता भी कहा जाता है।

स्रोत: द हिंदू

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