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तालिबान को प्रतिबंधों की सूची से हटाना

  • 25 Aug 2021
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

संकल्प 1988 समिति, संयुक्त राष्ट्र, UNSC

मेन्स के लिये:

तालिबान के प्रति संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की प्रतिक्रिया, तालिबान शासन का भारत पर प्रभाव 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र (UN) के अधिकारियों ने दावा किया कि तालिबान के शीर्ष नेतृत्त्व ने अब तक प्रतिबंधों से हटाने के लिये संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों से कोई अनुरोध नहीं किया है।

  • उन्होंने उन रिपोर्टों का भी खंडन किया जिसमें कहा गया था कि सितंबर 2021 में होने वाली तालिबान प्रतिबंध समिति की अगली बैठक जिसे संकल्प 1988 समिति के रूप में भी जाना जाता है, में सिराजुद्दीन हक्कानी और मुल्ला बरादार जैसे नामित आतंकवादियों पर प्रतिबंध हटा दिया जाएगा।

प्रमुख बिंदु 

संकल्प 1988 समिति की बैठक:

  • संयुक्त राष्ट्र (UNPR) में भारत, स्थायी प्रतिनिधि के रूप में दिसंबर 2021 तक है और यह बैठकों की तारीख तय करने तथा तालिबानी नेताओं पर प्रतिबंध हटाने के अनुरोधों की जाँच करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
  • अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA), जो सितंबर 2021 में समाप्त हो रहा है,  के जनादेश के नवीनीकरण पर चर्चा करने के लिये एक महत्त्वपूर्ण बैठक होने की उम्मीद है।
  •  "शांति और सुलह के प्रयासों" में भाग लेने के लिये 14 तालिबान सदस्यों को दी जाने वाली विशेष यात्रा छूट का विस्तार करने के बारे में भी निर्णय लिये जाने की संभावना है।
  • बैठक में इस बात पर भी चर्चा हो सकती है कि क्या अन्य तालिबान नेताओं को छूट में शामिल किया जाए, उन्हें यात्रा करने और कुछ फंड तक पहुँचने की अनुमति दी जाए, जो इस समय फ्रीज की स्थिति में हैं।

बैठक का महत्त्व:

  • यह पहली बार है जब काबुल पर तालिबान के कब्ज़े और अमेरिकी सैनिकों के पीछे हटने की समय-सीमा के बाद समितियों की बैठक होगी।
  • UNSC के सदस्यों, विशेष रूप से P-5 - यूएस, रूस, चीन, फ्राँस और यूके द्वारा उठाए जाने वाले  कदमों से यह संकेत मिलेगा कि वे अफगानिस्तान में तालिबान के नेतृत्त्व वाले भविष्य के शासन के लिये किस तरह का दृष्टिकोण रखना चाहते हैं।
  • इस बार काबुल पर तालिबान के नियंत्रण और उसके द्वारा देश के झंडे तथा नाम को बदलने (इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान) पर ज़ोर दिये जाने के बाद संयुक्त राष्ट्र को 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान' द्वारा नियुक्त राजदूत गुलाम इसाकजई की मान्यता जारी रखने का फैसला भी करना होगा।
  • वर्ष 1996 में पिछली बार जब तालिबान ने काबुल में सत्ता संभाली थी तब संयुक्त राष्ट्र ने इसके शासन को मान्यता देने से मना कर दिया था और पिछली रब्बानी सरकार द्वारा नामित राजदूत की ही मान्यता जारी रखी थी।

चुनौतियाँ:

  • UNAMA के लिये एक नए जनादेश के साथ तालिबान के प्रभुत्व वाले शासन की ज़मीनी हकीकत को स्वीकार करना चुनौती होगी।
  • यदि संयुक्त राष्ट्र नए शासन को स्वीकार करता है, जो वर्तमान में असंभव प्रतीत होता है, तो यह तालिबान को अपने स्वयं के सदस्यों को हटाने का प्रस्ताव देने का जनादेश देगा क्योंकि अफगानिस्तान यूएनपीआर प्रतिबंध सूची का "केंद्रबिंदु" है।
  • इस तरह का प्रस्ताव अगस्त 2021 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा दिये गए उसके बयान के विरुद्ध भी होगा जिसमें दृढ़ता से कहा गया था कि सदस्य "इस्लामिक अमीरात की बहाली का समर्थन नहीं करते हैं"।

