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  • 08 Oct, 2020
  • 16 min read
जीव विज्ञान और पर्यावरण

बाढ़ पूर्वानुमान तकनीकी: आवश्यकता और महत्त्व

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में अंतर्राष्ट्रीय ऋण व्यवस्था में सुधार की व्यवस्था व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

भारत में घटित होने वाली सभी प्राकृतिक आपदाओं में सबसे अधिक घटनाएँ बाढ़ की हैं। यद्यपि इसका मुख्य कारण भारतीय मानसून की अनिश्चितता तथा वर्षा ऋतु के चार महीनों में भारी जलप्रवाह है, परंतु भारत की असम्मित भू-आकृतिक विशेषताएँ और बाढ़ पूर्वानुमान तकनीकी का अभाव विभिन्न क्षेत्रों में बाढ़ की प्रकृति तथा तीव्रता के निर्धारण में अहम भूमिका निभाती हैं। वर्ष 2018 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने बाढ़ पूर्वानुमान तकनीकी के संबंध में Google के साथ मिलकर काम करने का निर्णय लिया था। जल संसाधन के क्षेत्र में भारत के शीर्ष प्रौद्योगिकी संगठन केंद्रीय जल आयोग (Central Water Commission-CWC) ने गूगल के साथ एक सहयोग समझौता भी किया था, परंतु इसमें अपेक्षित प्रगति नहीं आ पाई।

इस आलेख में बाढ़ पूर्वानुमान तकनीकी की आवश्यकता और महत्त्व पर चर्चा करने से पूर्व बाढ़, बाढ़ के कारण, भारत में बाढ़ की स्थिति आदि पर विचार-विमर्श किया जाएगा।

बाढ़ से तात्पर्य

  • नदी का जल उफान के समय जल वाहिकाओं को तोड़ता हुआ मानव बस्तियों और आस-पास की ज़मीन तक पहुँच जाता है और बाढ़ की स्थिति पैदा कर देता है। दूसरी प्राकृतिक आपदाओं की तुलना में बाढ़ आने के कारण जाने-पहचाने हैं। 
  • बाढ़ तब आती है जब नदी जल-वाहिकाओं में इनकी क्षमता से अधिक जल बहाव होता है और जल, बाढ़ के रूप में मैदान के निचले हिस्सों में भर जाता है। कई बार तो झीलों और आंतरिक जल क्षेत्रों में भी क्षमता से अधिक जल भर जाता है। 
  • कटाव नियंत्रण सहित बाढ़ प्रबंधन का विषय राज्‍यों के क्षेत्राधिकार में आता है। बाढ़ प्रबंधन एवं कटाव-रोधी योजनाएँ राज्‍य सरकारों द्वारा प्राथमिकता के अनुसार अपने संसाधनों द्वारा नियोजित, अन्‍वेषित एवं कार्यान्वित की जाती हैं। इसके लिये केंद्र सरकार राज्‍यों को तकनीकी मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

भारत में बाढ़ की स्थिति

  • भारत के विभिन्न राज्यों में बार-बार आने वाली बाढ़ के कारण जान-माल का भारी नुकसान होता है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने देश में 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र घोषित किया है। 
  • असम, पश्चिम बंगाल और बिहार राज्य सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत की ज़्यादातर नदियाँ, विशेषकर पंजाब और उत्तर प्रदेश में बाढ़ लाती रहती हैं।    
  • राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और पंजाब आकस्मिक बाढ़ के कारण पिछले कुछ दशकों में जलमग्न होते रहे हैं। इसका कारण मानसूनी वर्षा की तीव्रता तथा मानव कार्यकलापों द्वारा प्राकृतिक अपवाह तंत्र का अवरुद्ध होना है। 
  • कई बार तमिलनाडु में बाढ़ नवंबर से जनवरी माह के बीच लौटते मानसून  द्वारा हुई तीव्र वर्षा के कारण आती है। 

