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राजस्थान में अपूर्ण शिक्षा दिशा-निर्देश

  • 20 Jul 2020
  • 13 min read

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 

मेन्स के लिये:

प्रारंभिक शिक्षा के संदर्भ में राजस्थान सरकार दिशा-निर्देश तथा इस पर प्रतिक्रिया, किस प्रकार ये दिशा-निर्देश शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन करते हैं?

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights-NCPCR) ने राजस्थान सरकार द्वारा प्रारंभिक शिक्षा पर जारी नए दिशा-निर्देशों के लिये राज्य सरकार की आलोचना की है। आयोग के अनुसार, ये नए दिशा-निर्देश शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 का उल्लंघन करते हैं तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों के बच्चों को नर्सरी कक्षाओं में निःशुल्क शिक्षा के अधिकार से वंचित करते हैं।

प्रमुख बिंदु

पृष्ठभूमि:

  • राजस्थान के स्कूली शिक्षा विभाग ने दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा है कि RTE अधिनियम, 2009 के तहत 2020-21 के शैक्षणिक वर्ष के लिये निजी स्कूलों में केवल कक्षा 1 या उससे ऊपर के बच्चों को प्रवेश कराया जाएगा, जिसमें प्री-स्कूलर्स (नर्सरी के बच्चे) शामिल नहीं हैं।
  • नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रवेश की आयु "5 वर्ष या उससे अधिक, लेकिन 31 मार्च 2020 तक 7 वर्ष से कम" है।

नियमों का उल्लंघन:

  • ये दिशा-निर्देश RTE अधिनियम, 2009 का उल्लंघन करते हैं, जिसमें कहा गया है कि निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें वंचित वर्ग के बच्चों के लिये आरक्षित होनी चाहिये।
  • ये दिशा-निर्देश केवल 7 साल से कम उम्र के बच्चों को विद्यालय में प्रवेश करने की अनुमति देते हैं लेकिन RTE अधिनियम में प्रवेश के लिये "छह से चौदह वर्ष की आयु के बच्चे" का प्रावधान शामिल है।

NCPCR’s की प्रतिक्रिया

  • NCPC ने RTE अधिनियम के आलोक में नए दिशा-निर्देशों की फिर से जाँच करने और आवश्यक परिवर्तन करने की सिफारिश की है ताकि नए नियमों के चलते बच्चों की शिक्षा को कोई नुकसान न होने पाए।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग

National Commission for Protection of Child Rights – NCPCR

  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की स्थापना संसद के एक अधिनियम बालक अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के अंतर्गत मार्च 2007 में की गई थी।
  • यह महिला और बाल विकास मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है।

अधिदेश

  • आयोग का अधिदेश यह सुनिश्चित करना है कि समस्त विधियाँ, नीतियाँ कार्यक्रम तथा प्रशासनिक तंत्र बाल अधिकारों के संदर्श के अनुरूप हों, जैसा कि भारत के संविधान तथा साथ ही संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (कन्वेशन) में प्रतिपादित किया गया है।
  • बालक को 0 से 18 वर्ष के आयु वर्ग में शामिल व्यक्ति के रूप में पारिभाषित किया गया है। 
  • यह आयोग राष्ट्रीय नीतियों एवं कार्यक्रमों में निहित अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण की परिकल्पना करता है तथा इसके अंतर्गत प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्टताओं एवं मज़बूतियों को ध्यान में रखते हुए राज्य, ज़िला और खण्ड स्तरों पर पारिभाषित प्रतिक्रियाओं को भी शामिल किया गया है। 

आयोग के कार्य

  • बाल अधिकारों के संरक्षण के लिये उस समय मौजूद कानून के तहत बचाव की स्थिति संबंधी जाँच और समीक्षा करना तथा इनके प्रभावी कार्यान्वयन के उपायों की सिफारिश करना।
  • इन रक्षात्मक उपायों की कार्यशैली पर प्रतिवर्ष और ऐसे अन्य अंतरालों पर केंद्र सरकार के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करना जिन्हें आयोग द्वारा उपयुक्त पाया जाए।
  • उक्त मामलों में बाल अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करना और कार्यवाही के संबंध में सिफारिश करना।
  • उन सभी कारकों की जाँच करना जो आंतकवाद, साम्प्रदायिक हिंसा, दंगों, प्राकृतिक आपदाओं, घरेलू हिंसा, एचआईवी/एड्स, अनैतिक व्यापार, दुर्व्यवहार, यंत्रणा और शोषण, अश्लील चित्रण तथा वेश्यावृत्ति से प्रभावित बाल अधिकारों का लाभ उठाने का निषेध करते हैं तथा उपयुक्त सुधारात्मक उपायों की सिफारिश करना।
  • अन्य अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और साधनों का अध्ययन करना तथा मौजूदा नीतियों, कार्यक्रमों एवं बाल अधिकारों पर अन्य गतिविधियों की आवधिक समीक्षा करना तथा बच्चों के सर्वोत्तम हित में इनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिये सिफारिशें करना।
  • किशोर संरक्षण गृह या निवास के अन्य किसी स्थान, बच्चों के लिये बनाए गए संस्थान का निरीक्षण करना या निरीक्षण करवाना, ऐसे संस्थान जो केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण के अधीन हैं (इनमें किसी सामाजिक संगठन द्वारा चलाए जाने वाले संस्थान भी शामिल है, जहाँ बच्चों को इलाज, सुधार या संरक्षण के प्रयोजन से रखा या रोका जाता है) तथा इनके संबंध में आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई करना।
  • इस संबंध में प्राप्त शिकायतों की जाँच करना और निम्नलिखित मुद्दों से संबंधित मामलों की स्वप्रेरणा से जानकरी लेना:
    • बाल अधिकारों से वंचित रखना और उल्लंघन।
    • बच्चों के संरक्षण और विकास के लिये बनाए गए कानूनों का कार्यान्वयन नहीं करना।
    • नीति निर्णयों, दिशा-निर्देशों या कठिनाई के शमन पर लक्षित अनुदेशों का गैर-अनुपालन और बच्चों का कल्याण सुनिश्चित करना।