भारत के लिये प्रतिबंधों का महत्त्व:

  • सिराजुद्दीन हक्कानी से संबंधित रिपोर्ट भारत के लिये महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि वह और उसके पिता जलालुद्दीन हक्कानी द्वारा स्थापित हक्कानी समूह 2008 और 2009 में काबुल में भारतीय दूतावास में हुए बम विस्फोटों के लिये वांछित है।
  • नवंबर 2012 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष के रूप में यह सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी कि हक्कानी समूह को एक आतंकवादी इकाई के रूप में नामित किया जाए।
  • भारत ने यह सुनिश्चित करने के लिये कई देशों के साथ काम किया था कि इस समूह को संयुक्त राष्ट्र की संकल्प 1988 समिति/तालिबान प्रतिबंध समिति की सूची के साथ-साथ अमेरिका में प्रतिबंधित किया जाए।  इसी के परिणामस्वरूप एक ही समय में इसे विदेशी आतंकवादी संगठन नामित किया गया था।
  • तालिबान प्रमुख हैबतुल्लाह अखुंदजादा के डिप्टी सिराजुद्दीन हक्कानी का अब अफगानिस्तान की अगली सरकार में काफी प्रभाव होने की संभावना है।
  • उसके भाई अनस हक्कानी, जिसे 2014 में समूह के आतंकी हमलों के वित्तपोषण के लिये गिरफ्तार किया गया था और 2019 में बगराम जेल से बंधक स्वैप के हिस्से के रूप में रिहा किया गया था, अब काबुल में सरकार गठन वार्ता में मुख्य वार्ताकारों में से एक है।

संकल्प 1988 समिति/तालिबान प्रतिबंध समिति

पृष्ठभूमि:

  • संकल्प 1267 (1999) के अनुसार, वर्ष 1999 में UNSC समिति की स्थापना की गई थी, जिसने तालिबान पर एक सीमित हवाई प्रतिबंध लगाने और संपत्ति को फ्रीज करने का कार्य किया। समय के साथ ये उपाय एक लक्षित तरीके से संपत्ति को फ्रीज करने, यात्रा पर प्रतिबंध लगाने और नामित व्यक्तियों तथा संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाने के साधन बन गए।
  • जून 2011 में संकल्प 1988 (2011) को अपनाने के बाद समिति दो भागों में विभाजित हो गई।
    • संकल्प 1267 समिति को अब अल-कायदा प्रतिबंध समिति के रूप में जाना जाता था, जिसे अल-कायदा से जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करने के निर्देश दिये गए।
    • तालिबान से जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी के लिये संकल्प 1988 (2011) के अनुसार एक अलग समिति की स्थापना की गई थी।

समिति के विषय में:

  • समिति में सुरक्षा परिषद के सभी 15 सदस्य शामिल हैं और यह सर्वसम्मति से निर्णय लेती है। 31 दिसंबर, 2021 को समाप्त होने वाली अवधि के लिये समिति का वर्तमान अध्यक्ष भारत है।
  • समिति के कार्य ISIL (दाएश), अल-कायदा व तालिबान और संबंधित व्यक्तियों तथा संस्थाओं संबंधी संकल्प 1526 (2004) व 2253 (2015) के अनुसार, विश्लेषणात्मक समर्थन एवं प्रतिबंध निगरानी टीम (Analytical Support and Sanctions Monitoring Team) द्वारा समर्थित हैं।

समिति को निर्दिष्ट कार्य:

  • प्रतिबंध उपायों के कार्यान्वयन की निगरानी करना।
  • प्रासंगिक प्रस्तावों में निहित लिस्टिंग मानदंडों को पूरा करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को नामित करना।
  • प्रतिबंध से संबंधित मापदंडों में छूट के लिये अधिसूचनाओं और अनुरोधों पर विचार करना तथा उन पर निर्णय लेना।
  • 1988 की प्रतिबंध सूची से किसी नाम को हटाने के अनुरोधों पर विचार करना और उन पर निर्णय लेना।
  • 1988 की प्रतिबंध सूची की प्रविष्टियों की आवधिक और विशिष्ट समीक्षा करना।
  • निगरानी टीम द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट की जाँच करना।
  • प्रतिबंध लगाने संबंधी मापदंडों के कार्यान्वयन पर सुरक्षा परिषद को समय-समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत करना।

स्रोत: द हिंदू

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