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सामाजिक न्याय

भारतीय जेलों में जाति आधारित भेदभाव

  • 06 Jan 2024
  • 11 min read

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों? 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने हाल ही में एक जनहित याचिका (PIL) पर केंद्र और 11 राज्यों को नोटिस जारी किया, जिसमें कारागारों/जेलों में कैदियों के साथ जाति-आधारित भेदभाव एवं अलगाव का आरोप लगाया गया था तथा राज्य जेल मैनुअल के तहत उन प्रावधानों को निरस्त करने के निर्देश देने की मांग की गई थी जो इस तरह की प्रथाओं को अनिवार्य करते हैं।

PIL में उजागर किये गए जाति आधारित भेदभाव के कौन-से उदाहरण हैं?

  • भेदभाव के उदाहरण:
    • जनहित याचिका मध्य प्रदेश, दिल्ली और तमिलनाडु की जेलों के उदाहरणों को उजागर करती है, जहाँ खाना पकाने का काम प्रमुख जातियों को आवंटित किया जाता है, जबकि “विशिष्ट निचली जातियों” को झाड़ू लगाने और शौचालयों की सफाई जैसे छोटे काम सौंपे जाते हैं।
      • भारत में जेल प्रणाली पर भेदभावपूर्ण प्रथाओं को कायम रखने का आरोप है, जिसमें जाति पदानुक्रम के आधार पर श्रम का विभाजन और बैरकों का जाति-आधारित अलगाव शामिल है।
    • जाति-आधारित श्रम वितरण को औपनिवेशिक भारत का निशान/अवशेष माना जाता है और इसे अपमानजनक एवं कष्टकर माना जाता है, जो कैदियों के सम्मान के साथ जीवन के अधिकार का उल्लंघन करता है।
  • राज्य जेल मैनुअल मंज़ूरी:
    • याचिका में दावा किया गया है कि विभिन्न राज्यों में जेल मैनुअल, जेल प्रणाली के भीतर जाति-आधारित भेदभाव और जबरन श्रम को मंज़ूरी देते हैं।
      • राजस्थान कारागार नियम, 1951:
        • इस नियम के तहत जाति के आधार पर मेहतरों को शौचालयों और ब्राह्मणों को रसोईयों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।
      • तमिलनाडु में पलायमकोट्टई सेंट्रल जेल:
        • याचिका में तमिलनाडु के पलायमकोट्टई सेंट्रल जेल में कैदियों के जाति-आधारित अलगाव को उजागर किया गया है, जो थेवर, नादर और पल्लार को अलग-अलग वर्गों में विभाजित करने का संकेत देते हैं।
      • पश्चिम बंगाल जेल कोड:
        • मेथर या हरि जाति, चांडाल और अन्य जातियों के कैदियों को झाड़ू-पोंछा लगाने जैसे छोटे-मोटे काम सौंपने के मामले।
    • मॉडल जेल मैनुअल दिशानिर्देश, 2003:
    • याचिका में वर्ष 2003 के मॉडल जेल मैनुअल का हवाला दिया गया है, जिसमें सुरक्षा, अनुशासन और संस्थागत कार्यक्रमों के आधार पर वर्गीकरण के लिये दिशानिर्देशों पर ज़ोर दिया गया है।
      • यह सामाजिक-आर्थिक स्थिति, जाति या वर्ग के आधार पर किसी भी वर्गीकरण के खिलाफ तर्क देता है।
  • मौलिक अधिकार:
    • याचिका में कैदियों के मौलिक अधिकारों पर सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन (1978) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए तर्क दिया गया है कि केवल कैदी होने से कोई व्यक्ति मौलिक अधिकार या समानता कोड नहीं खो देता है।
  • भेदभावपूर्ण प्रावधानों को निरस्त करने का आह्वान:
    • याचिका में कैदियों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और जेल प्रणाली के भीतर समानता का समर्थन करते हुए, राज्य जेल मैनुअल में भेदभावपूर्ण प्रावधानों को निरस्त करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

जेलों में जातिगत भेदभाव पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ क्या हैं?

  • भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने पाया कि 10 से अधिक राज्य जेल मैनुअल जाति-आधारित भेदभाव और जबरन श्रम का समर्थन करते हैं।
    • राज्यों में उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, केरल, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, पंजाब और तमिलनाडु शामिल हैं।
  • जाति-आधारित भेदभाव, अलगाव और जेलों के अंदर विमुक्त जनजातियों के साथ “आदतन अपराधियों (habitual offenders)” के रूप में व्यवहार को SC द्वारा “बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा” माना जाता है।
    • SC ने कथित भेदभावपूर्ण प्रथाओं के त्वरित और व्यापक समाधान की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
  • SC ने नोटिस भेजकर याचिका पर राज्यों और केंद्र से चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा।

कानून भारतीय जेलों के अंदर जातिगत भेदभाव की अनुमति कैसे देते हैं?

