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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत का विमानन क्षेत्र

  • 12 Feb 2026
  • 76 min read

प्रिलिम्स के लिये: नागर विमानन महानिदेशालय, UDAN योजना, विमानन टरबाइन ईंधन

मेन्स के लिये: भारत के विमानन क्षेत्र की संरचनात्मक चुनौतियाँ, विनियामक क्षमता एवं सुरक्षा पर्यवेक्षण, अवसंरचना तथा कौशल संबंधी अवरोध।

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2025 में भारत के नागर विमानन क्षेत्र ने बार-बार परिचालन व्यवधानों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का अनुभव किया है, साथ ही प्रमुख विमानन कंपनियों की लाभप्रदता में गिरावट दर्ज की गई है। क्षेत्रीय स्तर पर नए संचालकों के बाज़ार में प्रवेश के साथ ही इस क्षेत्र की संरचनात्मक कमज़ोरियों को लेकर प्रश्न उठने लगे हैं।

सारांश

  • भारत का विमानन क्षेत्र आकार में बड़ा है, किंतु संरचनात्मक रूप से अतिविस्तृत है, जहाँ मांग में वृद्धि संस्थागत क्षमता से आगे निकल रही है।
  • लगभग 90 प्रतिशत बाज़ार पर नियंत्रण रखने वाली द्वयाधिकार संरचना प्रणालीगत जोखिम को बढ़ाती है तथा क्षेत्र की सहनशीलता क्षमता को सीमित करती है।
  • पायलटों की कमी, विनियामक अंतराल तथा ईंधन मूल्यों की अस्थिरता इस क्षेत्र की प्रमुख संरचनात्मक बाधाएँ हैं।
  • समन्वित सुधारों के अभाव में तीव्र विस्तार विकास को आवर्ती परिचालन संकटों में परिवर्तित कर सकता है।

भारत के विमानन क्षेत्र की वर्तमान स्थिति क्या है?

  • वैश्विक रैंकिंग: भारत संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद विश्व का तृतीय सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है। यह वैश्विक हवाई यातायात का लगभग 4.2 प्रतिशत हिस्सा वहन करता है। भारतीय विमान बेड़ा विश्व के कुल विमान बेड़े का लगभग 2.4 प्रतिशत है। एयरलाइनों के विस्तार तथा नए विमानों के आदेशों के कारण बेड़े के आकार में तीव्र वृद्धि हुई है।
  • यात्री यातायात में वृद्धि: वर्ष 2030 तक घरेलू यात्री मांग लगभग 715 मिलियन तक पहुँचने की अपेक्षा है। वर्ष 2040 तक यात्री यातायात में लगभग छह गुना वृद्धि होकर इसके लगभग 1.1 बिलियन तक पहुँचने का अनुमान है।
  • हवाई अड्डा अवसंरचना का विस्तार: परिचालित हवाई अड्डों की संख्या वर्ष 2014 में 74 से बढ़कर 2025 में 163 हो गई है। वर्ष 2047 तक भारत का लक्ष्य 350–400 हवाई अड्डों तक विस्तार करने का है, जिसमें ग्रीनफील्ड परियोजनाओं तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी आधारित विकास पर विशेष बल दिया जा रहा है।
  • आर्थिक योगदान: वर्ष 2025 तक विमानन क्षेत्र 7.7 मिलियन से अधिक रोज़गार का समर्थन करता है तथा भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 1.5 प्रतिशत का योगदान देता है।
  • भारतीय नागर विमानन विनियमन:
    • यह विमानन विनिर्माण में मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत को प्रोत्साहित करता है, लाइसेंसिंग तथा विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाता है, एक संरचित अपील तंत्र प्रदान करता है तथा भारत के समग्र विमानन शासन ढाँचे का आधुनिकीकरण करता है।
    • एयर कॉर्पोरेशन अधिनियम, 1953: इस अधिनियम के माध्यम से नौ विमानन कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया गया। मध्य 1990 के दशक तक सरकारी स्वामित्व वाली विमानन कंपनियों का इस क्षेत्र पर प्रभुत्व रहा।
    • ओपन स्काई पॉलिसी (1990–94): इस नीति के तहत निजी एयर टैक्सी संचालकों को अनुमति प्रदान की गई। इससे इंडियन एयरलाइंस (IA) और एयर इंडिया (AI) के एकाधिकार का अंत हुआ।
    • भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024: यह अधिनियम औपनिवेशिक कालीन विमान अधिनियम, 1934 का स्थान लेता है तथा भारत के विमानन कानूनों को अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन संगठन के मानकों और शिकागो अभिसमय के अनुरूप बनाता है।

