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एडिटोरियल

  • 25 May, 2023
  • 19 min read
भारतीय समाज

आर्थिक दुर्व्यवहार: घरेलू दुर्व्यवहार का एक उपेक्षित पहलू

यह एडिटोरियल 23/05/2023 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित ‘‘No Way Out’’ लेख पर आधारित है। इसमें महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा के एक रूप आर्थिक हिंसा या उत्पीड़न के बारे में चर्चा की गई है जिस पर बहुत कम विमर्श हुआ है।

प्रिलिम्स के लिये:

घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDV अधिनियम), केंद्रीय पीड़ित मुआवजा निधि (CVCF), महिला पुलिस स्वयंसेवक (MPV), राष्ट्रीय महिला आयोग

मेन्स के लिये:

आर्थिक शोषण: योगदान करने वाले कारक, सरकार की पहल और आगे की राह

घरेलू हिंसा (Domestic Violence) के बारे में आम समझ यह है कि यह स्त्रियों के विरुद्ध शारीरिक एवं यौन प्रकृति की हिंसा है जो प्रायः उनके अंतरंग साथी द्वारा की जाती है। घरेलू हिंसा के एक अन्य रूप आर्थिक हिंसा (Economic Violence) के बारे में अधिक बात नहीं की जाती है, जबकि यह हिंसा या उत्पीड़न का एक अधिक कपटपूर्ण तरीका है जो अपने कार्यकरण की शैली में प्रायः प्रत्यक्ष नज़र नहीं आता।

आर्थिक उत्पीड़न (Economic Abuse) भी शारीरिक उत्पीड़न,यौन उत्पीड़न औरभावनात्मक उत्पीड़न से गहनता से संबद्ध है।आर्थिक उत्पीड़न के सबसे आम रूप हैं- महिलाओं पर रुपए-पैसे के मामले में भरोसा नहीं करना, उन्हें बाहर कार्य करने की अनुमति नहीं देना औरउन्हें घर खर्च के लिये पर्याप्त धन नहीं सौंपना।

आर्थिक उत्पीड़न पर समाज का अधिक ध्यान नहीं पड़ना आश्चर्यजनक नहीं है, जहाँ मुख्यधारा समाज में महिलाओं, बच्चों और क्वीयर (queer) व्यक्तियों के विरुद्ध हिंसा की सबसे आम धारणाएँ शारीरिक या यौन संदर्भ में प्रचलित हैं। जबकि भारतीय कानून में घरेलू हिंसा के विरुद्ध विशेष कानूनघरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005’ (PWDV Act) के अंतर्गत ‘आर्थिक उत्पीड़न’ (economic abuse) को चिह्नित किया गया है, आर्थिक संदर्भ में हिंसा या उत्पीड़न सार्वजनिक चेतना का अंग उस तरह नहीं बन सका है जैसे अंतरंग साथी द्वारा यौन एवं शारीरिक प्रकृति की हिंसा को देखा जाता है।

आर्थिक उत्पीड़न क्या है?