  • औपनिवेशिक नीतियों की विरासत:
    • औपनिवेशिक विरासत में निहित भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली मुख्य रूप से सुधार या पुनर्वास के बजाय सज़ा पर ध्यान केंद्रित करती है।
    • लगभग 130 वर्ष पुराना ‘जेल अधिनियम,1894’, कानूनी ढाँचे की पुरानी प्रकृति को रेखांकित करता है।
      • इस अधिनियम में कैदियों के सुधार और पुनर्वास के लिये प्रावधानों का अभाव है।
    • मौजूदा कानूनों में कमियों को पहचानते हुए, गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs-MHA) ने ‘जेल अधिनियम, 1894’, ‘कैदी अधिनियम, 1900’ और ‘कैदी स्थानांतरण अधिनियम, 1950’ की समीक्षा की।
      • इस समीक्षा से प्रासंगिक प्रावधानों को भविष्योन्मुखी ‘आदर्श कारागार अधिनियम, 2023’ में शामिल किया गया।
        • आदर्श कारागार अधिनियम, 2023 के प्रभावी कार्यान्वयन, जिसे मई 2023 में गृह मंत्रालय द्वारा अंतिम रूप दिया गया था, से जेल की स्थितियों और प्रशासन में सुधार एवं कैदियों के मानवाधिकारों तथा गरिमा की रक्षा की उम्मीद है।
  • जेल नियमावली:
    • राज्य-स्तरीय जेल मैनुअल, आधुनिक जेल प्रणाली की स्थापना के बाद से काफी हद तक अपरिवर्तित, औपनिवेशिक और जातिगत दोनों मानसिकताओं को दर्शाते हैं।
    • मौजूदा जेल मैनुअल जाति व्यवस्था के केंद्रीय आधार को लागू करते हैं, जिसमें शुद्धता और अशुद्धता की धारणा पर ज़ोर दिया जाता है।
      • राज्य जेल मैनुअल में कहा गया है कि सफाई और झाडू लगाने जैसे कर्त्तव्यों को विशिष्ट जातियों के सदस्यों द्वारा किया जाना चाहिये, जिससे जाति-आधारित भेदभाव कायम रहता है।
        • जेल मैनुअल, जैसे कि पश्चिम बंगाल में धारा 741 के तहत, सभी कैदियों के लिये भोजन पकाने और ले जाने पर “सवर्ण हिंदुओं” के एकाधिकार की रक्षा करते हैं।
    • छुआछूत के खिलाफ संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के बावजूद, जेल प्रशासन में जाति-आधारित नियम कायम हैं।
  • मैनुअल स्कैवेंजर्स के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013:
    • 2013 के अधिनियम में मैनुअल स्कैवेंजर्स की प्रथा पर प्रतिबंध के बावजूद, यह स्पष्ट रूप से जेल प्रशासन को शामिल नहीं करता है; इस प्रकार, जेल मैनुअल जो जेलों में जातिगत भेदभाव और मैला ढोने की अनुमति देता है, अधिनियम का उल्लंघन नहीं हैं।
      • मैनुअल स्कैवेंजिंग से आशय शुष्क शौचालयों, खुली नालियों और सीवरों से मानव मल और अन्य अपशिष्ट पदार्थों को मैन्युअल रूप से साफ करने, संभालने और निपटाने की प्रथा से है।

आगे की राह 

  • राज्यों को वर्ष 2015 में नेल्सन मंडेला नियमों के आधार पर गृह मंत्रालय द्वारा जारी मॉडल जेल मैनुअल, 2016 को अपनाना चाहिये।
    • संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2015 में नेल्सन मंडेला नियमों को अपनाया, जिसमें सभी कैदियों के लिये सम्मान एवं गैर-भेदभाव पर बल दिया गया।
  • न्यायालयों को भेदभावपूर्ण प्रावधानों को समाप्त करने, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा जेल प्रणाली में समानता को बढ़ावा देने के लिये न्यायिक हस्तक्षेप पर विचार करना चाहिये।
  • सुधारों के कार्यान्वयन पर नज़र रखने के लिये प्रभावी ट्रैकिंग उपकरण प्रदान करना साथ ही बेहतर  न्यायपूर्ण जेल प्रणाली के निर्माण के लिये अधिकारियों को ज़िम्मेदार बनाया है।

  यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष प्रश्न  

मेंस:

प्रश्न1. “जाति व्यवस्था नई पहचान के साथ सहयोगी रूप धारण कर रही है। इसलिये भारत में जाति व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता।” टिप्पणी कीजिये। (2018)

प्रश्न2. स्वतंत्रता के बाद से अनुसूचित जनजातियों (ST) के खिलाफ भेदभाव को संबोधित करने के लिये राज्य द्वारा दो प्रमुख कानूनी पहल क्या हैं? (2017)

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