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एडिटोरियल

  • 20 Jun, 2020
  • 18 min read
सामाजिक न्याय

मानसिक स्वास्थ्य: अवसंरचना निर्माण की आवश्यकता

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में मानसिक स्वास्थ्य अवसंरचना के निर्माण व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-WHO) द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, तकरीबन 7.5 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी रूप में अवसाद से ग्रस्त हैं। इतना ही नहीं WHO के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2020 तक भारत की लगभग 20 प्रतिशत आबादी मानसिक रोगों से पीड़ित होगी। बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत द्वारा अवसाद से ग्रस्त होने के कारण आत्महत्या कर लेने की घटना ने मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं के विस्तृत अध्ययन और उसके समाधान को पुनः विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

मानसिक रोगियों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद भी अब तक भारत में इसे एक रोग के रूप में पहचान नहीं मिल पाई है, आज भी यहाँ मानसिक स्वास्थ्य की पूर्णतः उपेक्षा की जाती है और इसे काल्पनिक माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि जिस प्रकार शारीरिक रोग हमारे लिये हानिकारक हो सकते हैं उसी प्रकार मानसिक रोग भी हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। 

इस आलेख में मानसिक स्वास्थ्य, भारत में मानसिक स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ, समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अवधारणा तथा सरकार के प्रयासों का विश्लेषण किया जाएगा।

मानसिक स्वास्थ्य से तात्पर्य 

  • मानसिक स्वास्थ्य में हमारा भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कल्याण शामिल होता है। यह हमारे सोचने, समझने, महसूस करने और कार्य करने की क्षमता को प्रभावित करता है।
  • गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी स्वास्थ्य संबंधी परिभाषा में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी शामिल करता है। 
  • मानसिक विकार में अवसाद (Depression) दुनिया भर में सबसे बड़ी समस्या है।
  • कई शोधों में यह सिद्ध किया जा चुका है कि अवसाद, ह्रदय संबंधी रोगों का मुख्य कारण है। 
  • मानसिक विकार कई सामाजिक समस्याओं जैसे- बेरोज़गारी, गरीबी और नशाखोरी आदि को जन्म देती है। 

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति

  • हाल ही में इंडिया स्टेट लेवल डिज़ीज़ बर्डन इनिशिएटिव (India State-Level Disease Burden Initiative) द्वारा भारत में मानसिक विकारों के संबंध में एक अध्ययन किया गया जिसे लांसेट साइकाइट्री (Lancet Psychiatry) में प्रकाशित किया गया।
  • इसके अनुसार, अवसाद तथा चिंता भारत में मानसिक विकारों के प्रमुख कारण हैं तथा इनका प्रभाव दक्षिणी राज्यों और महिलाओं में अधिक है। इसके अलावा इसमें लगातार वृद्धि हो रही है।
  • लगभग प्रत्येक 7 में से 1 भारतीय या कुल 19 करोड़ 70 लाख लोग विभिन्न प्रकार के मानसिक विकारों से ग्रसित हैं।
  • वर्ष 2017 में देश में लगभग 76 लाख लोग बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar Disorder) से ग्रसित थे। इसका सर्वाधिक प्रभाव गोवा, केरल, सिक्किम तथा हिमाचल प्रदेश में देखा गया।
  • वर्ष 2018 में लगभग 35 लाख लोग सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) से ग्रसित थे। इसका प्रभाव गोवा, केरल, तमिलनाडु तथा दिल्ली में सर्वाधिक था। 
  • भारत में कुल बीमारियों में मानसिक विकारों की हिस्सेदारी विकलांगता समायोजित जीवन वर्ष (Disability Adjusted Life Years- DALY) के अनुसार, वर्ष 1990 में 2.5 प्रतिशत थी तथा वर्ष 2017 में यह बढ़कर 4.7 प्रतिशत हो गई। 
  • यहाँ 1 DALY का आशय स्वस्थ जीवन में एक वर्ष की कमी से है।
  • वर्ष 2018 में भारत में मानसिक विकार DALY के सभी मामलों में 33.8% लोग अवसाद (Depression), 19% लोग एंग्जायटी डिसऑर्डर (Anxiety Disorder), 10.8% लोग इडियोपथिक डेवलपमेंटल इंटेलेक्चुअल डिसेबिलिटी (Idiopathic Developmental Intellectual Disability) तथा 9.8% लोग सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) से ग्रसित थे।
  • इस अध्ययन में राज्यों को सामाजिक-जनांकिकीय इंडेक्स (Socio-Demographic Index- SDI) के आधार पर तीन वर्गों- निम्न, मध्यम, तथा उच्च में विभाजित किया गया।
  • SDI के मापन में राज्य की प्रतिव्यक्ति आय, औसत शिक्षा, 25 वर्ष से कम आयु की महिलाओं में प्रजनन दर जैसे पैमानों को अपनाया गया।
  • उच्च SDI वाले राज्यों जैसे- तमिलनाडु, केरल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र तथा तेलंगाना में अवसाद एवं एंग्जायटी की समस्या से सर्वाधिक ग्रसित लोग थे।

