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दिवालिया और शोधन अक्षमता कोड

  • 13 May 2019
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

दिवालिया और शोधन अक्षमता कोड (Insolvency and Bankruptcy Code-IBC) के तहत अलग-अलग कारणों से कई मामलों में ऋण वसूली में देरी आ रही है।

प्रमुख बिंदु

  • एस्सार स्टील इंडिया लिमिटेड सहित कई मामलों में ऋण समाधान में दिवालिया और शोधन अक्षमता कोड में निर्धारित समयसीमा से अधिक समय लग रहा है।
  • ज्ञातव्य है कि IBC के तहत आने वाले मामलों को 180 दिनों में पूरा करने के लिये कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रक्रिया (CIRP) होती है, जिसे 90 दिनों तक तक बढ़ाया जा सकता है।
  • यह समयसीमा यह सुनिश्चित करने के लिये निर्धारित की गई थी कि गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) की वसूली समयबद्ध तरीके से हो और बैंक 10 लाख करोड़ रुपए से अधिक की तनावग्रस्त परिसंपत्तियों की मात्रा को कम करने में सक्षम हों।

गैर निष्पादित परिसंपत्तियाँ (Non-Performing Assets)

वित्तीय संस्थानों से ऋण लेने वाला व्यक्ति जब 90 दिनों तक ब्याज या मूलधन का भुगतान करने में विफल रहता है तो उसको दिया गया ऋण ‘गैर निष्पादित परिसंपत्ति’ माना जाता है।
आँकड़ें

  • 31 मार्च, 2019 तक IBC के तहत रिज़ॉल्यूशन की प्रक्रिया से गुजर रहे कुल 1143 मामलों में से 548 मामलों में 180 दिन से अधिक समय लगा था।
  • जो यह दर्शाता है कि लगभग 48 प्रतिशत मामलों में 180 दिनों के भीतर ऋण समाधान की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी।
  • कुल 362 मामले या CIRPs के अंतर्गत चल रहे 31.67 प्रतिशत मामलों में समयसीमा IBC में निर्धारित 270 दिनों की सीमा को पार कर गई।

ऋण समाधान में देरी के कारण:

  • टेकओवर कंपनियों के लिये उपयुक्त बोलियों का अभाव
  • ऋणदाताओं के बीच मतभेद
  • मौजूदा प्रमोटरों और परिचालन लेनदारों द्वारा उत्पन्न कानूनी चुनौतियाँ

एस्सार स्टील इंडिया लिमिटेड सहित एनपीए के 12 बड़े मामले बैंकों ने विभिन्न नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) बेंचों को सौंपा।

इसके अंतर्गत अन्य पाँच बड़े मामलों में वसूली दर 17.11 प्रतिशत से लेकर 63.50 प्रतिशत रही है।

लगभग आधे मामलों में देरी के बावजूद IBC ने अब तक स्वीकृत 93 मामलों में वित्तीय लेनदारों को 43 प्रतिशत तक की वसूली दर पेशकश की है।

जिसमें वित्तीय लेनदारों ने 1,73,359 करोड़ रुपए के दावे में से 74,497 करोड़ रुपए की वसूली की।

कई मामलों में देरी के बावजूद ऋण वसूली हेतु मौजूदा न्यायाधिकरणों की प्रणाली और SARFAESI Act की तुलना में IBC प्रक्रिया के अंतर्गत अब तक बेहतर वसूली हुई है।

जिसमें वित्तीय लेनदारों ने 1,73,359 करोड़ के भर्ती दावों में से 74,497 करोड़ रुपए की वसूली की।

जाहिर है IBC ने लेनदार-देनदार संबंध को पूरी तरह से बदल दिया है। कई कंपनियाँ अपनी कंपनियों पर नियंत्रण खोने के डर से अपना बकाया चुकाने के लिये आगे आ रही हैं।

NCLT

  • 1 जून, 2016 को सरकार ने राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal-NCLT) का गठन किया। 
  • इनका गठन कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 408 के तहत किया गया। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने इनके लिये अधिसूचना जारी की थी
  • NCLT कंपनी अधिनियम 2013 या किसी अन्य कानून के माध्यम से उसे दी गईं शक्तियों के तहत कार्य करेगा
  • इसका अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होगा जो उच्च न्यायालय का जज हो या पाँच वर्षों तक इस पद पर रह चुका हो।

दिवालिया और शोधन अक्षमता कोड
Insolvency and Bankruptcy Code

  • वर्ष 2016 में पारित दिवालिया और शोधन अक्षमता कोड का उद्देश्य कॉर्पोरेट और फर्मों तथा व्यक्तियों के दिवालिया होने पर समाधान, परिसमापन और शोधन करने के लिये है।
  • विधेयक में भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड स्थापित करने का प्रावधान किया गया है ताकि पेशेवरों, एजेंसियों और सूचना सेवाओं के क्षेत्र में कंपनियों, संयुक्त फर्म और व्यक्तियों के दिवालिया होने से जुड़े विषयों का नियमन किया जा सके।

IBC की सामान्य कार्य प्रक्रिया

  • अगर कोई कंपनी कर्ज़ नहीं चुकाती तो IBC के तहत कर्ज़ वसूलने के लिये उस कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है।
  • इसके लिये NCLT की विशेष टीम कंपनी से बात करती है और कंपनी के मैनेजमेंट के तैयार होने पर कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया जाता है।
  • इसके बाद उसकी पूरी संपत्ति पर बैंक का कब्ज़ा हो जाता है और बैंक उस संपत्ति को किसी अन्य कंपनी को बेचकर अपना कर्ज़ वसूल सकता है।
  • IBC में बाज़ार आधारित और समयसीमा के तहत इन्सॉल्वेंसी समाधान प्रक्रिया का प्रावधान है।
  • IBC की धारा 29 में यह प्रावधान किया गया है कि कोई बाहरी व्यक्ति (थर्ड पार्टी) ही कंपनी को खरीद सकता है।

NPA समस्या के समाधान में सहायक IBC

  • IBC के अनुसार, किसी ऋणी के दिवालिया होने पर एक निश्चित प्रक्रिया पूरी करने के बाद उसकी परिसंपत्तियों को अधिकार में लिया जा सकता है।
  • IBC के हिसाब से, यदि 75 प्रतिशत कर्ज़दाता सहमत हों तो ऐसी किसी कंपनी पर 180 दिनों (90 दिन के अतिरिक्त रियायती काल के साथ) के भीतर कार्रवाई की जा सकती है, जो अपना कर्ज़ नहीं चुका पा रही।
  • IBC के लागू होने से ऋणों की वसूली में अनावश्यक देरी और उससे होने वाले नुकसानों से बचा जा सकेगा।
  • कर्ज़ न चुका पाने की स्थिति में कंपनी को अवसर दिया जाएगा कि वह एक निश्चित समयावधि में कर्ज़ चुकता कर दे या स्वयं को दिवालिया घोषित करे।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस

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