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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत में असंगठित अर्थव्यवस्था

  • 30 May 2022
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

ई-श्रम पोर्टल, असंगठित क्षेत्र, असंगठित अर्थव्यवस्था 

मेन्स के लिये :

भारत में असंगठित अर्थव्यवस्था की स्थिति, असंगठित अर्थव्यवस्था और संबंधित पहल के साथ चुनौतियांँ 

चर्चा में क्यों? 

नवीनतम आंँकड़ों के अनुसार, ई-श्रम पोर्टल पर असंगठित क्षेत्र के 27.69 करोड़ श्रमिक पंजीकृत हैं। 

ई-श्रम पोर्टल:  

  • परिचय: 
    • वर्ष 2021 में शुरू किये गए ई-श्रम पोर्टल का उद्देश्य देश में असंगठित श्रमिकों (NDUW) के व्यापक राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण करना है। 
  • लक्ष्य:  
    • उद्देश्य: देश भर में कुल 38 करोड़ असंगठित श्रमिकों जैसे- निर्माण मज़दूरों, प्रवासी कार्यबल, रेहड़ी-पटरी वालों और घरेलू कामगारों को पंजीकृत करना। 
      • इसके तहत श्रमिकों को एक ‘ई-श्रम कार्ड’ जारी किया जाएगा, जिसमें 12 अंकों का एक विशिष्ट नंबर शामिल होगा। 
      • यदि कोई कर्मचारी ‘ई-श्रम’ पोर्टल पर पंजीकृत है और दुर्घटना का शिकार होता है, तो मृत्यु या स्थायी विकलांगता की स्थिति में 2 लाख रुपए तथा आंशिक विकलांगता की स्थिति में 1 लाख रुपए पाने का पात्र होगा। 
      • पोर्टल का उद्देश्य देश में असंगठित कामगारों के अंतिम पंक्ति तक कल्याणकारी योजनाओं के वितरण को बढ़ावा देना है। 
  • पृष्ठभूमि:  
  • कार्यान्वयन:  
    • देश भर में असंगठित कामगारों का पंजीकरण संबंधित राज्य/केंद्रशासित प्रदेश की सरकारों द्वारा किया जाएगा। 

भारत में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति: 

  • सामाजिक श्रेणी विश्लेषण: 
    • ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत 27.69 करोड़ असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों में से 94% से अधिक की मासिक आय 10,000 रुपए या उससे कम है और नामांकित कार्यबल का 74% से अधिक अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से संबंधित है।  
      • सामान्य श्रेणी के श्रमिकों का अनुपात 25.56% है। 
    • आंँकड़ों से पता चला है कि पंजीकृत असंगठित श्रमिकों में से 94.11% की मासिक आय 10,000 रुपए या उससे कम है, जबकि 4.36% की मासिक आय 10,001 रुपए और 15,000 रुपए के बीच है। 
  • आयु-वार विश्लेषण: 
    • पोर्टल पर पंजीकृत श्रमिकों में से 61.72% 18 वर्ष से 40 वर्ष की आयु के हैं, जबकि 22.12% 40 वर्ष से 50 वर्ष की आयु के हैं। 
    • 50 वर्ष से अधिक आयु के पंजीकृत श्रमिकों का अनुपात 13.23% है, जबकि 2.93% श्रमिक 16 से 18 वर्ष की आयु के बीच हैं। 
  • लिंग-वार विश्लेषण: 
    • पंजीकृत श्रमिकों में 52.81% महिलाएंँ हैं और 47.19% पुरुष हैं। 
  • पंजीकरण के मामले में शीर्ष 5 राज्य: 
    • उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और ओडिशा। 
  • व्यवसाय-वार: 
    • कृषि क्षेत्र से संबंधित 52.11% नामांकन के साथ कृषि शीर्ष पर है, इसके बाद घरेलू श्रमिकों ने 9.93% और निर्माण श्रमिकों ने 9.13% पर नामांकन किया है। 

भारत की असंगठित अर्थव्यवस्था की स्थिति: 