बाढ़ के संभावित कारण

  • सामान्यतः भारी बारिश के बाद जब प्राकृतिक जल संग्रहण स्रोतों/मार्गों (Natural Water Bodies/Routes) की जलधारण करने की क्षमता का संपूर्ण दोहन हो जाता है, तो पानी उन स्रोतों से निकलकर आस-पास की सूखी भूमि को डूबा देता है। लेकिन बाढ़ हमेशा भारी बारिश के कारण नहीं आती है, बल्कि यह प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों ही कारणों का परिणाम है, जिन्हें हम कुछ इस प्रकार से वर्णित कर सकते हैं। 
    • मौसम संबंधी तत्त्व: दरअसल, तीन से चार माह की अवधि में ही देश में भारी बारिश के परिणामस्वरूप नदियों में जल का प्रवाह बढ़ जाता है जो विनाशकारी बाढ़ का कारण बनता है। एक दिन में लगभग 15 सेंटीमीटर या उससे अधिक वर्षा होती है, तो नदियों का जलस्तर खतरनाक ढंग से बढ़ना शुरू हो जाता है। 
    • बादल फटना: भारी वर्षा और पहाड़ियों या नदियों के आस-पास बादलों के फटने से भी नदियाँ जल से भर जाती हैं।  
    • गाद का संचय: हिमालय से निकलने वाली नदियाँ अपने साथ बड़ी मात्रा में गाद और रेत लाती हैं। वर्षों से इनकी सफाई न होने कारण नदियों का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है, जिससे आस-पास के क्षेत्रों में पानी फैल जाता है।
    • मानव निर्मित अवरोध: तटबंधों, नहरों और रेलवे से संबंधित निर्माण के कारण नदियों की जल-प्रवाह क्षमता में कमी आती है, फलस्वरूप बाढ़ की समस्या और भी गंभीर हो जाती है। कुछ वर्ष पूर्व उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में आई भयंकर बाढ़ को मानव निर्मित कारकों का परिणाम माना जाता है।
    • वनों की कटाई: पहाड़ों पर मिट्टी के कटाव को रोकने और वर्षा जल के लिये पेड़ प्राकृतिक अवरोध पैदा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिये पहाड़ी ढलानों पर वनों की कटाई के कारण नदियों के जलस्तर में वृद्धि होती है।

बाढ़ प्रबंधन

  • संरचनात्मक एवं गैर-संरचनात्मक उपायों के माध्यम से बाढ़ जैसी जल संबंधी आपदाओं को रोकने के लिये हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिये, वहीं बाढ़ से निपटने के लिये तंत्र सहित पूर्व तैयारी जैसे विकल्पों पर ज़ोर दिया जाना चाहिये। साथ ही प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली के पुनर्स्थापन पर भी अत्यधिक ज़ोर दिये जाने की आवश्यकता है।
  • नदी द्वारा किये गए भूमि कटाव जैसे स्थायी नुकसान को रोकने के लिये तटबंधों इत्यादि के निर्माण हेतु आयोजना, निष्पादन, निगरानी, भू-आकृतिक विज्ञानी अध्ययनों के आधार पर किया जाना चाहिये। चूँकि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक तीव्र वर्षा होने तथा मृदा कटाव की संभावना बढ़ने से यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। 
  • बाढ़ का सामना करने के लिये बाढ़ पूर्वानुमान अति महत्त्वपूर्ण है तथा इसका देश भर में सघन विस्तार किया जाना चाहिये और वास्तविक समय आँकड़ा संग्रहण प्रणाली (Real Time Data Collection System) का उपयोग करते हुए आधुनिकीकरण किया जाना चाहिये। साथ ही इसे पूर्वानुमान मॉडल से जोड़ा जाना चाहिये। 

बाढ़ पूर्वानुमान हेतु केंद्रीय जल आयोग के प्रयास 

  • गूगल द्वारा विकसित प्लेटफॉर्मों के माध्यम से बाढ़ पूर्वानुमान और लोगों तक इसकी जानकारी पहुँचाने के लिये आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और मानचित्रण में उसकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल आयोग द्वारा किया जाएगा। 
  • बाढ़ का पूर्वानुमान तैयार करने में गूगल अपने हाई रिजॉल्यूशन डिजिटल एलिवेशन मॉडल का इस्तेमाल करेगा,  जबकि केंद्रीय जल आयोग अपनी ओर से जलस्तर, बारिश आदि के नियमित आँकड़े उपलब्ध कराएगा। 
  • नई तकनीक से प्रशासन तथा आपदा प्रबंधन से जुड़े संगठन समय रहते बाढ़ के जोखिम वाले इलाकों तथा आबादी की पहचान कर सकेंगे तथा चेतावनी जारी की जा सकेगी।   
  • संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान की बाढ़ पूर्वानुमान तकनीकी ‘इन्सेम्बल फ्लड फॉरकास्ट मॉडल’ (Ensemble flood forecast) और इनंडेशन मॉडलिंग (Inundation modelling) तकनीकी की ओर स्थानांतरित हो गई  हैं। भारत ने अभी नियतात्मक पूर्वानुमान (अर्थात नदी स्तर में उतार-चढ़ाव ) मॉडल को अपनाया है।

