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सामाजिक न्याय

ग्लोबल ट्रेंड रिपोर्ट ऑन फोर्स्ड डिस्प्लेसमेंट इन 2021

  • 22 Jun 2022
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

यूएनएचसीआर, आंतरिक विस्थापन, 1951 का शरणार्थी कन्वेंशन।

मेन्स के लिये:

क्लाइमेंट रिफ्यूजी से जुड़ी चुनौतियाँ और समाधान, सरकारी नीतियांँ और हस्तक्षेप।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (United Nations High Commissioner for Refugees- UNHCR) द्वारा वर्ष 2022 की वार्षिक ग्लोबल ट्रेंड रिपोर्ट (Global Trends Report) प्रकाशित की गई है।

  • 20 जून को संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व शरणार्थी दिवस के रूप में नामित किया गया है। विश्व शरणार्थी दिवस 2022 की थीम ‘’जो भी कहीं भी और जब भी मौजूद हो उसे सुरक्षा मांगने का अधिकार है’’ (Whoever, whatever, whenever Everyone has got a right to seek safety) है।

ग्लोबल ट्रेंड रिपोर्ट:

  • यह प्रमुख सांख्यिकीय प्रवृत्तियों और शरणार्थियों की नवीनतम संख्या, शरण चाहने वालों, आंतरिक रूप से विस्थापित और दुनिया भर में राज्यविहीन व्यक्तियों के साथ-साथ उन लोगों की संख्या को प्रस्तुत करता है जो अपने देशों या मूल क्षेत्रों में लौट आए हैं।
  • रिपोर्ट का प्रकाशन वर्ष में एक बार होता है जो पिछले पिछले वर्ष की स्थिति को दर्शाती है।
  • आंँकड़ें सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और UNHCR द्वारा रिपोर्ट किये गए आंँकड़ों पर आधारित हैं।

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएंँ:

  • वैश्विक परिदृश्य:
    • पिछले वर्ष हिंसा, मानवाधिकारों के हनन, खाद्य असुरक्षा, जलवायु संकट, यूक्रेन में युद्ध और अफ्रीका से अफगानिस्तान तक अन्य आपात स्थितियों के कारण वैश्विक स्तर पर 100 मिलियन लोगों को अपने घरों को छोड़ने के लिये मज़बूर होना पड़ा था।
    • आपदाओं के कारण विश्व स्तर पर 23.7 मिलियन नए आंतरिक विस्थापन हुए (ये संघर्ष और हिंसा के कारण आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के अतिरिक्त हैं)। यह पिछले वर्ष की तुलना में सात मिलियन या 23% की कमी को दर्शाता है।
    • वर्ष 2021 में आपदाओं के संदर्भ में सबसे अधिक विस्थापन चीन (6.0 मिलियन), फिलीपींस (5.7 मिलियन) और भारत (4.9 मिलियन) में हुआ।
    • अधिकांश आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्ति अपने गृह क्षेत्रों में लौट आए, लेकिन दुनिया भर में 5.9 मिलियन लोग आपदाओं के कारण वर्ष के अंत में विस्थापित हुए।
    • अपने घरों से भागने के लिये मज़बूर लोगों की संख्या पिछले एक दशक से हर साल बढ़ी है और अपने उच्चतम स्तर पर है, इस प्रवृति को केवल शांति निर्माण की दिशा में एक नए, ठोस प्रयास से ही बदला जा सकता है।
  • भारत:
    • वर्ष 2021 में जलवायु परिवर्तन और आपदाओं के कारण भारत में लगभग 50 लाख लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए थे।

आंतरिक विस्थापन:

