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जीव विज्ञान और पर्यावरण

हरित परियोजनाएँ अधर में

  • 27 May 2019
  • 5 min read

संदर्भ

भारत ने वर्ष 2022 तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें सौर ऊर्जा से 100 गीगावॉट, पवन ऊर्जा से 60 गीगावॉट, बायो-पावर से 10 गीगावॉट और छोटी पनबिजली परियोजनाओं से 5 गीगावॉट क्षमता शामिल हैं।

वर्तमान स्थिति

  • निर्धारित तिथि तक पवन और सौर ऊर्जा क्षमता में वृद्धि का लक्ष्य शायद ही पूरा हो सकेगा।
  • सौर ताप खंड और अपतटीय पवन क्षेत्र को विकसित करने में सरकार की रुचि का अभाव।
  • महासागरीय ऊर्जा (Ocean Energy) और भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) जैसे उभरते क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने में कमी।
  • जैव-ईंधन और छोटे पनबिजली संयंत्र लगभग मृतप्राय अवस्था में पहुँच चुके हैं।

कारण

  • टैरिफ को कम रखने पर अधिक ज़ोर देना: विभिन्न बोलियों के दौरान पवन और सौर उर्जा से संबंधित टैरिफ में प्रति किलोवॉट लगभग 2.44 रुपए की कमी हुई है। बहुत से लोगों का मानना है कि इस तरह के कम टैरिफ गैर-वाजिब हैं जो बोली लगाने वालों द्वारा केवल परियोजनाओं की प्राप्ति के लिये ही लगाए जाते हैं।
  • क्षमता वृद्धि की धीमी गति: नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New and Renewable Energy-MNRE) ने पवन और सौर ऊर्जा क्षमता में वृद्धि के लिये टैरिफ में अत्यधिक कमी की है। वर्ष 2014 से भारत ने 28,000 मेगावॉट सौर ऊर्जा और 14,500 मेगावॉट पवन ऊर्जा क्षमता विकसित की है, इसके बावजूद वर्तमान में इसकी सौर ऊर्जा क्षमता 30,600 मेगावॉट और पवन ऊर्जा क्षमता 35,600 मेगावॉट है।
  • क्षेत्र विशिष्ट समस्याएँ: सौर ऊर्जा क्षेत्र को सुरक्षा प्रशुल्क (Safeguard Duties), GST दरों और रुपए के अवमूल्यन जैसी अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ रहा है, जबकि गुजरात जैसे राज्य, जो कि डेवलपर के लिये पसंदीदा स्थल हैं, में भूमि की समस्या ने पवन ऊर्जा प्रतिष्ठानों को अपंग बना दिया है।
  • क्षेत्र में उद्योगों के सामने आने वाली समस्या: सभी राज्यों में बेहतर स्थिति वाले उद्योगों को भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार या ज़बरन वसूली जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, राज्य सरकार के स्वामित्व वाली इकाइयाँ, ऊर्जा कंपनियों को अपने बकाये का भुगतान देर से करती हैं।

सुझाव

  • गुजरात जैसे तेज़ हवाओं वाले क्षेत्रों पर जाने से बचने के लिये, सरकार को राज्य-वार या यदि संभव हो सब-स्टेशन-वार टेंडर लाने की ज़रूरत है, ताकि अधिक-से-अधिक परियोजनाओं की स्थापना की जा सके।
  • इसके लिये सीमित निविदा (Closed Tender) का विकल्प अपनाया जा सकता है, जिसमें नीलामी आयोजित करने की वर्तमान पद्धति के विपरीत बोली लगाने वाला व्यक्ति, परियोजना को प्राप्त करने के लिये सबसे अच्छा मूल्य प्रदान करता है, बोली लगाने वाले व्यक्ति परियोजना की कीमत तय करने के मामले एक-दूसरे को पीछे छोड़ने की कोशिश करते हैं।
  • सरकार एक निश्चित टैरिफ तय कर सकती है जिसमें सालाना कमी की जाएगी ताकि ऊर्जा कंपनियों को शुरुआती वर्षों में अधिक लाभ प्राप्त हो और वे अपने कर्ज़ का भुगतान कर सकें।
  • सरकार को महासागरीय ऊर्जा (तरंगों, ज्वार और धाराओं से प्राप्त होने वाली) विकसित करने की ज़रूरत है जो नियमित रूप से 24 × 7 ऊर्जा प्रदान कर सकती है।

निष्कर्ष

भारत कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में विश्‍व में पाँचवें स्‍थान पर, पवन ऊर्जा के मामले में चौथे स्‍थान पर तथा सौर ऊर्जा के मामले में 5वें स्‍थान स्थान पर है। इस महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के साथ ही भारत विश्‍व के सबसे बड़े स्‍वच्‍छ ऊर्जा उत्पादक देशों के समूह में शामिल हो जाएगा। यह भी संभव है कि नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत कई विकसित देशों से भी आगे निकल जाए। पर्याप्त उच्च क्षमता स्थापित करने के लक्ष्य की प्राप्ति से देश में व्‍यापक ऊर्जा सुरक्षा, ऊर्जा तक बेहतर पहुँच और रोज़गार के अवसरों में वृद्धि होगी।

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