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IBC के तहत समाधान योजना में कोई संशोधन नहीं: SC

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  • 16 Sep 2021
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल, इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन विधेयक), कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया

मेन्स के लिये:

IBC के तहत समाधान योजना में संशोधन से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के निहितार्थ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने माना कि ‘नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल’ (NCLT) को प्रस्तुत इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड’ (IBC) के तहत लेनदारों की समिति (CoC) द्वारा अनुमोदित समाधान योजना को संशोधित नहीं किया जा सकता है।

इससे पहले जुलाई 2021 में सरकार ने ‘दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन विधेयक), 2021’ को लोकसभा में पेश किया था।

प्रमुख बिंदु

  • सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय:
    • कोई संशोधन नहीं: एक बार योजना को प्रस्तुत करने के बाद निर्णायक प्राधिकरण सफल समाधान आवेदक के आदेश पर लेनदारों की समिति द्वारा अनुमोदित संकल्प योजनाओं में संशोधन या वापसी की अनुमति नहीं दे सकता है।
    • समय पर पूरा करना: IBC के तहत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) को संहिता द्वारा निर्धारित 330 दिनों के भीतर पूरा किया जाना चाहिये।
      • इसने वित्त पर संसदीय स्थायी समिति की एक रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि एनसीएलटी (नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल) के समक्ष 71 फीसदी मामले 180 दिनों से अधिक समय से लंबित हैं।
      • एनसीएलटी और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) को इस निर्णय पर बने रहने के लिये कहा गया और सुझाव दिया कि आईबीसी संबंधी मामलों का फैसला करते समय दिवाला समाधान प्रक्रिया पर इस तरह की देरी के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए समयसीमा का सम्मान करना चाहिये।
      • न्यायिक देरी आईबीसी से पहले प्रभावी दिवाला शासन की विफलता के प्रमुख कारणों में से एक थी।
      • समयसीमा को केवल असाधारण परिस्थितियों में ही बढ़ाया जा सकता है, अन्यथा आगे की बातचीत या वापसी के लिये ओपन-एंडेड प्रक्रिया, कॉर्पोरेट देनदार, उसके लेनदारों और बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था पर हानिकारक प्रभाव डालेगी क्योंकि समय बीतने के साथ परिसमापन मूल्य कम हो जाता है। 
  • भारत में दिवाला समाधान प्रक्रिया:
    • पात्रता: दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) के तहत कंपनियों (प्राइवेट और पब्लिक लिमिटेड कंपनी दोनों) और लिमिटेड लायबिलिटी पार्टनरशिप (LLP) को डिफॉल्ट कॉर्पोरेट देनदार माना जा सकता है।
      • एक निगमित/कॉर्पोरेट देनदार कोई भी कॉर्पोरेट संगठन हो सकता है जो किसी भी व्यक्ति को ऋण देता है।
    • डिफाॅल्ट राशि: 1 करोड़ रुपए का न्यूनतम डिफाॅल्ट होने पर IBC को सूचित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण (NCLT) के समक्ष एक आवेदन दाखिल कर शुरू किया जा सकता है।
    • समाधान पहल: यह प्रक्रिया दो वर्गों के लेनदारों द्वारा शुरू की जा सकती है जिसमें वित्तीय लेनदार (Financial Creditors) और परिचालन लेनदार (Operational Creditors) शामिल होंगे।
      • लेनदार: एक लेनदार का अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति जिस पर कर्ज़/ऋण बकाया हो। इसमें एक वित्तीय लेनदार, एक परिचालन लेनदार आदि शामिल हैं।
      • वित्तीय लेनदार: सरल शब्दों में वित्तीय लेनदार वह संस्था है जो कॉर्पोरेट इकाई को ऋण, बॉण्ड आदि के रूप में धन प्रदान करती है। उदाहरण के लिये बैंक।
      • ऑपरेशनल क्रेडिटर्स: एक ऑपरेशनल क्रेडिटर वह इकाई होती है जो डिफॉल्ट कॉरपोरेट- सामान, सेवाएंँ, रोज़गार और सरकारी बकाया (केंद्र सरकार, राज्य या स्थानीय निकाय) इन चारों श्रेणियों में से कोई भी प्रदान करने का दावा प्रस्तुत करती हो।
    • अंतरिम समाधान पेशेवर की नियुक्ति: जैसे ही NCLT द्वारा मामले को स्वीकार किया जाता है, तो यह एक अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) की नियुक्ति के साथ कार्यवाही को आगे बढ़ता है जो चूककर्त्ता देनदार (Defaulting Debtor) का प्रबंधन संभालता है।
    • लेनदारों की समिति (CoC): IRP द्वारा केवल वित्तीय लेनदारों अर्थात् CoC से मिलकर एक समिति का गठन किया जाता है।
      • कम-से-कम 10% की कुल बकाया राशि वाले परिचालन लेनदारों को ही CoC की बैठक में आमंत्रित किया जाता है (ऑपरेशनल लेनदार CoC के सदस्य नहीं होते हैं)। परिचालन लेनदारों (Operational Creditors) के पास कोई मतदान शक्ति नहीं है।
    • कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया' (CIRP) : इसमें कंपनी को पुनर्जीवित करने के लिये आवश्यक कदम शामिल हैं, जैसे- ऑपरेशन के लिये नए फंड जुटाना, कंपनी को बेचने हेतु एक नए खरीदार की तलाश करना आदि।
      • लेनदारों की समिति (CoC) उस बकाया ऋण के भविष्य के संबंध में निर्णय लेती है। समाधान योजना को तभी लागू किया जा सकता है जब सीओसी में 66% लेनदारों द्वारा इसे अनुमोदित किया गया हो।
      • दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC संशोधन विधेयक), 2021 ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिये 1 करोड़ रुपए तक की चूक के साथ एक वैकल्पिक दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू की, जिसे प्री-पैक इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस (PIRP) कहा जाता है।
    • परिसमापन कार्यवाही : यदि कोई समाधान योजना प्रस्तुत नहीं की जाती है या लेनदारों की समिति (CoC) द्वारा अनुमोदित नहीं की जाती है, तो CIRP प्रक्रिया को विफल माना जाता है। ऐसी स्थिति में ट्रिब्यूनल के आदेश के अधीन परिसमापन कार्यवाही शुरू होती है।

आगे की राह

  • IBC के कार्यान्वयन में आने वाले कुछ मुद्दों को निम्नलिखित उपायों द्वारा सुलभ बनाया जा सकता है:
    • एनसीएलटी के न्यायाधीशों के लिये समय पर वार्तालाप का आयोजन और विभिन्न क्षेत्राधिकारों के चिकित्सकों के बीच परस्पर क्रिया को बढ़ाना।
    • राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण (NCLT) द्वारा ज़बरन वसूली, तरजीही, अवमूल्यन और धोखाधड़ी जैसे अपरिहार्य लेन-देन के संबंध में दायर आवेदनों पर उच्च प्राथमिकता के अनुसार कार्यवाही किया जाना।
    • NCLT अनेक बार स्थगन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं और समाधान प्रक्रिया की समयबद्धता सुनिश्चित करते हैं।
  • मुकदमेबाज़ी के दायरे को कम करने और कॉर्पोरेट दिवाला के तहत कंपनियों के समाधान में परिणामी देरी के लिये IBC के तहत सरकारी एवं वैधानिक देय राशि के बारे में विभिन्न सरकारी और वैधानिक प्राधिकरणों को संवेदनशील बनाने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये।

स्रोत : इंडियन एक्सप्रेस

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