  • आंतरिक विस्थापन (अर्थ):
    • आंतरिक विस्थापन उन लोगों की स्थिति का वर्णन करता है जिन्हें अपने घर छोड़ने के लिये मज़बूर किया गया है लेकिन उन्होंने अपना देश नहीं छोड़ा है।
    • विस्थापन के कारक: प्रत्येक वर्ष लाखों लोग संघर्ष, हिंसा, विकास परियोजनाओं, आपदाओं और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में अपने घरों या निवास स्थानों को छोड़कर अपने देशों की सीमाओं के भीतर विस्थापित हो जाते हैं।
    • घटक: आंतरिक विस्थापन दो घटकों पर आधारित है:
      • यदि लोगों का विस्थापन जबरदस्ती या अनैच्छिक है (उन्हें आर्थिक और अन्य स्वैच्छिक प्रवासियों से अलग करने हेतु);
      • यदि व्यक्ति अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त राज्य की सीमाओं के भीतर रहता है (उन्हें शरणार्थियों से अलग करने हेतु)।
    • शरणार्थी से अंतर: वर्ष 1951 के शरणार्थी सम्मेलन के अनुसार, "शरणार्थी" एक ऐसा व्यक्ति है जिस पर अत्याचार किया गया है और अपने मूल देश को छोड़ने के लिये मज़बूर किया गया है।
      • शरणार्थी माने जाने की एक पूर्व शर्त यह है कि वह व्यक्ति एक अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करता हो।
      • शरणार्थियों के विपरीत, आंतरिक रूप से विस्थापित लोग किसी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का विषय नहीं हैं।
      • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों की सुरक्षा और सहायता पर वैश्विक नेतृत्व के रूप में किसी एक एजेंसी या संगठन को नामित नहीं किया गया है।
      • हालाँकि आंतरिक विस्थापन पर संयुक्त राष्ट्र के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
    • आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों (IDP) द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ: IDP को शारीरिक शोषण, यौन या लिंग आधारित हिंसा का खतरा बना रहता है और वे परिवार के सदस्यों से अलग होने का जोखिम उठाते हैं।
      • वे प्राय: पर्याप्त आश्रय, भोजन और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रहते हैं और अक्सर अपनी संपत्ति, भूमि या आजीविका तक अपनी स्थापित पहुँच को खो देते हैं।

आंतरिक विस्थापन से जुड़ी चुनौतियाँ:

  • उचित और आमतौर पर स्वीकृत आँकड़ों का अभाव: जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विस्थापन से संबंधित आँकड़ों के संदर्भ में, सीधे शब्दों में कहें तो जो परिभाषित नहीं है, उसकी मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती है, और जिनकी मात्रा निर्धारित नहीं की जा सकती है, उसकी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है।
  • जलवायु शरणार्थियों के लिये कानूनी स्थिति का अभाव: कानूनी दृष्टिकोण से यूएनएचसीआर "जलवायु शरणार्थी" शब्द का समर्थन नहीं करता है जो अंतर्राष्ट्रीय कानून में मौजूद नहीं है। यह आकलन करना भी बहुत मुश्किल है कि क्या कोई व्यक्ति जो जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विस्थापित हुआ है। वैसे भी विस्थापित हो जाते अगर कोई जलवायु परिवर्तन नहीं होता।
  • ऐतिहासिक मिसाल का अभाव: दूसरे कई स्थितियों के लिये ऐतिहासिक मिसाल की कमी जो मानव से संबंधित जलवायु परिवर्तन की प्रगति के रूप में उत्पन्न होगी, जिसका मानव गतिशीलता पर प्रभाव पहले कभी नहीं देखा गया है। इसका मतलब यह है कि यह स्पष्ट नहीं है कि बदलती जलवायु भविष्य में लोगों के निर्णयों और व्यवहार को कैसे प्रभावित करेगी।
  • जलवायु परिवर्तन और विस्थापन के बीच गैर-मौजूद संबंध: अंत में, जलवायु परिवर्तन और विस्थापन के बीच की कड़ी पूरी तरह से मापने योग्य नहीं है और इस बात पर कोई सहमति नहीं है कि यह एक सीधा कारण है, उदाहरण के लिये केवल सीमित जानकारी उपलब्ध है। अन्य कारण भी हैं- बढ़ती गरीबी, राजनीतिक अस्थिरता और सशस्त्र संघर्ष पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव आदि।

