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एडिटोरियल

  • 16 Sep, 2021
  • 12 min read
भारतीय राजनीति

भारत: इंटरनेट शटडाउन कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड

यह एडिटोरियल दिनांक 15/09/2021 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित ‘‘Behind the great Indian Internet shutdown’’ लेख पर आधारित है। इसमें इंटरनेट शटडाउन की समस्याओं और इनसे निपटने के उपायों के संबंध में चर्चा की गई है।

जनवरी 2020 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि इंटरनेट के माध्यम से सूचना तक पहुँच भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त एक मौलिक अधिकार है। अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में सुनवाई करते हुए शीर्ष न्यायालय ने यह निर्णय भी दिया कि सरकार द्वारा इंटरनेट के उपयोग पर लगाया जाने वाला किसी भी प्रकार का प्रतिबंध अस्थायी, अपने दायरे में सीमित, वैध, आवश्यक और आनुपातिक होना चाहिये।      

उम्मीद यह थी कि यह निर्णय इंटरनेट निलंबन की घटनाओं को केवल उन असाधारण स्थितियों तक सीमित कर देगा जहाँ सार्वजनिक आपात की स्थिति है या सार्वजनिक सुरक्षा के लिये खतरा है। यह इंटरनेट एक्सेस को प्रतिबंधित करने के लिये विधायी रूप से अनिवार्य पूर्वापेक्षाएँ हैं।

लेकिन दुर्भाग्य से, इन अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं हुई। वस्तुतः निर्णय के अगले वर्ष ही (वर्ष 2021 में) पिछले वर्ष की तुलना में इंटरनेट शटडाउन के और अधिक दृष्टांत सामने आए।

भारत का इंटरनेट प्रतिबंध वर्ष 2020 में वैश्विक अर्थव्यवस्था को हुए कुल नुकसान के 70% से अधिक के लिये ज़िम्मेदार रहा और भारत ‘विश्व की इंटरनेट शटडाउन कैपिटल’ के रूप में कुख्यात बना रहा। 

हाल के प्रतिबंधों के कुछ उदाहरण

  • जम्मू और कश्मीर (J&K) केंद्रशासित प्रदेश की सरकार ने कश्मीर घाटी में मोबाइल डेटा तक पहुँच को प्रतिबंधित किया। ये प्रतिबंध कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की मौत के मद्देनज़र लागू किये गए।  
  • दिल्ली और हरियाणा में किसानों के प्रतिरोध पर नियंत्रण के लिये इंटरनेट बाधित किया गया। 
    • इस संबंध में हरियाणा के आदेश सोशल मीडिया पर जारी हुए लेकिन सरकारी वेबसाइटों पर अपलोड नहीं किये गए।

इंटरनेट शटडाउन का औचित्य

  • फेक न्यूज़ पर नियंत्रण: इंटरनेट शटडाउन के उपाय का उपयोग आम तौर पर तब किया जाता है जब नागरिक अशांति की स्थिति होती है, ताकि सरकारी कार्रवाइयों के संबंध में सूचनाओं के प्रवाह को अवरुद्ध किया जा सके या कार्यकर्ताओं/ आंदोलनकारियों के बीच संचार को अवरुद्ध किया जा सके और अफवाहों एवं फर्ज़ी खबरों के प्रसार को रोका जा सके।  
    • यह अफवाहों को सत्यापित करने का एक उपकरण भी है और व्यक्तियों एवं सरकार को सच्चाई या वास्तविक स्थिति का प्रसार करने में सक्षम बनाता है।
  • निवारक प्रतिक्रिया: इंटरनेट बंद कर देना अशांत/आक्रोशित समूहों द्वारा सरकार के विरुद्ध हिंसक प्रदर्शनों के आयोजन को अवरुद्ध करने के लिये अपनाई जाने वाली एक आरंभिक और निवारक प्रतिक्रिया भी है। 
  • राष्ट्रीय हित: इंटरनेट को राष्ट्रीय संप्रभुता से स्वतंत्र नहीं माना जा सकता। इसलिये, इंटरनेट का आवश्यक विनियमन राष्ट्रीय हितों के आधार पर संप्रभु देशों के लिये एक उपयुक्त विकल्प भी है।