  • परिचय:
    • PWDV अधिनियम के तहत, आर्थिक उत्पीड़न को ऐसे सभी या किसी भी आर्थिक या वित्तीय संसाधनों से वंचित करने के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसके लिये पीड़ित महिला किसी भी कानून के तहत हक़दार है।
    • कानून के तहत, पीड़ित महिला जिन संसाधनों या सुविधाओं का उपयोग करने की हक़दार है, उन तक उनकी निरंतर पहुँच पर रोक या प्रतिबंध को भी आर्थिक उत्पीड़न माना गया है।
    • इसके अलावा, गृहस्थी की चीजबस्त का व्ययन, चल या अचल परिसंपत्ति, ऐसे कीमती सामान या अन्य संपत्ति जिसमें पीड़ित महिला का हित शामिल है आदि का कोई संक्रामण (alienation) भी आर्थिक उत्पीड़न के तहत शामिल किया गया है।
    • विशेष रूप से भारतीय संदर्भ में, आर्थिक उत्पीड़न दहेज और स्त्रीधन के दोहन जैसे संबंधित विषयों को भी दायरे में लेता है।
      • स्त्रीधन वह है जो एक महिला अपने जीवनकाल में प्राप्त करती है। स्त्रियों को स्त्रीधन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त है।
    • इसके अलावा, न्यायालयों ने माना है कि महिला को आर्थिक या वित्तीय संसाधनों या स्त्रीधन से वंचित करना PWDV अधिनियम के तहत परिभाषित घरेलू हिंसा के समान है।
    • अधिनियम में यह प्रावधान भी किया गया है कि पीड़ित महिला के पक्ष में एक संरक्षण आदेश पारित किया जा सकता है और प्रत्यर्थी को ऐसी आस्तियों के अन्य संक्रामण, बैंक लॉकरों एवं बैंक खातों के प्रचालन (वह एकल स्वामित्व में हो या संयुक्त स्वामित्व में) आदि से प्रतिषिद्ध किया जा सकता है।
      • इसमें पीड़ित महिला का स्त्रीधन या दोनों पक्षों द्वारा संयुक्त रूप से या एकल रूप से धारित कोई अन्य संपत्ति भी शामिल है।
  • प्रभाव: आर्थिक हिंसा महिलाओं को वास्तविक रूप से स्वतंत्र होने से रोकती है, अपने जीवन के संबंध में निर्णय लेने की उनकी क्षमता को बाधित करती है और प्रायः अपमानजनक स्थितियों से बाहर निकल सकने या उत्पीड़नकर्त्ता (abuser) से अलग हो सकने की उनकी अक्षमता में एक प्रमुख योगदानकर्त्ता है।
    • मुंबई में अनौपचारिक बस्तियों में किये गए एक क्रॉस-सेक्शनल सर्वेक्षण में 23%कभी भी विवाहित रही महिलाओं ने आर्थिक उत्पीड़न के कम से कम एक रूप से पीड़ित होने की सूचना दी।आर्थिक उत्पीड़न मध्यम-गंभीर अवसाद (depression),दुश्चिंता (anxiety) औरआत्मघाती विचार (suicidal ideation) की संभावना से भी स्वतंत्र रूप सेसंबद्ध पाया गया।
  • भारत में आर्थिक उत्पीड़न का परिदृश्य:
    • वर्ष 2022 में एक प्रमुख भारतीय बीमा कंपनी टाटा एआईए (Tata AIA) द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि 59 प्रतिशत कामकाजी महिलाएँ अपने वित्तीय निर्णय स्वयं नहीं लेती हैं, जो भारतीय महिलाओं की वित्तीय निर्भरता की सीमा को दर्शाता है।
    • NFHS 5 में पाया गया कि 32% विवाहित महिलाओं (18-49 वर्ष) ने शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा का अनुभव किया। वैवाहिक हिंसा का सबसे आम प्रकार शारीरिक हिंसा (28%) है; इसके बाद भावनात्मक हिंसा और यौन हिंसा का स्थान है।
    • अखिल भारतीय लोकतांत्रिक महिला संघ (All-India Democratic Women's Association) द्वारा वर्ष 2017 में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि 72% महिलाओं ने अपने जीवनकाल में किसी न किसी रूप में आर्थिक उत्पीड़न का अनुभव किया था।

आर्थिक उत्पीड़न के कुछ आम उदाहरण 

  • नौकरी प्राप्त करने या नौकरी में बने रहने, शिक्षा प्राप्त करने या संपत्ति अर्जित करने से अवरुद्ध किया जाना।
  • धन, बैंक खाते, क्रेडिट कार्ड तक पहुँच या वित्तीय स्वायत्तता को नियंत्रित करना।
  • उनके वेतन और अन्य आर्थिक संसाधनों का दोहन करना, जैसे कि उनकी सहमति के बिना उनका धन खर्च करना, ऋण सृजन या उनका सामान ले लेना।
  • संपत्ति, उत्तराधिकार या दहेज के पीड़िता के अधिकार से उसे वंचित करना।
  • भोजन, वस्त्र, आवास, दवा या व्यक्तिगत स्वच्छता उत्पादों जैसी आवश्यकताओं से उन्हें वंचित रखना।

