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भारतीय अर्थव्यवस्था

आत्मनिर्भरता और इसकी प्रासंगिकता

  • 16 Mar 2022
  • 14 min read

यह एडिटोरियल 13/03/2022 को ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित “The world is in flux. Self-reliance is vital” लेख पर आधारित है। यह हाल के घटनाक्रमों, जहाँ एक देश को सभी खतरों से अपनी रक्षा करने की आवश्यकता होती है, के संदर्भ में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ की प्रासंगिकता के संबंध में चर्चा करता है।

संदर्भ

पिछले 24 माह में तीन समसामयिक घटनाक्रमों ने विश्व के साथ भारत की संलग्नता और इसकी सुरक्षा चिंताओं को चुनौती दी है।

  • पहला घटनाक्रम चीन द्वारा कल्पित इतिहास के मानचित्र से एक सीमा-रेखा चुनने और हिमालय क्षेत्र में वर्तमान राजनीतिक समीकरण को बदलने के लिये 100,000 से अधिक सैनिकों को भेजने के निर्णय के रूप में प्रकट हुआ। यह शक्ति प्रदर्शन का ऐसा आवेगपूर्ण और विकृत प्रयास था जिसके परिणामस्वरूप भारतीय तथा चीनी सैनिकों के बीच खूनी संघर्ष की स्थिति बनी और इनके बीच गतिरोध आज भी जारी है।
  • दूसरा घटनाक्रम अफगानिस्तान में अमेरिका के नए कदम के रूप में प्रकट हुआ जहाँ अगस्त 2021 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने आतंकियों के एक धड़े के साथ एक अनैतिक और त्रासद समझौते को अंतिम रूप दिया और रातों-रात अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लिया गया। इस क्रम में अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये आतंक के विरुद्ध तथाकथित ‘लिबरल वार’ छेड़ते हुए महिलाओं के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विभिन्न मूल्यों जिनकी रक्षा और स्थापना की दलील दी गई थी, को त्याग दिया गया।
  • अब तीसरा घटनाक्रम रूस द्वारा एक संप्रभु देश यूक्रेन पर आक्रमण के रूप में सामने आया है जो उन भौगोलिक क्षेत्रों पर रूस के प्रभाव को बनाए रखने की एकमात्र इच्छा से संचालित एक राजनीतिक परमादेश लागू करने के लिये है जहाँ रूसी राजनीति और योजनाओं के विरुद्ध असहमति बढ़ती ही जा रही है। यद्यपि उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (North Atlantic Treaty Organization- NATO) के विस्तार के उद्देश्य और तरीके को लेकर रूस की आशंकाओं को खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन बल का प्रयोग और एक देश की संप्रभुता का उल्लंघन करना उसकी असंतुष्टि की अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
    • यूक्रेन पर आक्रमण ने भारत को इस कठिन स्थिति में डाल दिया जहाँ उसे सही और स्वयं के हित में सही के बीच के दो विकल्पों में से एक का चयन करना था।

इन तीन अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों ने भारत के लिये आत्मनिर्भरता (self-reliance) के विचार को पुनर्जीवित कर दिया है और एक बार फिर इसे चर्चाओं/मंथन के केंद्रीय मंच पर ला दिया है।

आत्मनिर्भरता में निहित अवसर  

  • आत्मनिर्भर भारत अभियान नए भारत का विज़न है। वर्ष 2020 में प्रधानमंत्री ने राष्ट्र से आत्मनिर्भरता के आह्वान के साथ आत्मनिर्भर भारत अभियान की शुरुआत की और 20 लाख करोड़ रुपए (भारत के सकल घरेलू उत्पाद के 10% के बराबर) के विशेष आर्थिक एवं व्यापक पैकेज की घोषणा की। 
  • इसका उद्देश्य देश तथा इसके नागरिकों को हर तरह से स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर बनाना है। इस क्रम में अर्थव्यवस्था, आधारभूत संरचना, प्रणाली, जीवंत जनसांख्यिकी और मांग को आत्मनिर्भर भारत के पाँच स्तंभ के रूप में रेखांकित किया गया।
  • इसका लक्ष्य वैश्विक बाज़ार हिस्सेदारी हासिल करने के लिये सुरक्षा अनुपालन में सुधार एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के साथ प्रतिस्थापन पर ध्यान केंद्रित करते हुए आयात पर निर्भरता को कम करना है।
  • आत्मनिर्भरता का यह विचार किसी बहिष्करण या अलगाववादी रणनीतियों का प्रतीक नहीं है बल्कि इसमें पूरी दुनिया के लिये मदद की भावना शामिल है।
  • यह अभियान ‘स्थानीय’ उत्पादों को बढ़ावा देने के महत्त्व पर केंद्रित है।
  • आत्मनिर्भर भारत अभियान के साथ-साथ सरकार ने कृषि के लिये आपूर्ति शृंखला सुधार, तर्कसंगत कर प्रणाली, सरल एवं स्पष्ट कानून, सक्षम मानव संसाधन और सुदृढ़ वित्तीय प्रणाली जैसे कई अन्य साहसिक सुधार किये हैं जो द्रुत गति से आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में मदद करेंगे।

