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  • 06 Oct, 2020
  • 14 min read
कृषि

कृषि अधिनियम: संवैधानिक स्थिति

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में कृषि अधिनियम की संवैधानिक स्थिति व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ 

संसद द्वारा पारित तीन कृषि अधिनियमों ने पूरे देश में संवैधानिक वैधता पर बहस छेड़ दी है। ये अधिनियम ‘कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार (संवर्द्धन एवं सुविधा) अधिनियम, 2020, मूल्‍य आश्‍वासन पर किसान समझौता (अधिकार प्रदान करना और सुरक्षा) अधिनियम, 2020, आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 हैं। 

इन अधिनियमों की उपयोगिता बताते हुए सरकार का कहना है कि ये कानून किसानों की आय़ बढ़ाने में मदद करेंगे, पहले किसानों को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब से ऐसा नहीं होगा। देश भर के किसान संगठन, मंडी समितियों से जुड़े लोग इन अधिनियमों का विरोध कर रहे हैं, उनका मानना है कि इन अधिनियमों  के जरिये सरकार कृषि में निजी क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है, जो किसानों की परेशानियों को और बढ़ाएगा। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या केंद्र सरकार के पास अधिकार है कि वह राज्य सूची के विषयों पर कानून का निर्माण कर सकता है। कई राज्यों ने कृषि अधिनियमों की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न खड़े किये तथा कई राज्य इन अधिनियमों की वैधता को चुनौती देने के लिये कानूनी विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। 

इस आलेख में कृषि अधिनियमों की संवैधानिक वैधता को समझने से पूर्व  क्रमशः तीनों कृषि अधिनियमों के प्रावधानों, उनके लाभ तथा चुनौतियों को समझने का प्रयास किया जाएगा।  

कृषि उपज वाणिज्य एवं व्यापार (संवर्द्धन एवं सुविधा) अधिनियम, 2020

[The Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020]:

पृष्ठभूमि

  • वर्तमान में किसानों को अपनी उपज की बिक्री में कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, किसानों के लिये अधिसूचित कृषि उत्पाद विपणन समिति (APMC) वाले बाज़ार क्षेत्र के बाहर कृषि उपज की बिक्री पर कई तरह के प्रतिबंध थे।
  • किसानों को केवल राज्य सरकारों के पंजीकृत लाइसेंसधारियों को उपज बेचने की बाध्यता भी निर्धारित थी साथ ही राज्य सरकारों द्वारा लागू विभिन्न APMC विधानों के कारण विभिन्न राज्यों के बीच कृषि उपज के मुक्त प्रवाह में भी बाधाएँ बनी हुई थी।

लाभ

  • इस अधिनियम के माध्यम से एक नए पारिस्थितिकी तंत्र की स्थापना में सहायता मिलेगी जहाँ किसानों और व्यापारियों को कृषि उपज की खरीद और बिक्री के लिये अधिक विकल्प उपलब्ध होंगे।
  • यह अधिनियम राज्य कृषि उपज विपणन कानून के तहत अधिसूचित बाज़ारों के भौतिक परिसर के बाहर अवरोध मुक्त अंतर्राज्यीय और राज्यांतरिक व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देता है।
  • इस अधिनियम के माध्यम से अधिशेष उपज वाले क्षेत्र के किसानों को अपनी उपज पर बेहतर मूल्य प्राप्त होगा और साथ ही कम उपज वाले क्षेत्रों में उपभोक्ताओं को कम कीमत पर अनाज प्राप्त हो सकेगा।
  • इस अधिनियम में कृषि क्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग का भी प्रस्ताव किया गया है।
  • इस अधिनियम के तहत किसानों से उनकी उपज की बिक्री पर कोई उपकर या लगान नहीं लिया जाएगा। साथ ही इसके तहत किसानों के लिये एक अलग विवाद समाधान तंत्र की स्थापना का प्रावधान भी किया गया है।

चुनौतियाँ 

  • इस अधिनियम से इस प्रकार की स्थिति निर्मित हो जाती है, जिसमे किसानों को स्थानीय बाज़ार में अपनी उपज को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर बेचने से कोई खरीददार नहीं मिलता है।
  • चूंकि, अधिकांश किसान छोटे अथवा सीमांत कृषि-भूमि के मालिक होते हैं, और इनके पास अपनी उपज को दूर के बाज़ारों में बेचने हेतु परिवहन के साधन नहीं होते है।
  • अतः, इन किसानों को अपनी उपज स्थानीय बाज़ार में ही न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमतों पर बेचने के लिये मजबूर होना पड़ता है।