आर्थिक उत्पीड़न के उच्च प्रसार में योगदान करने वाले कारक 

  • पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण:आर्थिक उत्पीड़न प्रायः पितृसत्तात्मक मानदंडों में निहित होता है जो पुरुषों को घर और समाज में महिलाओं पर अधिक वरीयता देता है। महिलाओं को शिक्षा, रोज़गार और संपत्ति के अधिकारों तक पहुँचने में भेदभाव एवं बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है, जो उन्हें अपने पुरुष साथियों पर अधिक निर्भर बनाता है।
  • महिलाओं के लिये आर्थिक अवसरों का अभाव:भारत में महिलाओं को प्रायः शिक्षा और रोज़गार के अवसरों तक पहुँच से वंचित रखा जाता है। यह उन्हें आर्थिक रूप से अपने पति पर अधिक निर्भर बनाता है, जो फिर उन्हें आर्थिक उत्पीड़न के लिये अधिक भेद्य/संवेदनशील बना सकता है।
  • जागरूकता की कमी: आर्थिक उत्पीड़न की शिकार महिलाएँ इसे घरेलू हिंसा के रूप में चिह्नित कर सकने में अक्षम हो सकती हैं या सहायता प्राप्त कर सकने के अपने अधिकारों एवं विकल्पों के बारे में अनभिज्ञ हो सकती हैं।
  • सामाजिक कलंक:आर्थिक उत्पीड़न को सांस्कृतिक या धार्मिक विश्वासों द्वारा सामान्यीकृत किया जा सकता है या उचित ठहराया जा सकता है, जो पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग भूमिकाएँ एवं उत्तरदायित्व सौंपते हैं। यह पीड़िताओं को मदद मांगने या उत्पीड़न की रिपोर्ट करने से हतोत्साहित कर सकता है।

आर्थिक उत्पीड़न के विरुद्ध उपलब्ध सुरक्षा उपाय 

  • घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम (PWDVA) 2005, जो आर्थिक हिंसा को व्यापक रूप से परिभाषित करता है और पीड़ित महिलाओं के लिये मौद्रिक राहत, मुआवजा एवं संरक्षण आदेश का उपबंध करता है।
  • दंड प्रक्रिया संहिता 1973, जो न्यायालयों को उन पत्नियों, बच्चों और माता-पिताओं के भरण-पोषण का आदेश देने का अधिकार सौंपती है, जिनकी उनके पति, पिता या पुत्रों द्वारा उपेक्षा की जाती है।
  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (2005 में संशोधित), जो संयुक्त परिवार की संपत्ति में पुत्रियों एवं पुत्रों को समान अधिकार प्रदान करता है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग, जो राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष संस्था है जिसे महिलाओं के हितों की रक्षा एवं संवर्द्धन का कार्य सौंपा गया है।
  • महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MoW&CD) ने गृह मंत्रालय के सहयोग से राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में महिला पुलिस कार्यकर्त्ताओं (MPVs) को संलग्न करने की परिकल्पना की है जो पुलिस और समुदाय के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करती हैं तथा संकट का सामना कर रही महिलाओं की मदद करती हैं।
  • MoW&CD ने ‘सखी’ डैशबोर्ड लॉन्च किया है। यह वन स्टॉप सेंटर्स (OSCs) और महिला हेल्प लाइन्स (WHLs) के कार्यकारियों के लिये एक ऑनलाइन मंच है, जो उनके पास आने वाले हिंसा प्रभावित महिलाओं के मामलों के साथ-साथ उनके स्थापन के बारे में विभिन्न महत्त्वपूर्ण सूचनाओं के संग्रहण एवं उन्हें देख सकने की सुविधा प्रदान करता है।
  • दूरसंचार विभाग ने सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को महिला हेल्पलाइन के लिये 181 नंबर आवंटित किया है।
  • रेल मंत्रालय ने एकीकृत आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रबंधन प्रणाली (Integrated Emergency Response Management System) शुरू की है जिसका उद्देश्य सुरक्षा हेल्पलाइन, चिकित्सा सुविधाओं, RPF एवं पुलिस, CCTV कैमरों की स्थापना आदि के साथ रेलवे के सुरक्षा नियंत्रण कक्षों को सुदृढ़ करने के माध्यम से सभी रेलवे स्टेशनों पर महिला यात्रियों को चौबीसों घंटे सुरक्षा प्रदान करना है। 
  • गृह मंत्रालय ने CrPC की धारा 357A के तहत केंद्रीय पीड़ित मुआवजा निधि (CVCF) स्थापित की है। यह उन पीड़िताओं (बलात्कार और एसिड अटैक की शिकार पीड़िताओं सहित) या उनके आश्रितों को मुआवजे के लिये धन उपलब्ध कराने में राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों का समर्थन करेगी, जिन्हें अपराधों के परिणामस्वरूप हानि हुई है या आघात लगा है।

आर्थिक उत्पीड़न को कम करने के लिये और क्या किया जा सकता है?

