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भारतीय राजनीति

उच्च न्यायालय द्वारा पशु बलि पर प्रतिबंध का निर्णय

  • 05 Oct 2019
  • 5 min read

चर्चा में क्यों?

27 सितंबर, 2019 को त्रिपुरा उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने राज्य के मंदिरों में जानवरों और पक्षियों की बलि देने की परंपरा पर प्रतिबंध लगा दिया। साथ ही न्यायालय ने सरकार को संवैधानिक मूल्यों और सभी जानवरों एवं पक्षियों के प्रति करुणा, प्रेम, मानवता के महत्त्व के बारे में लोगों को जागरूक करने का निर्देश दिया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • त्रिपुरा में पशु बलि की परंपरा कम-से-कम 500 वर्षों पुरानी है।
  • पशु बलि मुख्य रूप से त्रिपुरा के दो मंदिरों - उदयपुर स्थित त्रिपुरेश्वरी मंदिर और अगरतला के चतुर्दश देवता मंदिर में होती है।
  • दोनों मंदिरों की स्थापना त्रिपुरा पर शासन करने वाले माणिक्य वंश के शासकों द्वारा की गई थी।
  • त्रिपुरेश्वरी मंदिर को 51 शक्ति पीठों में से एक शक्ति पीठ माना जाता है, जिसकी स्थापना 1501 ईस्वी में महाराजा धन्य माणिक्य ने की थी।
  • चतुर्दश देवता मंदिर को चौदह देवताओं का मंदिर कहा जाता है जिसका निर्माण 1770 के आसपास महाराजा कृष्ण किशोर माणिक्य द्वारा कराया गया था।
  • पशु बलि की यह परंपरा त्रिपुरा में कम्युनिस्ट शासन के तहत भी जारी रही। हालाँकि अब तक केवल CPM ने इस आदेश का सार्वजनिक रूप से स्वागत किया है।
  • त्रिपुरा संभवतः भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ राज्य सरकार 500 वर्ष से अधिक पुरानी दुर्गा पूजा को प्रायोजित करती रही है और जिसका पूर्ववर्ती शाही परिवार द्वारा प्रबंधन किया जाता है।
  • लेकिन अब पूजा की तांत्रिक विधि पर प्रतिबंध से राज्य में बहस छिड़ गई है।

उच्च न्यायालय का पक्ष

  • न्यायालय ने निर्णय दिया कि जानवरों की बलि देने की परंपरा को संविधान के अनुच्छेद-25(1) के तहत संरक्षित नहीं किया जा सकता है। धार्मिक स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
  • इसके अलावा पशु बलि अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है।
  • अदालत ने कहा कि धार्मिक परंपराएँ, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के प्रावधानों की अवहेलना नहीं कर सकती।

सरकार का पक्ष

  • सरकार ने तर्क दिया कि त्रिपुरेश्वरी और अन्य मंदिरों में पूजा पारंपरिक तरीके से जारी रहनी चाहिये क्योंकि यह भारत में त्रिपुरा के विलय के लिये किये गए समझौते का भाग है।
  • पूजा की तांत्रिक विधि के विरुद्ध यह याचिका इस्लाम धर्म में पशु बलि की परंपरा को शामिल नही करती है।
  • अदालत ने इस तर्क को निरथर्क मानते हुए कहा कि किसी बात की पुष्टि के लिये आवश्यक सामग्री की अनुपस्थिति में राज्य को इस तरह के स्टैंड लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
  • उच्च न्यायालय ने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय (मुस्लिम) द्वारा पशुबलि के मुद्दे को पहले ही मोहम्मद हनीफ कुरेशी और अन्य बनाम बिहार राज्य (1958), पश्चिम बंगाल राज्य बनाम आशुतोष लाहिड़ी (1994) और मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब बनाम गुजरात राज्य और अन्य (1998) जैसे मामलों में निपटाया जा चुका है।
  • इन मामलों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि पशु बलि इस्लाम का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं है और इसे धार्मिक स्वतंत्रता के आधार पर संरक्षण नहीं दिया जा सकता है।
  • इसमें यह भी कहा गया कि इस प्रथा पर प्रतिबंध लगाने के लिये कानून बनाने हेतु राज्य स्वतंत्र है। हालाँकि एक सामान्य प्रतिबंध के प्रश्न पर अदालतों की अलग-अलग राय है।
  • त्रिपुरा के शाही परिवार के वंशज प्रद्योत किशोर माणिक्य देववर्मन और राज्य सरकार ने भी इस निर्णय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करने की बात कही है।

स्रोत : द इंडियन एक्सप्रेस

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