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राज्यसभा चुनाव में NOTA का इस्तेमाल नहीं

  • 22 Aug 2018
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में राज्यसभा चुनावों के लिये नोटा (उपर्युक्त में से कोई भी) विकल्प के उपयोग को रद्द कर दिया है। उल्लेखनीय है कि  चुनाव आयोग ने वर्ष 2014 और 2015 में दो अधिसूचनाएँ जारी करके राज्यसभा चुनाव में नोटा को लागू किया था।

‘नोटा’ क्या है?

  • इसका अर्थ है ‘इनमें से कोई नहीं’।
  • भारत में नोटा के विकल्प का उपयोग पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 2013 में दिये गए एक आदेश के बाद शुरू हुआ, विदित हो कि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ बनाम भारत सरकार मामले में शीर्ष न्यायालय ने आदेश दिया कि जनता को मतदान के लिये नोटा का भी विकल्प उपलब्ध कराया जाए।
  • इस आदेश के बाद भारत नकारात्मक मतदान का विकल्प उपलब्ध कराने वाला विश्व का 14वाँ देश बन गया।
  • नोटा के तहत ईवीएम मशीन में नोटा (NONE OF THE ABOVE-NOTA) के उपयोग के लिये गुलाबी रंग का बटन होता है।
  • यदि पार्टियाँ ग़लत उम्मीदवार खड़ा करती हैं तो नोटा का बटन दबाकर पार्टियों के प्रति जनता अपना विरोध दर्ज करा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

  • यह महत्त्वपूर्ण फैसला गुजरात कॉन्ग्रेस के नेता और मुख्य सचेतक शैलेश मनुभाई परमार द्वारा दायर की गई याचिका पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, ए.एम. खानविलकर और डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने सुनाया है।
  • इस याचिका में राज्यसभा चुनाव में चुनाव आयोग द्वारा नोटा विकल्प लागू करने की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी।
  • न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के नेतृत्व में तीन न्यायाधीशों की एक बेंच ने कहा कि यह विकल्प केवल सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और प्रत्यक्ष चुनावों के लिये है, न कि हस्तांतरण योग्य वोट के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा आयोजित राज्यसभा चुनावों के लिये।
  • कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा चुनाव में नोटा लागू करने से एक मत के औसत मूल्यांकन की धारणा नष्ट होगी और इससे भ्रष्टाचार और दल-बदल को भी बढ़ावा मिलेगा।
  • कोर्ट ने राज्यसभा चुनावों में होने वाले मतदान की ओर इशारा करते हुए कहा है कि यहाँ एक सचेतक होता है और मतदाता पार्टी के आदेश का पालन करने के लिये बाध्य होता है।
  • दरअसल, इस तरह के चुनाव में पार्टी अनुशासन अत्यधिक महत्त्व रखता है, क्योंकि पार्टियों का अस्तित्व इन्हीं के सहारे होता है।
  • ऐसा भी कहा जा सकता है कि संसदीय लोकतंत्र के लिये यह आवश्यक है।
  • कोर्ट ने कहा कि राज्यसभा चुनाव में नोटा लागू करने से न सिर्फ संविधान की दसवीं अनुसूची में दिये गए अनुशासन संबंधी नियमों का हनन होता है बल्कि दल-बदल कानून में अयोग्यता के प्रावधानों पर भी विपरीत असर पड़ता है।
  • र्ट ने यह भी कहा कि राज्यसभा चुनाव में नोटा लागू करना पहली नज़र में बुद्धिमत्तापूर्ण कदम प्रतीत होता है, लेकिन अगर इसकी पड़ताल की जाए तो यह आधारहीन लगता है।
  • ऐसे चुनाव में मतदाता की भूमिका को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है, इससे लोकतांत्रिक मूल्यों में कमी आती है।
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