भारत में बाढ़ पूर्वानुमान नेटवर्क

  • केंद्रीय जल आयोग के बाढ़ पूर्वानुमान नेटवर्क में 128 जलाशयों के अलावा 197 निचले क्षेत्र/शहरों और कस्बों को कवर करने वाले 325 स्टेशन शामिल हैं। यह नेटवर्क लगभग 20 नदी प्रणालियों तक फैला हुआ है। इसमें गंगा और उसकी सहायक नदियाँ, सिंधु / झेलम, ब्रह्मपुत्र तथाउसकी सहायक नदियाँ, बराक, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, तापी समेत 25 से अधिक राज्य शामिल हैं।
  • लगभग 197 निचले इलाकों/कस्बों और 128 जलाशयों के लिये बाढ़ की भविष्यवाणी और अग्रिम चेतावनी उपयोगकर्त्ता एजेंसियों को लोगों की निकासी और उनकी चल संपत्ति को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने जैसे कार्यों में मदद करती है।  
  • वार्षिक रूप से 7000 से अधिक बाढ़ पूर्वानुमान और अग्रिम चेतावनियाँ CWC द्वारा जारी की जाती हैं। पिछले वर्षों में CWC द्वारा जारी किये गए पूर्वानुमानों की समग्र सटीकता 90 प्रतिशत से अधिक है।    

चुनौतियाँ 

  • भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department-IMD) मौसम संबंधी या मौसम पूर्वानुमान जारी करता है, जबकि केंद्रीय जल आयोग विभिन्न नदी बिंदुओं पर बाढ़ के पूर्वानुमान जारी करता है। इसलिये बाढ़ पूर्वानुमान तकनीकी की प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि IMD द्वारा कितनी जल्दी बारिश का अनुमान लगाया जाता है और कितनी जल्दी CWC बारिश के पूर्वानुमान को बाढ़ के पूर्वानुमान के साथ एकीकृत करता है।
  • भारत में कई नदी बिंदुओं पर अधिकांश बाढ़ पूर्वानुमान पुरानी सांख्यिकीय विधियों पर आधारित होते हैं जो 24 घंटे से कम के लीड समय (बाढ़ की घटना के जारी होने और घटने की अवधि ) पर कार्य करते हैं। यह इस धारणा के विपरीत है कि भारत का बाढ़ पूर्वानुमान Google की सबसे उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीकी से प्रेरित है। ये सांख्यिकीय विधियाँ बेस स्टेशन और पूर्वानुमान स्टेशन के बीच नदी घाटियों की हाइड्रोलॉजिकल प्रतिक्रिया को पकड़ने में विफल रहती हैं।
  • पुरानी तकनीकों और कई एजेंसियों तथा  उनके खराब जल प्रशासन के बीच तकनीकी समानता की कमी से निर्णायक समय में कमी आती है, जिससे पूर्वानुमान संबंधी त्रुटियाँ बढ़ जाती हैं।

महत्त्व 

  • बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लोग लंबे समय से बाढ़ आने से पहले यानी  समय रहते सटीक चेतावनी दिये जाने की मांग कर रहे थे। इस पहल से उनकी यह मांग पूरी होगी। 
  • गूगल उच्च स्तरीय डिजिटल तकनीक जिसमें वह अपनी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विशेषज्ञता के सहारे CWC द्वारा प्रदत्त जानकारी के सहयोग से बाढ़ की सटीक जानकारी देगा। 
  • इस समझौते के बाद सरकार को करोड़ों रुपए की बचत होगी। इससे सरकार और आपदा प्रबंधन संगठनों को बाढ़ प्रभावित स्थानों और जनसंख्या की बेहतर जानकारी प्राप्त होगी। 
  • निकटस्थ बाढ़ के संकेतों को ध्यान में रखते हुए Google मानचित्र उपयोगकर्त्ता यह देखने में सक्षम होगा कि पहले किन क्षेत्रों में जलभराव की संभावना है और कौन-कौन से क्षेत्र खतरे में हैं।

निष्कर्ष

प्रत्येक वर्ष आने वाली बाढ़ से बड़ी मात्रा में जन-धन की हानि होती है, साथ ही इससे सर्वाधिक नकारात्मक रूप से समाज का सबसे गरीब वर्ग प्रभावित होता है। इस आलोक में बाढ़ जैसी आपदा की रोकथाम तथा बाढ़ आने के पश्चात् होने वाली हानि को कम करने के लिये ज़रूरी प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। विभिन्न सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों द्वारा बाढ़ के प्रभावों को कम करने के प्रयास किये जा रहे हैं। किंतु ये प्रयास तब तक ऐसी आपदाओं को रोकने में कारगर नहीं हो सकेंगे जब तक कि मानव निर्मित कारकों जैसे- जलवायु परिवर्तन, निर्वनीकरण, अवैज्ञानिक विकास कार्य आदि को नहीं रोका जाता।

प्रश्न- ‘कई बाढ़ पूर्वानुमान एजेंसियों के बीच एकीकरण की कमी व समन्वय के अभाव के कारण भारत में बाढ़ की स्थिति अति गंभीर हो जाती है।’ आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं, तर्क सहित अपने उत्तर की पुष्टि कीजिये।


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