Atmanirbhar-Bharat

आत्मनिर्भर भारत से संबद्ध चिंताएँ 

  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और निवेश में कटौती: कार्यक्रम के कुछ पहलुओं, जैसे टैरिफ में वृद्धि, आयात पर गैर-टैरिफ प्रतिबंध और आयात प्रतिस्थापन में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश को कम करने की क्षमता है।
    • गैर-टैरिफ बाधा एक व्यापार प्रतिबंध (जैसे कोटा, प्रतिबंध या मंज़ूरी) है जिसका उपयोग देशों द्वारा अपने राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिये किया जाता है।
    • विभिन्न देश मानक टैरिफ बाधाओं (जैसे सीमा शुल्क) के स्थान पर या उनके संयोजन में गैर-टैरिफ बाधाओं का उपयोग कर सकते हैं जो निश्चित रूप से भारतीय हितों के प्रतिकूल होगा।
  • नीतिगत मुद्दे: भारत की बौद्धिक संपदा प्रवर्तन व्यवस्था में आने वाली कठिनाइयाँ, फार्मा क्षेत्र के नियमों में अंतराल, औषध मूल्य नियंत्रण और डेटा स्थानीयकरण व  शासन से संबंधित मानदंड।
    • डेटा स्थानीयकरण (यानी देश की सीमाओं के भीतर ही डेटा को संग्रहीत करना) वैश्विक आपूर्ति शृंखला तक पहुँच को सीमित कर स्थानीय कंपनियों द्वारा वैश्विक बाज़ार में प्रतिस्पर्द्धा कर सकने की क्षमता को अवरुद्ध कर सकता है।
    • इस अलगाव के परिणामस्वरूप कम निवेश और पूंजी एवं ग्राहकों तक कम पहुँच की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।
  • अंतरिक्ष क्षेत्र में: अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी निवेशकों के लिये खोलना एक महत्त्वपूर्ण कदम था, लेकिन इसकी प्रक्रियाओं से संबंधित विभिन्न पहलुओं के बारे में 'स्पष्टता की कमी' रही है।
  • रक्षा क्षेत्र में: रक्षा उपकरणों की 101 वस्तुओं पर आयात प्रतिबंध को वर्ष 2024 तक चार साल की अवधि में लागू करने की योजना है।