Key_Government_Initiatives_for_the_Aviation_Sector_in_India

भारत के विमानन क्षेत्र में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  • प्रशिक्षण एवं कौशल संबंधी अवरोध: सिम्युलेटरों की कमी, प्रशिक्षकों की सीमित उपलब्धता, उच्च प्रशिक्षण लागत तथा टाइप-रेटिंग संबंधी प्रतिबंधों के कारण पायलट आपूर्ति अपेक्षाकृत अल्प-लोचशील बनी हुई है। वर्ष 2025 में लगभग 236 अस्थायी विदेशी पायलट अनुमतियाँ जारी की गईं, जो उच्च लागत वाले अस्थायी (Stopgap) उपायों पर निर्भरता को दर्शाती हैं।
  • उच्च बाज़ार एकाग्रता एवं प्रणालीगत जोखिम: इंडिगो (63-65%) और एयर इंडिया समूह (27-28%) मिलकर घरेलू यात्री यातायात का लगभग 90% नियंत्रित करते हैं। इंडिगो लगभग 60% मार्गों पर एकमात्र परिचालक (Sole Carrier) के रूप में कार्य करता है, जिससे किसी भी व्यवधान की स्थिति में यात्रियों के पुनर्वितरण के स्थान पर सीधे संपर्क-विच्छेद (Connectivity Loss) की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • न्यून आघात-अवशोषण क्षमता: वैश्विक स्तर पर एयरलाइंस परिचालनगत आघातों (ऑपरेशनल शॉक) से निपटने हेतु प्रायः 20-25% अतिरिक्त चालक दल (Spare Crew) क्षमता बनाए रखती हैं, जबकि भारतीय विमानन कंपनियाँ लगभग पूर्ण उपयोग (Near-total Utilisation) पर संचालित होती हैं। फलस्वरूप, मामूली व्यवधान भी क्रमिक रूप से बढ़ते हुए संपूर्ण नेटवर्क में विफलताओं का कारण बन सकते हैं।
  • अप्रभावी नियामक क्षमता: नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) के स्वीकृत तकनीकी पदों में से लगभग आधे रिक्त हैं। परिचालन संबंधी व्यवधानों का समाधान प्रायः सख्त प्रवर्तन के स्थान पर समय-सारणी संबंधी छूट के माध्यम से किया गया है, जो तदर्थ संकट-प्रबंधन की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
  • उच्च परिचालन लागत एवं ईंधन मूल्य अस्थिरता: विमानन कंपनियाँ वैश्विक कच्चे तेल बाज़ार तथा अमेरिकी डॉलर से संबद्ध एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) की मूल्य अस्थिरता के कारण वित्तीय दबाव का सामना करती हैं, जिससे लागत संरचना में अनिश्चितता और अस्थिरता बढ़ती है।
  • पुनरावर्ती एयरलाइन विफलताएँ: इस क्षेत्र में किंगफिशर एयरलाइंस (2012), जेट एयरवेज़ (2019), गो फर्स्ट (2023) सहित अनेक एयरलाइनों का पतन देखा गया है, जो निरंतर बनी वित्तीय एवं संरचनात्मक कमियों को उजागर करता है।
  • विमानन सुरक्षा संबंधी जोखिम: बढ़ते यातायात दबाव, बार-बार होने वाले परिचालन व्यवधान तथा वर्ष 2025 में नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) द्वारा जारी 19 सुरक्षा उल्लंघन नोटिस, सुरक्षा अनुपालन और प्रणालीगत प्रत्यास्थता (Systemic Resilience) को लेकर बढ़ती चिंताओं की ओर संकेत करते हैं।

नई क्षेत्रीय एयरलाइंस एवं संपर्कता पहल

  • नए क्षेत्रीय वाहकों का प्रवेश: दिसंबर 2025 में नागरिक विमानन मंत्रालय ने शंख एयर, अल हिंद एयर तथा फ्लाईएक्सप्रेस को क्षेत्रीय हवाई संपर्क का विस्तार करने और बाज़ार एकाग्रता को कम करने हेतु अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्रदान किये।
  • टियर-2 एवं टियर-3 शहरों पर ध्यान: ये एयरलाइंस नोएडा अंतर्र्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, कोच्चि तथा तेलंगाना जैसे उभरते केंद्रों से परिचालन की योजना बना रही हैं, जिससे उपेक्षित क्षेत्रीय मार्गों को लक्षित कर अंतिम चरण हवाई संपर्क में सुधार किया जा सके।
  • उड़ान (UDAN) के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क सुदृढ़ीकरण: उड़ान योजना के अंतर्गत वर्ष 2025 तक 625 मार्गों और 85 हवाई अड्डों को परिचालित किया जा चुका है, जिनमें पूर्वोत्तर क्षेत्र के 100 से अधिक मार्ग शामिल हैं, जिससे समावेशी हवाई यात्रा को प्रोत्साहन मिला है।

भारत के विमानन क्षेत्र को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से उपाय आवश्यक हैं?