  • जागरूकता बढ़ाना: आर्थिक घरेलू उत्पीड़न के बारे में जनजागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। शैक्षिक अभियान, सामुदायिक कार्यक्रम और मीडिया पहल समझ को बढ़ावा देने, चेतावनी के संकेतों को पहचानने और इस तरह के उत्पीड़न की रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करने में मदद कर सकते हैं।
  • महिलाओं के लिये उपलब्ध सुरक्षा उपायों के विकल्पों को बढ़ावा देने और इन्हें महिलाओं के बीच मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है।
  • कानूनी सुरक्षा को सुदृढ़ करना: हालाँकि सरकार ने महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिये PWDV अधिनियम लागू किया है, लेकिन यह कमोबेश एक शक्तिहीन अधिनियम ही बना हुआ है। सरकार को अधिनियम में कड़े दंड प्रावधानों को शामिल करना चाहिये ताकि यह उत्पीड़न करने वालों के लिये एक निवारक के रूप में कार्य कर सके।
  • सहायता सेवाएँ प्रदान करना: आर्थिक घरेलू उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को विशेष सहायता सेवाओं तक पहुँच की आवश्यकता होती है। इसमें परामर्श, कानूनी सहायता, वित्तीय सलाह और सुरक्षित आवास या रोज़गार खोजने में सहायता करना शामिल हो सकती है।
  • इस समस्या से संघर्ष के लिये नारी फाउंडेशन, शक्ति वाहिनी फाउंडेशन जैसे गैर-सरकारी संगठनों का सहयोग लिया जाना चाहिये जो इस क्षेत्र में असाधारण कार्य कर रहे हैं।
  • पीड़िताओं को सशक्त बनाना: पीड़िताओं के आर्थिक रूप से स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनने के लिये उन्हें सशक्त बनाना महत्त्वपूर्ण है। व्यावसायिक प्रशिक्षण, शैक्षिक अवसर और रोज़गार प्रदाता कार्यक्रमों तक पहुँच प्रदान करने से इन पीड़िताओं को अपने जीवन का पुनर्निर्माण कर सकने और नियमित रोज़गार सुरक्षित कर सकने के लिये आवश्यक कौशल प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
  • महिलाओं के खाते में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) इस मुद्दे को हल करने का एक प्रमुख भाग रहा है। इस तरह की अन्य योजनाएँ स्वागत योग्य होंगी।
  • वित्तीय संस्थानों के साथ सहयोगः यद्यपि महिलाओं को कम लागत वाले ऋण प्रदान करने की योजनाएँ मौजूद हैं, लेकिन वितरित ऋणों की संख्या बहुत कम है। आर्थिक उत्पीड़न को रोकने में बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान उल्लेखनीय भूमिका निभा सकते हैं। आर्थिक उत्पीड़न के संकेतों को पहचानने के लिये कर्मचारियों हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम लागू करना, संदिग्ध लेनदेन की रिपोर्ट करने के लिये प्रोटोकॉल विकसित करना और ग्राहकों को वित्तीय साक्षरता संसाधन प्रदान करना— ये सभी आर्थिक घरेलू उत्पीड़न को कम करने में योगदान कर सकते हैं।
  • अनुसंधान और डेटा संग्रह: आर्थिक उत्पीड़न के प्रसार, कारणों एवं परिणामों को समझने के लिये अनुसंधान और डेटा संग्रह में निवेश करना आवश्यक है। यह सूचना नीतियों, हस्तक्षेपों और संसाधन आवंटन को सूचना-संपन्न बनाने में मदद कर सकती है।
  • लैंगिक समानता और सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन को बढ़ावा देना: अंतर्निहित लैंगिक असमानताओं को दूर करना और हानिकारक सामाजिक मानदंडों को चुनौती देना आर्थिक घरेलू उत्पीड़न को कम करने के लिये अत्यंत मूलभूत है। शिक्षा, जागरूकता अभियान और सामुदायिक संलग्नता के माध्यम से लैंगिक समानता को बढ़ावा देना दीर्घकालिक रोकथाम प्रयासों में योगदान कर सकता है।
  • अभ्यास प्रश्न: आर्थिक उत्पीड़न घरेलू हिंसा का एक रूप है जिस पर शायद ही कभी चर्चा की जाती है। इसकी व्यापकता में योगदान करने वाले कारकों और पीड़िताओं पर इसके प्रभाव पर विचार कीजिये। उन रणनीतियों के सुझाव भी दें जिन्हें प्रभावी ढंग से जागरूकता बढ़ाने, आर्थिक उत्पीड़न को रोकने और इन्हें संबोधित करने के लिये अपनाया जा सकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)  

प्रश्न. हमें देश में महिलाओं के प्रति यौन-उत्पीड़न के बढ़ते हुए दृष्टांत दिखाई दे रहे हैं। इस कुकृत्य के विरुद्ध विद्यमान विधिक उपबन्धों के होते हुए भी, ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। इस संकट से निपटने के लिये कुछ नवाचारी उपाय सुझाइए। (2014)


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