आगे की राह

  • स्वदेश में वापसी: अधिकांश शरणार्थियों के लिये एक स्वतंत्र और सूचित विकल्प के आधार पर अपने देश लौटना शरणार्थियों के रूप में उनकी अस्थायी स्थिति को समाप्त करने का एक उचित समाधान होगा। इसके लिये राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक अवसर यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हैं कि पर्यावरण प्रभावित शरणार्थियों सुरक्षा और सम्मान के साथ पुन: एकीकृत करने की अनुमति मिले। साथ ही यह सुनिश्चित करना कि वापसी टिकाऊ है।
  • पुनर्वास: जबकि कई देशों ने मेज़बान देशों के साथ अपनी एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए, पुनर्वास के लिये अपनी प्रतिबद्धता का संकेत दिया है, हालाँकि राज्यों द्वारा प्रस्तावित स्थानों की संख्या में उल्लेखनीय कमी के कारण यह कम शरणार्थियों के लिये एक विकल्प प्रदान करता है। पुनर्वास एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपकरण और समाधान है जो UNHCR के कानून अनुसार अनिवार्य एक मुख्य गतिविधि है, जो कुछ सबसे कमजोर शरणार्थियों (जिन्हें विशिष्ट या तत्काल जोखिम का सामना करना पड़ सकता है) की रक्षा करने में मदद करता है।
  • स्थानीय एकीकरण: सुरक्षित रूप से लौटने या फिर से बसने की संभावना के अभाव में कुछ देशों में शरणार्थियों के लिये अपने देश में लंबे समय तक या स्थायी रूप से रहने के लिये रास्ते उपलब्ध हैं। स्थानीय एकीकरण यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि शरणार्थी इन देशों में नए जीवन की शुरुआत कर सकें।

संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR):

  • परिचय:
    • शरणार्थियों के लिये संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (UNHCR) का कार्यालय वर्ष 1950 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उन लाखों यूरोपीय लोगों की मदद के लिये बनाया गया था, जो अपने घर छोड़कर भाग गए थे या खो गए थे।
    • 1954 में UNHCR ने यूरोप में अपने अभूतपूर्व कार्य के लिये नोबेल शांति पुरस्कार जीता। लेकिन हमें अपनी अगली बड़ी आपात स्थिति का सामना करने में ज़्यादा समय नहीं लगा।
    • 1960 के दशक के दौरान अफ्रीका के उपनिवेशवाद ने इस महाद्वीप के कई शरणार्थी संकटों में से एक था। इसने अगले दो दशकों में एशिया और लैटिन अमेरिका में लोगों को प्रवास हेतु बाध्य किया।
    • 1981 में शरणार्थियों के लिये विश्वव्यापी सहायता करने हेतु इसे दूसरा नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
  • 1951 शरणार्थी सम्मेलन और इसका 1967 प्रोटोकॉल:
    • वे प्रमुख कानूनी दस्तावेज हैं जो इसके काम का आधार बनाते हैं। 149 राज्य पार्टियों में से किसी एक या दोनों के साथ वे 'शरणार्थी' शब्द को परिभाषित करते हैं और शरणार्थियों के अधिकारों के साथ-साथ उनकी रक्षा के लिये राज्यों के कानूनी दायित्वों की रूपरेखा तैयार करते हैं।
    • मूल सिद्धांत गैर-प्रतिशोधन है, जो इस बात पर ज़ोर देता है कि शरणार्थी को उस देश में वापस नहीं किया जाना चाहिये जहांँ उन्हें अपने जीवन या स्वतंत्रता के लिये गंभीर खतरे का सामना करना पड़ता है। इसे अब प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय कानून का नियम माना जाता है।
    • UNHCR 1951 के सम्मेलन और इसके 1967 प्रोटोकॉल के 'अभिभावक' के रूप में कार्य करता है। कानून के अनुसार, राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे यह सुनिश्चित करने में हमारे साथ सहयोग करें कि शरणार्थियों के अधिकारों का सम्मान और संरक्षण किया जाता है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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