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एडिटोरियल

  • 17 Sep, 2021
  • 13 min read
भारतीय राजनीति

भारत में प्रतिनिधि न्यायपालिका

यह एडिटोरियल ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में प्रकाशित ‘‘In the Supreme Court, representation matters’’ लेख पर आधारित है। यह भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी के संबंध में चर्चा करता है और आगे की राह सुझाता है।

भारत में पहली बार एक महिला न्यायाधीश के मुख्य न्यायाधीश बनने के अवसर की संभावना प्रबल हुई है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना को यह अवसर वर्ष 2027 में मिलेगा। यह स्वागतयोग्य परिदृश्य है। 

हालाँकि, इसके साथ ही एक बार फिर न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का बड़ा मुद्दा प्रकाश में आया है।

न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की स्थिति

  • सर्वोच्च न्यायालय में महिला प्रतिनिधित्व: सर्वोच्च न्यायालय (SC) में पहली महिला न्यायाधीश (न्यायमूर्ति फातिमा बीवी ) की नियुक्ति वर्ष 1989 में—सर्वोच्च न्यायालय के अस्तित्व में आने के 39 वर्षों बाद, हुई थी।  
    • तब से अब तक केवल 10 महिलाएँ ही शीर्ष न्यायालय में न्यायाधीश के रूप नियुक्त हुई हैं।
  • उच्च न्यायालयों में महिला प्रतिनिधित्व: उच्च न्यायालयों (HC) में महिला न्यायाधीशों का प्रतिनिधित्व भी अधिक बेहतर नहीं रहा है। समग्र रूप से उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में महिला न्यायाधीशों की संख्या मात्र 11% रही है।  
    • पाँच उच्च न्यायालयों (पटना, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा और उत्तराखंड) में कभी भी किसी महिला ने न्यायाधीश के रूप में सेवा नहीं दी है, जबकि छह अन्य राज्यों में उनकी हिस्सेदारी 10% से भी कम थी।
    • मद्रास और दिल्ली उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों का प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक था।
  • ज़िला न्यायालयों में महिला प्रतिनिधित्व: न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व निचली अदालतों में कुछ बेहतर रहा है जहाँ वर्ष 2017 तक न्यायाधीशों के 28% महिलाएँ थीं। हालाँकि, बिहार, झारखंड और गुजरात में उनकी संख्या 20% से कम थी। 

महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के कारण

  • अपारदर्शी कॉलेजियम प्रणाली: प्रवेश परीक्षा के माध्यम से भर्ती की पद्धति के कारण अधिकाधिक महिलाएँ प्रवेश स्तर पर निचली न्यायपालिका में प्रवेश करती हैं।  
    • हालाँकि, उच्च न्यायपालिका में एक कॉलेजियम प्रणाली प्रचलित है, जो अधिकाधिक अपारदर्शी बनी रही है और इसलिये पूर्वाग्रह प्रदर्शित करने की अधिक संभावना रखती है।
  • महिला आरक्षण का अभाव: कई राज्यों में निचली न्यायपालिका में महिलाओं के लिये एक आरक्षण नीति का कार्यान्वयन किया जाता है, लेकिन उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में यह अवसर मौजूद नहीं है। 
    • महिलाओं के लिये आरक्षण कोटा संभवतः उन कई कारकों में से एक है जो अधिकाधिक महिलाओं को प्रणाली में प्रवेश करने के लिये प्रोत्साहन और सुविधाएँ प्रदान करता है।
    • जिन राज्यों में अन्य सहायक कारक पर्याप्त रूप से मौजूद हैं, वहाँ महिलाओं का कोटा संभवतः लैंगिक प्रतिनिधित्व में अंतर को पाटने में मदद करता है।
    • वस्तुस्थिति यह है कि संसद और राज्य विधानसभाओं तक में महिलाओं को 33% आरक्षण देने का विधेयक आज तक पारित नहीं हुआ है, बावजूद इसके कि सभी प्रमुख राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से इसका समर्थन करते रहे हैं।
  • पारिवारिक उत्तरदायित्व: आयु और पारिवारिक उत्तरदायित्व जैसे कारक भी अधीनस्थ न्यायिक सेवाओं से उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की पदोन्नति को प्रभावित करते हैं।  
    • महिलाओं की एक बड़ी संख्या न्यायाधीश के रूप में सेवा में बहुत देर से शामिल होती है, जिससे उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच सकने की उनकी संभावना धूमिल हो जाती है।
    • इसके साथ ही, कई महिलाएँ एक न्यायाधीश के रूप में अपने विकास पर अधिक केंद्रित नहीं हो पातीं क्योंकि सेवा में आने के बाद उनका ध्यान अपने परिवारों की ओर अधिक केंद्रित हो जाता है।
  • लिटिगेशन (Litigation) के क्षेत्र में महिलाओं की पर्याप्त संख्या का अभाव: चूँकि बार से बेंच में पदोन्नत किये गए अधिवक्ता उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के एक महत्त्वपूर्ण अनुपात का निर्माण करते हैं, महिलाएँ यहाँ भी पीछे रह जाती हैं। उल्लेखनीय कि महिला अधिवक्ताओं की संख्या अभी भी कम है, जिससे वह समूह छोटा रह जाता है जिससे महिला न्यायाधीश चुनी जा सकती हैं।  
    • जबकि कानूनी पेशे से संबद्ध महिलाओं की संख्या पर कोई आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, वर्ष 2020 की एक न्यूज़ रिपोर्ट का अनुमान है कि देश में सभी नामांकित अधिवक्ताओं में महिलाओं की संख्या मात्र 15% है।
  • पिछले 70 वर्षों के दौरान उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया है।  
    • भारत में कुल जनसंख्या का लगभग 50% महिलाएँ हैं और बार (Bar) एवं न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की एक बड़ी संख्या पदोन्नति के लिये उपलब्ध है, लेकिन इसके बावजूद महिला न्यायाधीशों की संख्या कम ही रही है।