शिक्षा का अधिकार 

(Right to Education)

संवैधानिक पृष्ठभूमि:

  • भारतीय संविधान का भाग IV, राज्य नीति (DSDP) के निर्देशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 45 और अनुच्छेद 39 (f) में राज्य द्वारा वित्त पोषित और समान एवं सुलभ शिक्षा का प्रावधान है।
  • शिक्षा के अधिकार पर पहला आधिकारिक दस्तावेज़ 1990 में राममूर्ति समिति की रिपोर्ट में पेश किया गया था।
  • उन्नीकृष्णन जेपी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य, 1993 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शिक्षा अनुच्छेद 21 से मौलिक अधिकार है।
  • इसी संबंध में तापस मजूमदार समिति (1999) की स्थापना की गई, जिसमें अनुच्छेद 21-A के सम्मिलन को शामिल किया गया।
  • 2002 में 86वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा शिक्षा के अधिकार को संविधान के भाग III में एक मौलिक अधिकार प्रदान किया गया।
    • अनुच्छेद 21-A में शिक्षा के अधिकार को 6-14 साल के बच्चों के लिये एक मौलिक अधिकार बनाया गया है।
    • इसने शिक्षा का अधिकार विधेयक 2008 के लिये अनुवर्ती कानून प्रदान किया जिसने 2009 में अधिनियम का रूप धारण दिया।

RTE अधिनियम, 2009 की विशेषताएँ:

  • 2 दिसंबर, 2002 को संविधान में 86वाँ संशोधन किया गया और इसके अनुच्छेद 21ए के तहत शिक्षा को मौलिक अधिकार बना दिया गया है।
  • इस मूल अधिकार के क्रियान्वयन हेतु वर्ष 2009 में भारत सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में एक युगांतकारी कदम उठाते हुए नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम (the Right of Children to Free and Compulsory Education Act) पारित किया।
  • इसके तहत 6-14 वर्ष की आयु के प्रत्येक बच्चे के लिये शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में अंगीकृत किया गया।
  • शिक्षा के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत 25 फीसदी सीटें वंचित वर्ग के बच्चों के लिये आरक्षित करना एक अनिवार्य शर्त है, इनमें शामिल हैं:
    • अनुसूचित जाति (SCs) और अनुसूचित जनजाति (STs)
    • सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग
    • निःशक्तजन

बच्चों से संबंधित प्रावधान:

  • यह गैर-प्रवेश दिये गए बच्‍चे को उचित आयु कक्षा में प्रवेश किये जाने का प्रावधान करता है।
  • इसमें ‘नो डिटेंशन पॉलिसी’ का भी एक खंड शामिल था, जिसे बच्चों के नि: शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 के तहत हटा दिया गया।
  • यह बच्चे को बाल-सुलभ और बाल-केंद्रित शिक्षा की प्रणाली के माध्यम से भय, आघात और चिंता से मुक्त बनाने पर केंद्रित है।

अध्यापकों से संबंधित प्रावधान:

  • यह स्थानीय प्राधिकरण, राज्य विधानसभा और संसदीय चुनावों, आपदा राहत कार्यों तथा जनगणना के अलावा गैर-शैक्षणिक कार्यों के लिये शिक्षकों की तैनाती पर प्रतिबंध लगाने को भी निषिद्ध करता है।
  • यह शिक्षकों की नियुक्ति के लिये अपेक्षित प्रविष्टि और शैक्षणिक योग्यता का प्रावधान करता है।
  • यह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय एवं अन्य ज़िम्मेदारियों को साझा करने के बारे में भी चर्चा करता है।
  • यह निम्नलिखित मानदंडों और मानकों से संबंधित है:
    • शिष्य-शिक्षक अनुपात (Pupil-Teacher Ratios-PTR)
    • स्कूलों के भवन एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं हेतु उच्च स्तरीय व्यवस्थाएँ करना
    • शिक्षकों एवं स्कूल के अन्य कर्मचारियों के लिये काम के घंटे तय करना 

यह निम्नलिखित को निषिद्ध करता है:

  • शारीरिक दंड और मानसिक उत्पीड़न।
  • बच्चों के प्रवेश के लिये स्क्रीनिंग प्रक्रिया।
  • प्रति व्यक्ति शुल्क (Capitation fee)।
  • शिक्षकों द्वारा निजी ट्यूशन।
  • बिना मान्यता के स्कूलों का संचालन।

आगे की राह:

RTE अधिनियम के लागू होने के बाद दस साल से अधिक का समय बीत गया है, लेकिन अभी भी इस अधिनियम को अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिये एक लंबा रास्ता तय करना है। एक अनुकूल वातावरण का निर्माण और संसाधनों की आपूर्ति देशवासियों के साथ-साथ पूरे देश के लिये एक बेहतर भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेगी।

स्रोत: द हिंदू

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