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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट

  • 24 Apr 2021
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

सरकारी द्वारा जारी नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2020-2021 में भारत के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में गिरावट आई है।

  • उल्लेखनीय है कि भारत में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन वर्ष 2011-12 से लगातार कम हो रहा है।

प्रमुख बिंदु

उत्पादन में गिरावट:

  • कच्चे तेल के उत्पादन में 5.2% की कमी आई है क्योंकि निजी और सार्वजनिक कंपनियों द्वारा वर्ष 2020-21 में 30.5 मिलियन टन कच्चे तेल का उत्पादन किया गया, जबकि वर्ष 2019-2020 में 32.17 मिलियन टन कच्चे तेल का उत्पादन किया गया था। 
  • प्राकृतिक गैस के उत्पादन में 8.1% की गिरावट आई है। वर्ष 2020-21 में 28.67 बिलियन क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस का उत्पादन हुआ जबकि वर्ष 2019-20 में 31.18 बिलियन क्यूबिक मीटर प्राकृतिक गैस का उत्पादन हुआ था।

गिरावट के कारण:

  • अत्यधिक पुराने स्रोत:
    • भारत में अधिकांश कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन अत्यधिक पुराने हो चुके कुओं से होता है तथा समय के साथ इनकी उत्पादन क्षमता में कमी आई है।
  • गहन प्रौद्योगिकी की आवश्यकता:
    • भारत में तेल तथा गैस अब अधिक सरलता से उपलब्ध नहीं है ऐसे में उत्पादकों को दुर्गम क्षेत्रों (जैसे अत्यधिक गहरे पानी वाले क्षेत्र) से तेल और गैस के निष्कर्षण  हेतु प्रौद्योगिकी गहन साधनों के उपयोग में निवेश करना होगा।
  • सरकार के स्वामित्व वाली कंपनियों का वर्चस्व:
    • भारत में कच्चे तेल के उत्पादन पर सरकार के स्वामित्व वाली दो प्रमुख अन्वेषण एवं उत्पादन कंपनियों, ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (ONGC) और ऑयल इंडिया का प्रभुत्व है।
      • ये कंपनियाँ नीलामी में हाइड्रोकार्बन ब्लॉकों के लिये सबसे प्रमुख बोलीदाता रही हैं और ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (OALP) शासन के तहत पाँचवें और नवीनतम दौर की नीलामी में भी केवल यही दोनों कंपनियाँ सफल बोलीदाता रहीं, जहाँ ग्यारह में से सात तेल और गैस ब्लॉकों पर ONGC ने तथा अन्य चार पर ऑयल इंडिया ने अधिकार प्राप्त किये।
  • विदेशी कंपनियों की कम रुचि:
    • हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और उत्पादन में ऊर्जा क्षेत्र की दिग्गज विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिये भारत द्वारा किये जा रहे प्रयासों को भी काफी हद तक सफलता नहीं मिली है।
      • सरकार ने दुर्गम क्षेत्रों से तेल और गैस के निष्कर्षण में तकनीकी सहायता प्रदान करने हेतु ONGC से निवेश में वृद्धि करने तथा विदेशी अग्रणी कंपनियों के साथ संपर्क/सहभागिता बढ़ाने के लिये कहा है।
      • सरकार प्रमुख विदेशी अग्रणी कंपनियों को यह समझाने का प्रयास भी कर रही है कि नीलामी और विनियमन की वर्तमान प्रणाली पहले की तुलना में अधिक "खुली एवं पारदर्शी" है।
  • जलवायु परिवर्तन: 
    • जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ता दबाव तेल और गैस के प्रमुख चालकों को स्वच्छ ऊर्जा में विविधता लाने के लिये प्रेरित कर रहा है।

निजी भागीदारी कम होने के कारण:

  • परिचालन में देरी: पर्यावरणीय मंज़ूरी और क्षेत्र विकास योजनाओं के नियामक द्वारा अनुमोदन आदि में देरी के कारण हाइड्रोकार्बन ब्लॉकों के परिचालन में विलंब भारत के अपस्ट्रीम तेल और गैस क्षेत्र में कम निजी भागीदारी के लिये विशेषज्ञों द्वारा उद्धृत प्रमुख कारणों में से एक है।
  • उच्च उपकर:
    • उद्योग चालकों द्वारा घरेलू स्तर पर कच्चे तेल के उत्पादन पर मौजूदा उपकर 20% को घटाकर 10% करने की मांग की जाती रही है।
  • अधिकतम उत्पादन की सीमा:
    • जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने के लिये तेल और गैस की बड़ी कंपनियों द्वारा निर्धारित आंतरिक अधिकतम उत्पादन स्तर के चलते भी तेल की बड़ी कंपनियों ने भारत में परिचालन का विस्तार करने में कम रुचि दिखाई है।