मानसिक विकार के कारण

  • मानसिक विकार का एक महत्त्वपूर्ण कारक आनुवंशिक होता है। मनोविक्षिप्त या साइकोसिस, सिज़ोफ्रेनिया इत्यादि रोग उन लोगों में अधिक पाए जाते हैं, जिनके परिवार का कोई सदस्य इनसे पीड़ित होता है। ऐसे व्यक्ति के बच्चों में यह खतरा लगभग दोगुना हो जाता है।
  • मानसिक विकार की एक वजह शारीरिक परिवर्तन भी माना जाता है। दरअसल किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था, गर्भ-धारण जैसे शारीरिक परिवर्तन के कारण मानसिक विकार की संभावना बढ़ जाती है। 
  • मनोवैज्ञानिक कारणों को आज के समय में इसकी मुख्य वजह मानी जा रही है। उदाहरण के लिये  आपसी संबंधों में टकराहट, किसी निकटतम व्यक्ति की मृत्यु, सम्मान को ठेस, आर्थिक हानि, तलाक, परीक्षा या प्रेम में असफलता इत्यादि।
  • सहनशीलता का अभाव, बाल्यावस्था के अनुभव, खतरनाक किस्म के विडियोगेम, तनावपूर्ण परिस्थितियाँ और इनका सामना करने की असमर्थता मानसिक विकार के लिये जिम्मेदार मानी जा रही हैं।

समाज में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अवधारणा

  • वस्तुतः जिस समाज में हम रहते हैं वहाँ सार्वजनिक और निजी दोनों स्तरों पर मानसिक बीमारी (Mental illness) हमेशा से एक उपेक्षित मुद्दा रही है।  इसके विषय में न केवल समाज का रवैया बेरूखा है बल्कि सरकार की दृष्टि में भी यह एक उपेक्षित विषय ही है।
  • सबसे चिंताजनक बात यह है कि किसी भी मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति को पागल समझा जाता है और उस व्यक्ति को समाज में उपेक्षा भरी नज़रों से देखा जाने लगता है।
  • मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्ति समाज व परिवार के उपेक्षा पूर्ण बर्ताव के कारण अकेलेपन का भी शिकार हो जाता है। अकेलेपन के कारण वह अपने विचारों को दूसरे के साथ साझा नहीं कर पाता है, ऐसी स्थिति में वह व्यक्ति या तो स्वयं को हानि पँहुचाता है या अन्य लोगों को।
  • यदि कोई व्यक्ति एक बार किसी मानसिक रोग से ग्रसित हो जाता है तो जीवन भर उसे इसी तमगे के साथ जीना पड़ता है, चाहे वह उस रोग से मुक्ति पा ले। आज भी भारत में इस प्रकार के लोगों के लिये समाज की मुख्य धारा से जुड़ना काफी चुनौतीपूर्ण होता है।

मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ

  • आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत में महिलाओं की आत्महत्या दर पुरुषों से काफी अधिक है। जिसका मूल घरेलू हिंसा, छोटी उम्र में शादी, युवा मातृत्व और अन्य लोगों पर आर्थिक निर्भरता आदि को माना जाता है। महिलाएँ मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से पुरुषों की अपेक्षा अधिक संवेदनशील होती हैं। परंतु हमारे समाज में यह मुद्दा इतना सामान्य हो गया है कि लोगों द्वारा इस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता।
  • भारत में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विकारों से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियाँ भी एक बड़ी चुनौती है। उदाहरण के लिये भारत में वर्ष 2017 तक आत्महत्या को एक अपराध माना जाता था और भारतीय दंड संहिता के तहत इसके लिये अधिकतम 1 वर्ष के कारावास का प्रावधान किया गया था। जबकि कई मनोवैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि अवसाद, तनाव और चिंता आत्महत्या के पीछे कुछ प्रमुख कारण हो सकते हैं।
  • ध्यातव्य है कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को संबोधित करने के लिये भी भारत के पास आवश्यक क्षमताओं की कमी है। आँकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018 में भारत की विशाल जनसंख्या के लिये मात्र 5,147 मनोचिकित्सक और 2,035 से भी कम ​​मनोवैज्ञानिक मौजूद थे।
  • मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को ठीक ढंग से संबोधित न किये जाने के कारण अर्थव्यवस्था को भी काफी नुकसान का सामना करना पड़ता है। इससे न केवल देश की मानव पूंजी को नुकसान होता है बल्कि प्रभावित व्यक्ति की आर्थिक स्थिति भी खराब हो जाती है, क्योंकि इस रोग के इलाज की जो भी सुविधाएँ उपलब्ध हैं वे अपेक्षाकृत काफी महँगी हैं।
  • WHO के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य विकारों का सर्वाधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ता है और चूँकि भारत की अधिकांश जनसंख्या युवा है इसलिये यह एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आता है।