  • असंगठित अर्थव्यवस्था उन उद्यमों का प्रतिनिधित्व करती है जो पंजीकृत नहीं हैं, जहांँ नियोक्ता कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान नहीं करते हैं। 
    • भारत सहित कई विकासशील देशों में असंगठित क्षेत्र में धीमी गति से गिरावट आई है, जो शहरी गंदगी, गरीबी और बेरोज़गारी में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। 
    • पिछले दो दशकों में तेज़ी से आर्थिक विकास देखने के बावज़ूद भारत में 90% श्रमिक असंगठित क्षेत्र में  कार्यरत हैं, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग आधा उत्पादन करते हैं। 
    • आधिकारिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) के आंँकड़ों से पता चलता है कि 75% असंगठित श्रमिक स्व-नियोजित और आकस्मिक वेतनभोगी कर्मचारी हैं जिनकी औसत आय नियमित वेतनभोगी श्रमिकों की तुलना में कम है। 
      • भारत की आधिकारिक परिभाषा के साथ आईएलओ की व्यापक रूप से सहमत परिभाषा (संगठित नौकरियों के रूप में कम-से-कम एक सामाजिक सुरक्षा लाभ प्रदान करने वाले - जैसे ईपीएफ) को मिलाकर भारत में संगठित श्रमिकों की हिस्सेदारी केवल 9.7% (47.5 मिलियन) थी। 

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों से संबंधित चुनौतियाँ: 

  • श्रम संबंधी चुनौतियाँ: हालाँकि कार्यबल की बड़ी संख्या ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत है, असंगठित क्षेत्र में नियोजित शहरी कार्यबल एक बड़ी चुनौती है। 
    • दीर्घावधिक कार्य घंटे, कम वेतन और कठिन कार्य परिस्थिति। 
    • निम्न रोज़गार सुरक्षा, नौकरी छोड़ने की उच्च दर और निम्न रोज़गार संतुष्टि। 
    • अपर्याप्त सामाजिक सुरक्षा विनियमन। 
    • अधिकारों का प्रयोग करने में कठिनाई। 
    • बाल श्रम एवं बलात श्रम और विभिन्न कारकों के आधार पर भेदभाव। 
    • असंरक्षित, कम वेतन वाली और कम महत्त्व प्राप्त नौकरियाँ। 
  • उत्पादकता: असंगठित क्षेत्र में मूल रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSMEs) और घरेलू व्यवसाय शामिल हैं जो रिलायंस जैसी फर्मों जितने बड़े नहीं हैं। वे इन अर्थव्यवस्थाओं का लाभ उठाने में असमर्थ हैं। 
  • कर राजस्व बढ़ाने में असमर्थता: चूँकि असंगठित अर्थव्यवस्था के कार्यकलाप सीधे विनियमित नहीं होते हैं, वे आमतौर पर नियामक ढाँचे से अपनी आय और व्यय छुपाकर करों के भुगतान से बचने की प्रवृत्ति रखते हैं। यह सरकार के लिये एक चुनौती है क्योंकि अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कर के दायरे से बाहर रह जाता है। 
  • नियंत्रण और निगरानी की कमी: असंगठित क्षेत्र सरकार की निगरानी से बचा रहता है। 
    • इसके अलावा अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति का प्रतिनिधित्व करने वाले आधिकारिक आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जिससे सरकार, विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के लिये और सामान्य रूप से पूरी अर्थव्यवस्था के संबंध में नीतियों का निर्माण करना कठिन हो जाता है। 
  • निम्न-गुणवत्ता वाले उत्पाद: यद्यपि असंगठित क्षेत्र भारतीय आबादी के 75% से अधिक को रोज़गार देता है, लेकिन यह मूल्यवर्द्धन प्रति कर्मचारी बहुत कम है। इसका तात्पर्य है कि मानव संसाधन का एक बड़े हिस्से का कम उपयोग किया जा रहा है। 

संबंधित पहल: 

आगे की राह 

  • सरल नियामक ढाँचा: असंगठित क्षेत्र का संगठित क्षेत्र में संक्रमण तभी हो सकता है जब असंगठित क्षेत्र को नियामक अनुपालन के बोझ से राहत दी जाए और उसे आधुनिक, डिजिटल संगठित प्रणाली के साथ समायोजित करने के लिये पर्याप्त समय प्रदान किया जाए। 
  • संगठित क्षेत्र में लाने हेतु वित्तीय सहायता: छोटे पैमाने के उद्योगों को अपने दम पर खड़े होने में मदद करने के लिये वित्तीय सहायता देना उन्हें संगठित क्षेत्र में लाने के लिये एक महत्त्वपूर्ण कदम है। 

स्रोत: बिज़नेस स्टैंडर्ड  

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