प्रभाव:

  • आयात पर निर्भरता:
    • कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का घरेलू स्तर पर कम उत्पादन  होने से इनके आयात पर भारत की निर्भरता में वृद्धि होगी।
      • वित्त वर्ष 2020 में भारत में कच्चे तेल की कुल खपत के अनुपात में आयात का हिस्सा वित्त वर्ष 2012 के 81.8% से बढ़कर 87.6% हो गया है।
  • भारत के दृष्टिकोण के पक्ष में नहीं:
    • तेल और गैस के उत्पादन को बढ़ावा देना भी सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है और इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक भारत के प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण में प्राकृतिक गैस के उपयोग को मौजूदा 6.2% से बढ़ाकर 15% तक करना है। लेकिन कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन में हो रही लगातार गिरावट सरकार के इस दृष्टिकोण के पक्ष में नहीं है।

उत्पादन में सुधार के लिये सरकार द्वारा उठाए गए कदम:

  • अन्वेषण और लाइसेंसिंग संबंधी सुधार:
    • अक्तूबर 2020 में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने तेल एवं गैस के घरेलू अन्वेषण तथा उत्पादन को बढ़ाने के लिये अन्वेषण और लाइसेंसिंग क्षेत्र में सुधारों पर नीतिगत ढाँचे को मज़ूरी दी।
  • राष्ट्रीय डेटा रिपोजिटरी (NDR):
    • अनुसंधान एवं विकास तथा अन्य शैक्षणिक संस्थानों के उपयोग के अलावा, भविष्य में किये जाने वाले अन्वेषण और विकास में सहायता हेतु व्यवस्थित एवं विनियमित डेटा की विशाल मात्रा को संग्रहीत करने उसे सुरक्षित रखने तथा इसके अनुरक्षण के लिये वर्ष 2017 में सरकार द्वारा NDR की स्थापना की गई थी।
    • यह भारत की तलछट युक्त (Sedimentary) घाटियों में अन्वेषण और उत्पादन (Exploration and Production- E&P) से संबंधित जानकारी हेतु एकीकृत डेटा भंडार है।
  • हाइड्रोजन अन्वेषण तथा लाइसेंसिंग नीति (HELP):
    • यह वर्ष 2016 में लागू की गई ‘नई अन्वेषण लाइसेंसिंग नीति’ (New Exploration Licensing Policy (NELP) का स्थान लेती है तथा पारंपरिक और गैर-पारंपरिक हाइड्रोकार्बन संसाधनों के अन्वेषण एवं उत्पादन के लिये एकल लाइसेंस; मूल्य निर्धारण एवं विपणन की स्वतंत्रता; अपतटीय ब्लॉकों के लिये कम रॉयल्टी दर का प्रावधान करती है। 

आगे की राह

  • विभिन्न प्रकार की नई प्रौद्योगिकियों की सहायता से अत्यधिक पुराने हो चुके तेल क्षेत्रों को पुनर्जीवन प्रदान कर उनकी उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सकता है लेकिन इन प्रौद्योगिकियों का अधिग्रहण, परीक्षण और अनुप्रयोग पूंजी-गहन है। अतः राजकोषीय ढाँचे के तहत उत्पादकों के लिये संवर्द्धित तेल रिकवरी तंत्र की तैनाती के लिये पर्याप्त रिटर्न सुनिश्चित करना चाहिये।
  • प्रत्येक साइन-ऑफ के लिये समय-सीमा निर्धारित कर वर्तमान स्वीकृति प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाना चाहिये ताकि जिससे देरी के कारण लागत में होने वाली वृद्धि से बचा जा सके।
  • शेल ऑयल और गैस, टाइट ऑयल/गैस और गैस हाइड्रेट जैसे अपरंपरागत हाइड्रोकार्बन (Unconventional Hydrocarbons- UHC) की क्षमता को अब व्यावसायिक दोहन के लिये खोला जाना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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