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प्री-पैक इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस

  • 10 Mar 2021
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में इनसॉल्वेंसी लॉ कमेटी (ILC) की एक उपसमिति द्वारा ‘दिवाला एवं शोधन अक्षमता कोड’ (Insolvency and Bankruptcy Code- IBC), 2016 के मूल ढाँचे के भीतर प्री-पैक ढाँचे (Pre-Pack Framework) की सिफारिश की गई है।

  • जून, 2020 में प्री-पैक इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन प्रोसेस की  सिफारिश करने हेतु सरकार द्वारा भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI)  के अध्यक्ष एम.एस. साहू की अध्यक्षता में इन्सॉल्वेंसी लॉ कमेटी (Insolvency Law Committee- ILC) की एक उपसमिति का गठन किया गया था। 

प्रमुख बिंदु:

प्री-पैक्स

  • प्री-पैक का आशय एक सार्वजनिक बोली प्रक्रिया के बजाय सुरक्षित लेनदारों और निवेशकों के बीच एक समझौते के माध्यम से तनावग्रस्त कंपनी के ऋण के समाधान से है
    • पिछले एक दशक में  ब्रिटेन और यूरोप में इन्सॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन (Insolvency Resolution) हेतु यह व्यवस्था काफी लोकप्रिय हुई है।  
  • भारत के मामले में ऐसी प्रणाली के तहत वित्तीय लेनदारों को संभावित निवेशकों से सहमत होना अनिवार्य होगा और समाधान योजना हेतु नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की मंज़ूरी लेनी भी आवश्यक होगी।

प्री-पैक्स की आवश्यकता: 

  • IBC के तहत कॉरपोरेट इनसॉल्वेंसी रिज़ाॅल्यूशन प्रक्रिया (CIRP) को लेकर लेनदारों द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दों में से एक संकटग्रस्त कंपनियों के समाधान की धीमी प्रगति भी है।
    • CIRP, संहिता के प्रावधानों के अनुसार, यह एक कॉरपोरेट देनदार के कॉर्पोरेट दिवालिया स्थिति के समाधान की प्रक्रिया है
    • IBC के अंतर्गत हितधारकों को इन्सॉल्वेंसी कार्यवाही शुरू करने के 330 दिनों के भीतर CIRP को पूरा करना आवश्यक होता है।

प्री-पैक्स की मुख्य विशेषताएंँ:

  • आमतौर पर प्री-पैक प्रक्रिया संचालन में हितधारकों की सहायता हेतु एक इन्सॉल्वेंसी प्रैक्टिशनर (Insolvency Practitioner) की ज़रूरत होती है।
  • सहमति प्रक्रिया की परिकल्पना - इसके तहत प्रक्रिया के औपचारिक भाग को लागू करने से पूर्व कॉर्पोरेट देनदार के तनाव को दूर करने हेतु कार्रवाई करने के लिये हितधारकों की अनुमति या उनकी मंज़ूरी की बात कही गई है। 
  • न्यायालय की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं: इसके तहत सदैव न्यायालय की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती है। जहाँ भी मंज़ूरी की आवश्यकता होती है,  अक्सर वहाँ न्यायालय पार्टियों के व्यावसायिक ज्ञान द्वारा निर्देशित होते हैं
    • प्री-पैक प्रक्रिया का परिणाम, जहाँ न्यायालय द्वारा अनुमोदित किया गया है, सभी हितधारकों के लिये बाध्यकारी होता है। 