  • संकट-प्रबंधन से संरचनात्मक सुधार की ओर संक्रमण: तदर्थ समय-सारणी छूट पर निर्भरता समाप्त कर दीर्घकालिक संस्थागत सुदृढ़ीकरण पर बल दिया जाना चाहिये, ताकि वर्ष 2030 तक अनुमानित 715 मिलियन यात्री मांग के परिप्रेक्ष्य में प्रणालीगत प्रत्यास्थता सुनिश्चित की जा सके।
  • नियामक पर्यवेक्षण क्षमता का सुदृढ़ीकरण: नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA) के रिक्त तकनीकी पदों को शीघ्र भरा जाए तथा नियम-आधारित और जोखिम-आधारित पर्यवेक्षण तंत्र अपनाए जाने चाहिये, जिससे सुरक्षा अनुपालन में सुधार हो तथा प्रवर्तन की विश्वसनीयता सुदृढ़ हो।
  • पायलट प्रशिक्षण पारिस्थितिक तंत्र का विस्तार: सिम्युलेटर क्षमता बढ़ाना, घरेलू प्रशिक्षण संस्थानों का विस्तार करना, लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को सरल बनाना और टाइप-रेटिंग की बाधाओं को दूर करना ताकि अनुमानित पायलट मांग को पूरा किया जा सके और अस्थायी विदेशी अनुमोदनों पर निर्भरता कम हो।
  • रिज़र्व क्षमता मानकों को संस्थागत बनाना: न्यूनतम अतिरिक्त क्रू की सीमा को वैश्विक मानकों (20–25%) के करीब स्थापित करना, ताकि पीक यात्रा मौसम और संचालन में अचानक व्यवधान के दौरान शृंखला-प्रभाव वाले व्यवधानों को रोका जा सके।
  • सक्षम क्षेत्रीय एयरलाइन का समर्थन: केवल NOC देने तक सीमित न रहकर UDAN सब्सिडी का प्रभावी कार्यान्वयन, भीड़-भाड़ वाले हवाई अड्डों पर प्राथमिक स्लॉट आवंटन और टियर-2 एवं टियर-3 हवाई अड्डों के समन्वित विकास को सुनिश्चित करना, ताकि प्रमुख एयरलाइन पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।
  • ईंधन नीति को तर्कसंगत बनाना: एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF)  पर कर नीतियों का समायोजन करने पर विचार करना और ईंधन हेजिंग तंत्र को अपनाना, ताकि वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव तथा डॉलर-आधारित अस्थिरता से उत्पन्न जोखिम को कम किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत का विमानन क्षेत्र भले ही बड़े पैमाने पर विकसित हो चुका है, फिर भी यह संरचनात्मक रूप से कमज़ोर है। पायलट की कमी, नियामक अंतराल, उच्च बाज़ार एकाग्रता और लागत में उतार-चढ़ाव दीर्घकालिक स्थिरता के लिये गंभीर खतरा हैं। सुरक्षित, प्रतिस्पर्द्धी तथा लचीले विमानन विकास हेतु केवल आपातकालीन प्रबंधन पर भरोसा करने के बजाय संरचनात्मक सुधारों को लागू करना आवश्यक है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न. भारत के विमानन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली चुनौतियों का विश्लेषण और सतत एवं लचीले विकास के उपाय सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में DGCA की क्या भूमिका है?
नागरिक विमानन महानिदेशालय (DGCA): भारत का सर्वोच्च नागरिक विमानन नियामक संस्थान, जो नागरिक विमानन मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। यह संस्था हवाई सुरक्षा, लाइसेंसिंग, विमान की उड़ान-योग्यता, उड़ान नियमावली का पालन और ICAO के साथ समन्वय के लिये ज़िम्मेदार है।

2. नागरिक विमानन में भारत की अभी वैश्विक स्थिति क्या है?
भारत अमेरिका और चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा घरेलू विमानन बाज़ार है और यह 7.7 मिलियन से अधिक रोज़गार प्रदान करता है।

3. भारत का विमानन क्षेत्र संरचनात्मक रूप से संवेदनशील क्यों है?
तेज़ी से वृद्धि, पायलट की कमी, कमज़ोर नियामक क्षमता और उच्च बाज़ार एकाग्रता इसे प्रणालीगत व्यवधानों के प्रति प्रवण बनाते हैं।

4. UDAN विमानन क्षेत्र को कैसे मज़बूत बनाती है?
UDAN क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ाकर अविकसित मार्गों और हवाई अड्डों तक पहुँच का विस्तार करती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

मेन्स

प्रश्न. सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के अधीन संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से भारत में विमान पत्तनों के विकास का परीक्षण कीजिये। इस संबंध में प्राधिकरणों के समक्ष कौन-सी चुनौतियाँ हैं? (2017)

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