उच्च महिला प्रतिनिधित्व का महत्त्व

  • अधिकाधिक महिलाओं को न्याय प्राप्त करने हेतु प्रेरणा: महिला न्यायाधीशों की अधिक संख्या और उनकी अधिक दृश्यता अधिकाधिक महिलाओं को न्याय प्राप्त करने और अपने अधिकार पाने के लिये न्यायालयों तक पहुँचने हेतु प्रेरित कर सकता है। 
    • हालाँकि, यह बात सभी मामलों में लागू नहीं होती, लेकिन न्यायाधीश का भी महिला होना महिला वादी को अधिक साहस प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
    • उदाहरण के लिये यदि ट्रांसजेंडर महिलाओं के मामले की सुनवाई के लिये न्यायाधीश के रूप में एक ट्रांसजेंडर महिला उपलब्ध है तो निश्चय ही इससे वादियों में भरोसे की वृद्धि होगी।
  • अलग-अलग दृष्टिकोण का समावेश: न्यायपालिका में विभिन्न सीमांत/वंचित तबके के लोगों का प्रतिनिधित्व उनके अलग-अलग जीवन-अनुभवों के कारण निश्चित रूप से मूल्यवान साबित होगा।  
    • बेंच में विविधता निश्चित रूप से वैधानिक व्याख्याओं के लिये वैकल्पिक और समावेशी दृष्टिकोण लेकर आएगी।
  • न्यायिक तर्कसंगतता में वृद्धि : न्यायिक विविधता में वृद्धि विभिन्न सामाजिक संदर्भों और अनुभवों को शामिल करने और प्रतिक्रिया देने के लिये न्यायिक तर्कसंगतता की क्षमता को समृद्ध और सुदृढ़ करती है।  
    • यह महिलाओं और हाशिये पर स्थित समूहों की आवश्यकताओं के प्रति न्याय क्षेत्र की प्रतिक्रियाओं में सुधार ला सकता है। 

आगे की राह 

  • पितृसत्तात्मक मानसिकता में परिवर्तन : यह समय की माँग और आवश्यकता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में पदोन्नत होने वालों के नामों की अनुशंसा और अनुमोदन में पितृसत्तात्मक मानसिकता को दूर किया जाए और पदोन्नति के लिये योग्य महिला अधिवक्ताओं तथा ज़िला न्यायाधीशों पर विचार के साथ महिलाओं का अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।  
    • जब तक महिलाएँ सशक्त नहीं होंगी, उनके साथ न्याय नहीं हो सकता।
  • आरक्षण का प्रावधान: यह उपयुक्त समय है कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति में भूमिका रखने वाले लोग न्यायपालिका में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता को समझें।  
    • वास्तव में, उच्च न्यायपालिका में भी अधीनस्थ न्यायपालिका की तरह योग्यता से कोई समझौता किये बिना महिलाओं के लिये क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिये।
  • रिक्तियों को अवसर के रूप में इस्तेमाल करना: उच्च न्यायालयों में 40% से अधिक रिक्तियाँ हैं। इसे एक अवसर के रूप में इस्तेमाल करते हुए महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी को दूर किया जा सकता है। 
  • लैंगिक भेदभाव को दूर करना: यह सही दिशा में बढ़ाया गया कदम होगा और न्यायपालिका में अधिक सामाजिक एवं लैंगिक सद्भाव को अवसर देगा।  
    • इस दिशा में आगे बढ़ाया गया कोई भी कदम समाज के लिये एक मानक होगा जहाँ अधिकाधिक छात्राएँ आगे आएँगी और कानून को पेशे के रूप में चुनेंगी।

निष्कर्ष

वास्तव में विविधतापूर्ण होने के लिये भारतीय न्यायपालिका को न केवल विभिन्न लैंगिक पहचानों (ट्रांस और नॉन-बाइनरी सहित) बल्कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक, धार्मिक और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के न्यायाधीशों के प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है।

इसका अर्थ यह भी होगा कि दोहरे रूप से हाशिये पर स्थित (doubly marginalised sections) वर्गों के न्यायाधीशों की भी नियुक्ति हो ताकि ‘इंटरसेक्शनल’ आवाज़ों को भी प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सके।

अभ्यास प्रश्न: 'महिला न्यायाधीशों की अधिक संख्या और अधिक दृश्यता महिलाओं की न्याय पाने की इच्छा में वृद्धि कर सकती है।' इस कथन के आलोक में न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की कमी की समस्या पर चर्चा कीजिये।


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