प्री-पैक प्रस्ताव का महत्त्व

  • त्वरित समाधान: प्री-पैक प्रक्रिया के तहत त्वरित गति से समाधान प्रस्तुत किया जाता है, यह तनावपूर्ण स्थिति में कंपनी के मूल्यों के संरक्षण के साथ-साथ उनमें में वृद्धि करती है और समाधान की संभावना को बढ़ाती है।
  • व्यवसाय में व्यवधानों को कम करना: चूँकि प्री-पैक प्रक्रिया के तहत कॉर्पोरेट देनदार कंपनी के मौजूदा प्रबंधन के साथ काम करना जारी रखते हैं, इसलिये व्यवसाय में किसी भी प्रकार के व्यवधान की संभावना कम हो जाती है, क्योंकि इस प्रक्रिया के तहत कंपनी का प्रबंधन अंतरिम समाधान पेशेवर को हस्तांतरित नहीं किया जाता है और कंपनी के कर्मचारी, आपूर्तिकर्त्ता, ग्राहक एवं निवेशक कंपनी के साथ बने रहते हैं
  • सामूहिक समाधान: यह देखते हुए कि संकटग्रस्त कंपनियों का सामूहिक समाधान, कंपनियों के व्यक्तिगत समाधान की तुलना में अधिक प्रभावी हो सकता है, कई न्यायालय इसके लिये एक सक्षम ढाँचा उपलब्ध कराने पर विचार कर रहे हैं।
  • ऐसे में इससे संबंधित एक सक्षम तंत्र की अनुपस्थिति में प्री-पैक प्रक्रिया बहुत मददगार साबित हो सकती है
  • न्यायालयों के भार में कमी: सामान्यत: न्यायालयों की ढांँचागत क्षमता सीमित होती है और वे अपनी सीमाओं के भीतर अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकते हैं। 
    • अपनी अनौपचारिक और सहमतिपूर्ण प्रकृति के कारण एक प्री-पैक प्रक्रिया में  न्यायालय के भार को कम करने की क्षमता होती है। इसे प्रक्रिया के अनौपचारिक भाग के दौरान न्यायालय की भागीदारी की आवश्यकता नहीं होती है, वहीं औपचारिक प्रक्रिया के दौरान न्यायालयों की न्यूनतम भूमिका की आवश्यकता होती है।
    • न्यायालयों के बाहर समाधान प्रक्रिया के लिये कार्यात्मक इकाइयों का होना आवश्यक है, ताकि एनसीएलटी अंतिम न्यायालय के रूप में कार्य कर सके तथा दिवालियापन से संबंधित ऐसे मामलों का समाधान कर सके जिनका कोई समझौता संभव नहीं है।

प्री-पैक प्रक्रिया की कमियांँ

  • पारदर्शिता का अभाव
    • इस प्रक्रिया की एक प्रमुख कमज़ोरी इसका CIRP की तुलना में कम पारदर्शी होना है, क्योंकि इसके तहत वित्तीय लेनदार पारदर्शी बोली प्रकिया का प्रयोग किये बिना संभावित निवेशक के साथ निजी स्तर पर समझौता कर लेते हैं। 
    • इससे परिचालन देनदारों जैसे हितधारक अनुचित उपचार का मुद्दा उठा सकते हैं
    • अपर्याप्त विपणन: अनुसंधान से पता चलता है कि जहांँ भी प्री-पैक प्रक्रिया में पर्याप्त विपणन नहीं होता है, वहाँ लेनदारों को कम राशि प्राप्त होती है।
    • नई कंपनी की भावी व्यवहार्यता पर कोई विचार नहीं किया जाता है: इन्सॉल्वेंसी प्रैक्टिशनर के लिये प्री-पैक प्रक्रिया के तहत बिक्री से उभरने वाले नए व्यवसाय के भविष्य की व्यवहार्यता को देखने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं होती है।
      • इन्सॉल्वेंसी प्रैक्टिशनर का एकमात्र कानूनी दायित्व पुराने  व्यवसाय की लेनदारी से संबंधित होता है।

आगे की राह: 

  • IBC की वर्तमान कार्यप्रणाली के तहत इन्सॉल्वेंसी प्रोफेशनल/दिवाला पेशेवर समय के साथ आवश्यक विशेषज्ञता विकसित कर रहे हैं। जिस प्रकार ब्रिटेन की शासन व्यवस्था के तहत कानून समय-समय पर प्रख्यापित होने के बजाय समय के साथ विकसित हुआ है, भारत में प्री-पैक इनसॉल्वेंसी के आवेदन हेतु उच्च स्तर पर इनसॉल्वेंसी विशेषज्ञों के अनुभव की आवश्यकता होगी क्योंकि इस तरह के रिज़ाॅल्यूशन प्रक्रियाओं/अभ्यासों पर उनका अत्यधिक नियंत्रण होता है।
  • हालांँकि न्यायालय से बाहर विवादों के समाधान में वृद्धि के साथ प्री-पैक इन्सॉल्वेंसी CIRP कार्यवाही का अगला विकल्प हो सकता है

स्रोत: पी.आई.बी

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