आगे की राह

  • भविष्य के लिये एक रणनीति का निर्माण करना: आत्मनिर्भरता के मार्ग पर सफल होने के लिये क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखला और स्थान निर्णयन पर विचार करने वाले एक दीर्घकालिक दृष्टिकोण को अपनाना आवश्यक हो गया है।
  • मुक्त एवं निष्पक्ष व्यापार के लिये भारत का अधिकाधिक खुला होना: अंतर्राष्ट्रीय व्यवसायों को भारत में निवेश और भारत में विनिर्माण करने हेतु दबाव बनाने के लिये एक उपकरण के रूप में टैरिफ का उपयोग करने के बजाय अपनी शक्ति व क्षमता के आधार पर निवेशकों को आकर्षित करना चाहिये।
  • नवोन्मेषकों के विकास और समर्थन पर ध्यान देना: STEM’, डिजिटल, रचनात्मकता एवं क्रिटिकल थिंकिंग कौशल पर ध्यान देने की आवश्यकता है जो ऐसे नेतृत्वकर्त्ताओं और कार्यकर्त्ताओं को तैयार करेंगे जो नवाचार कर सकते हैं तथा समस्याओं को हल कर सकते हैं।
    • भारत को एक नवोन्मेषक-अनुकूल बौद्धिक संपदा नीति एवं प्रवर्तन व्यवस्था भी विकसित करनी चाहिये।
  • डिजिटल और डेटा: वैश्विक व्यापार में डिजिटल और डेटा सेवाओं के महत्त्व में लगातार वृद्धि के साथ भारत के समक्ष अन्य प्रमुख लोकतांत्रिक बाज़ारों के साथ पूरी तरह से एकीकृत होने का अवसर मौजूद है।
  • संवहनीयता को भारत की व्यापार एवं निवेश रणनीति के केंद्र में रखना: व्यापार व्यवस्था गरीबों का समर्थन करने और पर्यावरण की रक्षा करने में मदद कर सकती है यदि उन्हें उपयुक्त तरीके से लागू किया जाए।
    • विश्व के विभिन्न देश और व्यापार समूह इस तथ्य से अवगत हैं और इसलिये अपने व्यापार समझौतों एवं रणनीतियों में संवहनीयता और मानवाधिकारों को लगातार एकीकृत कर रहे हैं।
  • मांग में वृद्धि करना: लॉकडाउन से बाहर निकलते देश के लिये आर्थिक पैकेज हेतु अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ाने वाले प्रोत्साहनों की आवश्यकता है।
    • ग्रीनफील्ड अवसंरचना पर व्यय करना इसका सर्वोत्कृष्ट तरीका होगा।
    • अवसंरचना व्यय विशिष्ट रूप से ऐसी संरचनाओं का सृजन करता है जो उत्पादकता में वृद्धि करती हैं और लॉकडाउन से सर्वाधिक प्रभावित हुई आबादी के उस हिस्से के व्यय कर सकने की शक्ति का विस्तार करती है जो दैनिक वेतनभोगी मज़दूर के रूप में कार्य कर रहे हैं।
  • वित्त को संघटित करना: प्रोत्साहन पैकेज के वित्तपोषण के लिये वर्तमान में विदेशी मुद्रा भंडार जो सर्वकालिक रूप से उच्च स्तर पर बना हुआ है, का रणनीतिक उपयोग इसकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये किया जा सकता है।
    • निजीकरण, कराधान, ऋण और अंतर्राष्ट्रीय सहायता के रूप में अतिरिक्त वित्त जुटाया जा सकता है।
  • समग्र सुधार: कोई भी प्रोत्साहन पैकेज तब तक ‘ट्रिकल-डाउन इफेक्ट’ को प्रतिबिंबित करने में विफल रहेगा जब तक कि यह विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों द्वारा समर्थित नहीं होता है।
    • इस प्रकार, आत्मनिर्भरता का विचार समग्र सुधारों के अधूरे एजेंडे को भी शामिल करता है जिसमें सिविल सेवाओं, शिक्षा , कौशल और श्रम आदि में सुधार किया जाना शामिल हो सकता है।

निष्कर्ष

  • आत्मनिर्भरता के लिये सरकार के आह्वान ने एक नया महत्त्व हासिल कर लिया है और विश्व जनसंख्या का लगभग छठा हिस्सा रखने वाले भारत जैसे देश के लिये आत्मनिर्भरता की प्राप्ति हेतु वस्तुतः सूक्ष्म वैश्विक अंतर्संबंधों तथा संभवतः और अधिक सघन वैश्विक नेटवर्क की आवश्यकता होगी।
  • विश्वसनीय कनेक्टिविटी, सामग्री व घटकों के विविधिकृत स्रोत और लचीली वित्तीय एवं व्यापारिक व्यवस्था अब महज चर्चा के शब्द नहीं हैं, बल्कि एक रणनीतिक अनिवार्यता है जिसमें भारत के व्यापारिक समुदाय, विधि-निर्माता तथा सभी हितधारकों को शामिल करते हुए सभी की आम सहमति की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न: आत्मनिर्भरता के लिये सरकार के आह्वान ने हाल के वर्षों में एक नया मुकाम हासिल कर लिया है। हाल के अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों के आलोक में इस कथन की चर्चा कीजिये।

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