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भारतीय अर्थव्यवस्था

कॉर्पोरेट ऋण के लिये व्यक्तिगत गारंटर का दायित्त्व

  • 24 May 2021
  • 6 min read

चर्चा में क्यों?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार द्वारा जारी वर्ष 2019 की उस अधिसूचना को बरकरार रखा है जो ऋणदाताओं को व्यक्तिगत गारंटर के विरुद्ध दिवाला कार्यवाही शुरू करने की अनुमति देता है।

  • यह अधिसूचना ‘कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया’ (CIRP) के समापन के बाद ऋणदाताओं को व्यक्तिगत गारंटर से अपने शेष ऋण की वसूली करने की अनुमति देती है।
  • CIRP एक रिकवरी तंत्र है, जो ‘इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड’ 2016 (IBC) के तहत लेनदारों को उपलब्ध कराया गया है।

प्रमुख बिंदु

पृष्ठभूमि

  • परिभाषा: व्यक्तिगत गारंटर का आशय एक ऐसे व्यक्ति या एक संस्था से है, जो किसी अन्य व्यक्ति के ऋण का भुगतान करने की गारंटी देता है या वादा करता है, यदि ऋण लेने वाला व्यक्ति ऋण चुकाने में असमर्थ रहता है।
  • केंद्र सरकार की वर्ष 2019 की अधिसूचना: इस अधिसूचना के माध्यम से दिवालिया कार्यवाही का सामना कर रही कंपनियों के ‘व्यक्तिगत गारंटर’ को ‘दिवाला और दिवालियापन संहिता’ (IBC) के दायरे में लाया गया।
    • ‘दिवाला और दिवालियापन संहिता’ (IBC) की धारा 1(3) केंद्र सरकार को कोड के विभिन्न प्रावधानों को अधिसूचित करने की अनुमति देती है, ताकि इसे समय के साथ सही ढंग से लागू किया जा सके।
    • इन नियमों और विनियमों में कॉर्पोरेट देनदारों को व्यक्तिगत गारंटर के विरुद्ध दिवाला समाधान और दिवालियापन की कार्यवाही शुरू करने, लेनदारों से दावों को आमंत्रित करने और ऐसे आवेदनों को वापस लेने आदि की प्रक्रिया निर्धारित की गई है।
  • नए नियम और विनियम लेनदारों को ‘राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण’ (NCLT) के समक्ष प्रमुख उधारकर्त्ता, यानी कंपनी और व्यक्तिगत गारंटर के विरुद्ध एक साथ कानूनी कार्यवाही की अनुमति देते हैं।
    • अब तक IBC कोड केवल कॉर्पोरेट देनदारों के दिवाला समाधान और परिसमापन को कवर करता था।
  • विपक्षी तर्क: केंद्र सरकार के पास कॉर्पोरेट देनदारों के व्यक्तिगत गारंटरों के लिये चुनिंदा IBC प्रावधान लाने की शक्ति नहीं है।
    • गारंटर को अलग करना समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय

  • स्वाभाविक संबंध: व्यक्तिगत गारंटर और उनके कॉर्पोरेट देनदारों के बीच एक ‘स्वाभाविक संबंध’ है।
    • IBC कोड की धारा 60 (2) के तहत कॉर्पोरेट देनदारों और उनके व्यक्तिगत गारंटर की दिवालियापन की कार्यवाही को एक सामान्य मंच यानी NCLT के समक्ष आयोजित करने को अनिवार्य बनाया गया है।
  • निर्णायक प्राधिकरण: यदि  कॉर्पोरेट देनदार, जिसके लिये गारंटी दी गई है, के संबंध में समानांतर समाधान प्रक्रिया लंबित है तो व्यक्तिगत गारंटर के लिये निर्णायक प्राधिकरण NCLT ही होगा। 
    • इस तरह यदि कॉर्पोरेट देनदारों और उनके व्यक्तिगत गारंटरों दोनों से संबंधित कार्यवाही एक ही स्थान पर होगी तो इससे ‘राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण’ (NCLT) के समक्ष स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

‘गारंटी’ की अवधारणा: 'गारंटी' की अवधारणा को भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 की धारा 126 से लिया गया है।

  • गारंटी संबंधी अनुबंध देनदार, लेनदार और गारंटर के बीच किया जाता है।
  • इस स्थिति में यदि देनदार, लेनदार को ऋण चुकाने में विफल रहता है, तो राशि का भुगतान करने का बोझ गारंटर पर आ जाता है।
  • यदि ‘गारंटर’ भी भुगतान करने में विफल रहता है तो ऐसी स्थिति में लेनदार के पास व्यक्तिगत गारंटर के विरुद्ध दिवाला कार्यवाही शुरू करने का अधिकार होता है।

संभावित लाभ

  • व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू करने से इस बात की संभावना अधिक बढ़ जाती है कि वे त्वरित निर्वहन के लिये लेनदार बैंक को ऋण के भुगतान की ‘व्यवस्था’ करेंगे।
  • लेनदार बैंक कटौती करने या ब्याज राशि को छोड़ने के लिये तैयार होंगे ताकि व्यक्तिगत गारंटर को ऋण का भुगतान करने में सक्षम बनाया जा सके।
  • इससे संपत्ति का मूल्य अधिकतम होगा और उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा।

नोट

  • दिवाला: इसका अर्थ एक ऐसी स्थिति से है, जहाँ एक व्यक्ति या कंपनी अपना बकाया ऋण  चुकाने में असमर्थ होती है।
  • दिवालियापन: यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें सक्षम क्षेत्राधिकार द्वारा किसी व्यक्ति या कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है और इसके समाधान के लिये तथा लेनदारों के अधिकारों की रक्षा के लिये उचित आदेश पारित किया जाता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि दिवालियापन ऋण के भुगतान में असमर्थता की कानूनी घोषणा है।

स्रोत: द हिंदू

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