इंटरनेट शटडाउन के प्रभाव

  • भरोसे में कमी की स्थिति का निर्माण: वर्तमान समय में इंटरनेट एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है और सार्वजनिक रूप से प्रकट कारणों के बिना इसे प्रतिबंधित करना भरोसे में कमी की स्थिति (Trust Deficit) का निर्माण करता है।  
    • भरोसे में कमी की स्थिति इससे भी बनी है क्योंकि केंद्र सरकार ने अनुराधा भसीन मामले में न्यायालय के निर्देशों को वैधानिक मान्यता प्रदान करने का पर्याप्त प्रयास नहीं किया है।
    • वर्ष 2020 में सरकार ने इंटरनेट निलंबन आदेशों को अधिकतम 15 दिनों तक सीमित करने के लिये दूरसंचार अस्थायी सेवा निलंबन (लोक आपात या लोक सुरक्षा) नियम, 2017 में संशोधन किया।
    • लेकिन इस संशोधन में आदेश प्रकाशित करने के लिये सरकार पर कोई दायित्व लागू नहीं किया गया और न ही इसमें इन आदेशों की आवधिक समीक्षा करने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को कोई स्थान दिया गया।
  • आर्थिक प्रभाव: वर्ष 2020 में इंटरनेट निलंबन के 129 अलग-अलग दृष्टांतों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को 2.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ, जिससे 10.3 मिलियन लोग प्रभावित हुए।  
    • इंटरनेट सूचना, मनोरंजन, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, आजीविका का एक स्रोत होने के साथ ही भारतीय समाज के सदस्यों के लिये एक-दूसरे के साथ और दुनिया के साथ संवाद करने का एक मंच है।
  • मानव विकास के विरुद्ध: इस तरह के निलंबन से होने वाले आर्थिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पत्रकारिता-संबंधी नुकसान किसी भी अनुमानित काल्पनिक लाभ पर भारी पड़ते हैं।   
    • इंटरनेट पर आपातकाल के समय प्रतिबंध लगाया जाना उचित हो सकता है, लेकिन इसे प्रतिरोध के अधिकार के लोकतांत्रिक अभ्यास को बाधित करने के लिये इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिये। वास्तव में, ऐसे अशांत समयों में एक-दूसरे की सहायता के लिये इंटरनेट एक आवश्यक साधन होता है।
  • निम्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों पर प्रभाव: इंटरनेट प्रतिबंधों को प्रायः इस आधार पर उचित ठहराया जाता है कि वे मोबाइल डेटा सेवाओं को नियंत्रित करने तक ही सीमित होते हैं। लेकिन ऐसे दृष्टिकोण से भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।   
    • भारतीय दूरसंचार सेवा प्रदर्शन संकेतकों पर भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) की वर्ष 2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार, मोबाइल डिवाइस उपयोगकर्त्ता (डोंगल और फोन) कुल इंटरनेट उपयोगकर्त्ताओं के 97.02% भाग का निर्माण करते हैं।  
    • केवल 3% उपयोगकर्त्ताओं के पास ब्रॉडबैंड इंटरनेट तक पहुँच है।
    • इस आँकड़े में इन दो वर्षों में किसी खास बदलाव की संभावना नहीं है, क्योंकि ब्रॉडबैंड इंटरनेट अभी भी महँगा है।
    • इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि इंटरनेट प्रतिबंध निम्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

आगे की राह 

  • सभी नॉन-शटडाउन विकल्पों को ख़ारिज करना: सरकारों को उनके स्रोत पर ही समस्याओं को संबोधित कर सकने के सर्वोत्तम अभ्यासों की पहचान करनी चाहिये और इंटरनेट शटडाउन के वैकल्पिक उपायों को प्राथमिकता देनी चाहिये। क्षेत्रों के भीतर और बाहर अनुभवों की साझेदारी से ऐसे समाधान मिल सकते हैं जो इंटरनेट पहुँच पर प्रतिबंध लगाने के एकमात्र उपाय पर निर्भर नहीं होंगे। 
  • लागत-लाभ विश्लेषण: सरकारों को ऐसी किसी कार्रवाई से पहले इंटरनेट शटडाउन की लागत के प्रभाव का लागत-लाभ विश्लेषण (cost-benefit analysis) कर लेना चाहिये।  
    • नेटवर्क में व्यवधान उत्पादकता को बाधित करते हैं, व्यावसायिक भरोसे पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं और अल्पकालिक एवं दीर्घकालिक वित्तीय निवेश दोनों के लिये ही हानिकारक हो सकते हैं।
  • अभिव्यक्तियों का विविधिकरण: उद्यम पूँजीपतियों और निवेशकों को अपने जोखिम मूल्यांकन के एक अंग के रूप में इंटरनेट शटडाउन को भी शामिल करना चाहिये। स्थानीय अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिये छोटे और मध्यम उद्यमों (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी क्षेत्र से बाहर के उद्यमों सहित) के महत्त्व को इस दृष्टिकोण से भी अधिक व्यापक रूप से चिह्नित किया जाना चाहिये कि इंटरनेट शटडाउन किस प्रकार उनकी कार्यान्वयन क्षमता को पूरी तरह से कमज़ोर कर सकता है। 
  • स्थिति की निगरानी: अन्य हितधारकों के साथ नागरिक समाज संगठनों को इंटरनेट शटडाउन के प्रभाव की निगरानी जारी रखनी चाहिये और इंटरनेट शटडाउन के विषय में सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता की सुनिश्चितता के लिये एक महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करना चाहिये। 

निष्कर्ष

संसद ने इन प्रतिबंधों को केवल लोक आपात या लोक सुरक्षा के लिये खतरा होने की स्थिति में ही अनुमति दी है। लेकिन यह निराशाजनक है कि इंटरनेट पर नियंत्रण लगाना बेहद आम सरकारी कदम हो गया है जबकि पारदर्शिता की कमी के कारण इसे चुनौती दे सकना भी संभव नहीं होता।

इस प्रकार, विश्व का "इंटरनेट शटडाउन कैपिटल" होने के टैग से छुटकारा पाने और डिजिटल इंडिया की संभावनाओं की पूर्ति के लिये कार्यकारी सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का अधिक तत्परता से अनुपालन किया जाना आवश्यक है।

Shutting-Down-the -Internet

अभ्यास: भारत को कई बार ‘इंटरनेट शटडाउन कैपिटल ऑफ द वर्ल्ड’ भी पुकारा जाता है। इंटरनेट शटडाउन के दृष्टांतों को कम करने लिये आवश्यक उपायों पर चर्चा कीजिये।


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