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पंजाब में बढ़ती चावल की पैदावार

  • 08 Jun 2018
  • 5 min read

संदर्भ 

पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (पीएयू) में वर्ष 1962 से चावल अनुसंधान की शुरुआत के बाद से अब तक जबरदस्त उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं। फिर चाहे वह विभिन्न किस्मों के विकास की बात हो या उत्पादन के मानकीकरण की। इसका प्रभाव पंजाब में चावल के उत्पादन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यहाँ उत्पादन 1970-71 के 6.88 लाख टन से बढ़कर 2017-18 में 132.58 लाख टन हो चुका है। साथ ही प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादकता में भी बढ़ोतरी हुई है और यह इस दौरान 1,765 किलोग्राम से बढ़कर 4,325 किलोग्राम हो गई है। उत्पादन और उत्पादकता में यह उछाल शोधकर्त्ताओं और तकनीकी प्रेमी किसानों के अथक प्रयासों के कारण संभव हुआ है।

प्रमुख बिंदु

  • उभरती चुनौतियों और मिलर्स एवं उपभोक्ताओं की विविध आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये समय-समय पर प्रजनन रणनीतियों को समायोजित किया गया है।
  • पिछले समय में घटता जलस्तर एक बड़ी समस्या रही है। इस कारण ऐसी किस्मों के विकास की आवश्यकता महसूस हुई, जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती हो, साथ ही कम समय में पक कर तैयार हो जाएँ और उत्पादकता में भी कमी न आए।
  • पीएयू द्वारा हाल में जारी की गई चावल की किस्में 123-145 दिनों में परिपक्व हो जाती हैं। इन्हें किसानों द्वारा बड़े स्तर पर अपनाया जा रहा है, क्योंकि ये उच्च उत्पादकता वाली किस्में हैं और साथ ही पानी, उर्वरक, कीटनाशक और श्रमिक उपयोग में बचत करती हैं।
  • नई गैर-बासमती किस्में पीआर 121 (2013 में जारी), पीआर 122 (2013), पीआर 123 (2014), पीआर 124 (2015) और पीआर 126 (2016) पहले की पॉपुलर किस्मों, जैसे-पीआर 118 (158 दिन की परिपक्वता अवधि) और पूसा 44 (160 दिन) से एक से पाँच सप्ताह पहले परिपक्व हो जाती हैं। जबकि इनकी उत्पादकता लगभग समान होती है।
  • लेकिन गहनता से विश्लेषण करें तो पता चलता है कि नई किस्मों की उत्पादकता प्रति इकाई क्षेत्र, प्रति इकाई समय, प्रति इकाई लागत के मामले में पूर्व की किस्मों से काफी अधिक होती है।
  • साथ ही ये किस्में मार्कर-समर्थित पिरामिड बैक्टीरियल ब्लाइट रोग प्रतिरोधी जीन (एक्सए 4 / एक्सए 5 / एक्सए 13 / एक्सए 21) भी  धारण करती हैं। अतः ये पंजाब में पाई जाने वाली सभी दस ज्ञात बैक्टीरियल ब्लाइट पाथोटाइप्स के लिये प्रतिरोधी हैं।
  • 2012 खरीफ के मौसम के दौरान, पंजाब में कुल गैर-बासमती धान क्षेत्र का 39% लंबी अवधि वाली, देर से परिपक्व होने वाली पूसा 44 किस्म और 33% पीएयू (पीआर) किस्म के अंतर्गत कवर था। शेष 28% क्षेत्र में अन्य किस्मों और हाइब्रिड्स का उत्पादन किया जाता था।  
  • लेकिन, 2017 के सीजन में पीएयू / पीआर किस्मों का क्षेत्रफल बढ़कर 68.5% हो गया। खरीफ के 2018 के मौसम में इसके बढ़कर 75-80% तक होने की उम्मीद है। साथ ही, 2017 में पूसा 44 का प्रतिशत घटकर 17.7% हो गया तथा इसके आगामी खरीफ सीजन में 10% के नीचे गिरने का अनुमान व्यक्त किया गया है।
  • नई और उच्च उत्पादकता वाली अल्पावधिक किस्मों को बड़े पैमाने पर किसानों द्वारा अपनाए जाने के कारण खरीफ 2017 के सीजन में पंजाब ने धान की 6,488 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की उच्चतम उत्पादकता हासिल की। राज्य ने पिछले वर्ष 198.87 लाख टन धान का रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज किया।
  • चूँकि, नई अल्पावधिक किस्में पूर्व के किस्मों से अधिक दक्ष हैं और इनकी परिपक्वता अवधि भी 125-140 दिन है, अतः ये किसानों को अक्तूबर के प्रथम सप्ताह तक खेतों को आगामी गेहूँ की फसल बोने हेतु सक्षम बनाती हैं।
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