बजटीय व्यय का अभाव 

  • गौरतलब है कि राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Mental Health Survey - NMHS) 2015-16 के अनुसार, भारत के अधिकांश राज्यों में मानसिक स्वास्थ्य का कुल बजट 1प्रतिशत से भी कम है।
  • इनमें से कुछ राज्य तो ऐसे हैं जिनमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों में स्पष्टता और संपूर्णता की कमी होने के कारण सही दिशा में धन का उपयोग नहीं किया जा रहा है।
  • वर्तमान में केवल गुजरात और केरल दो ही राज्य ऐसे हैं जहाँ मानसिक स्वास्थ्य के लिये अलग बजट की व्यवस्था की गई है।
  • वस्तुतः राज्यों को मानसिक स्वास्थ्य के लिये पृथक बजट की व्यवस्था करने के संबंध में बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं का सटीक कार्यान्वयन, पर्याप्त मात्रा में बजट की उपलब्धता, समय-सीमा, ज़िम्मेदार एजेंसियों और परिणामों की निगरानी के लिये बेहतर प्रबंधन आदि बहुत से ऐसे कारक शामिल हैं।

सरकार के द्वारा किये गए प्रयास 

  • वर्ष 1982 में मानसिक रोग से निपटने के लिये देश में मानसिक देखभाल के आधारभूत ढाँचे के विकास को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (National Mental Health Prograam-NMHP) की शुरूआत की गई।
  • कार्यक्रम की कार्यनीति में वर्ष 2003 में दो योजनाओं राज्य मानसिक अस्पतालों का आधुनिकीकरण और सरकारी मेडिकल कॉलेजों/जनरल अस्पतालों में मनोचिकित्सा विंग को शामिल किया गया।
  • वर्ष 2014 को सरकार ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा की। उल्लेखनीय है कि इस नीति के अंतर्गत जिन बातों को शामिल किया गया उनमें मुख्य रूप से रोगी केंद्रित और प्रगतिशील दृष्टिकोण वाले प्रावधान थे। इसके साथ-साथ इसके अंतर्गत सेवा वितरण और प्रशासन में पारदर्शिता और व्यावसायिकता लाने संबंधी प्रावधानों को भी जगह दी गई।
  • सरकार इस दिशा में आगे बढ़ते हुए वर्ष 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम (Mental Healthcare Act), 2017 लेकर आयी ताकि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत किया जा सके।
  • यह अधिनियम 7 अप्रैल, 2017 को पारित किया गया था तथा यह 7 जुलाई, 2018 से लागू हुआ था। अधिनियम ने 1987 में पारित मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम,1987 का स्थान लिया है।

अन्य प्रयास 

  • सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य प्रोग्राम को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के गैर-संचारी रोगों (non-communicable diseases - NCDs) के फ्लेक्सी पूल (flexi pool) के अंतर्गत शामिल किया गया है।
  • एन.सी.डी. के फ्लेक्सी पूल (flexi pool) हेतु आवंटित राशि को पिछले दो वर्षों में तकरीबन तीन गुना बढ़ाया गया है। यानी अब राज्यों द्वारा केंद्र-प्रायोजित योजनाओं के कोष का उपयोग विशेषज्ञों एवं अन्य सुविधाओं के भुगतान में किया जा सकता है।
  • मानसिक विकार से पीड़ित लोगों की पूर्व जाँच और उनके इलाज के लिये जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में विभिन्न निवारक गतिविधियों को शामिल किया गया है जिसमें स्कूल मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ, कॉलेज परामर्श सेवाएँ, कार्यस्थल पर तनाव कम करने और आत्महत्या रोकथाम सेवाएँ शामिल हैं।

आगे की राह

  • वैश्विक महामारी COVID-19 के दौर में देश में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्या लगातार वृद्धि देखी जा रही है। ऐसे में आवश्यक है कि इससे निपटने के लिये उपर्युक्त क्षमताओं का विकास किया जाए और संसाधनों में वृद्धि की जाए। 
  • यदि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया ऐसे मानसिक रोगग्रस्त लोगों की समस्याओं को संवेदनशील ढंग से उठाएँ तो निश्चय ही समाज का उपेक्षावादी रवैया कमजोर होगा और संवेदनशीलता में वृद्धि होगी।
  • स्वास्थ्य देखभाल राज्य सूची का विषय है और इसलिये इसकी चुनौतियों से निपटने के लिये राज्य और केंद्र के मध्य उचित समन्वय की आवश्यकता है।
  • बजटीय आवंटन की चिंताजनक स्थिति भी मानसिक स्वास्थ्य सुधारों में एक बड़ी बाधा है, ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान तथा अन्य एजेंसियों द्वारा मानसिक समस्याओं से ग्रसित लोगों की पहचान करते हुए, मानसिक रोगों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील तबके के लिये एक निश्चित आय की व्यवस्था कर दिया जाए।

प्रश्न- मानसिक स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं? भारत में मानसिक स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति व मनोविकार के कारणों के उल्लेख करते हुए सरकार के द्वारा किये जा रहे प्रयासों का उल्लेख कीजिये।


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