मूल्य आश्वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अधिनियम, 2020

[The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services Act, 2020]:

पृष्ठभूमि

  • भारतीय किसानों को छोटी जोत, मौसम पर निर्भरता, उत्पादन और बाज़ार की अनिश्चितता के कारण कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन कमज़ोरियों के कारण आर्थिक दृष्टि से कृषि में बहुत अधिक जोखिम होता है।

लाभ 

  • यह विधेयक किसानों को बगैर किसी शोषण के भय के प्रसंस्करणकर्त्ताओं, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा कारोबारियों, निर्यातकों आदि के साथ जुड़ने में सक्षम बनाएगा।
  • इसके माध्यम से किसान प्रत्यक्ष रूप से विपणन से जुड़ सकेंगे, जिससे मध्यस्थों की भूमिका समाप्त होगी और उन्हें अपनी फसल का बेहतर मूल्य प्राप्त हो सकेगा।
  • इस विधेयक से कृषि उपज को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचाने हेतु आपूर्ति श्रृंखला के निर्माण तथा कृषि अवसंरचना के विकास हेतु निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा मिलेगा।

चुनौतियाँ 

  • पहली चिंता का कारण अनुबंध कृषि में किसानों तथा कार्पोरेट्स के मध्य समझौता करने की शक्ति से संबंधित है। इसमें एक किसान अपनी पैदावार के लिये उचित मूल्य तय करने में कॉर्पोरेट अथवा बड़े व्यावसायिक प्रायोजकों के साथ समझौता करने में पर्याप्त रूप से सक्षम नहीं होता है।
  • दूसरे अधिनियम में कहा गया है कि गुणवत्ता मानकों को समझौते में दोनों पक्षों द्वारा पारस्परिक रूप से तय किया जा सकता है। लेकिन, कॉरपोरेट्स के द्वारा उपज की गुणवत्ता के संदर्भ में एकरूपता मामलों को शामिल करने पर, गुणवत्ता पहलू काफी महत्वपूर्ण हो जाएगा, क्योंकि, देश में कृषि-पारिस्थितिक विविधता में असमानता होने कारण गुणवत्ता में एकरूपता संभव नहीं होगी।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020

[Essential Commodities (Amendment) Act, 2020]:

पृष्ठभूमि 

  • इस संशोधन के अंतर्गत अकाल, युद्ध, आदि जैसी असामान्य परिस्थितियों के कारण कीमतों में अत्याधिक वृद्धि तथा प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में कुछ निर्दिष्ट कृषि उपजों की आपूर्ति, भंडारण तथा कीमतों को नियंत्रित किये जाने का प्रावधान किया गया है। 

लाभ

  • इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने विनियामक वातावरण को उदार बनाने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की जाए। संशोधन विधेयक में यह व्यवस्था की गई है कि युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और प्राकृतिक आपदा जैसी परिस्थितियों में इन कृषि‍ उपजों की कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है।
  • इस संशोधन के माध्यम से न केवल किसानों के लिये बल्कि उपभोक्ताओं और निवेशकों के लिये भी सकारात्मक माहौल का निर्माण होगा और यह निश्चित रूप से हमारे देश को आत्मनिर्भर बनाएगा।
  • इस संशोधन से कृषि क्षेत्र की समग्र आपूर्ति श्रृंखला तंत्र को मज़बूती मिलेगी। इस संशोधन के माध्यम से इस कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देकर किसान की आय दोगुनी करने और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देने की सरकार की प्रतिबद्धता को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।     

चुनौतियाँ 

  • इस अधिनियम के अंतर्गत कृषि उपजों की मूल्य सीमा में उतार-चढ़ाव काफी विषम है (बागवानी उपजों की खुदरा कीमतों में 100% की वृद्धि तथा शीघ्र खराब नहीं होने वाले कृषि खाद्य पदार्थों की खुदरा कीमतों में 50% की वृद्धि)।
  • इसके तहत किसी कृषि उपज के मूल्‍य श्रृंखला (वैल्‍यू चेन) प्रतिभागी की स्‍थापित क्षमता स्‍टॉक सीमा लगाए जाने से मुक्‍त रहेगी।
  • निर्यातक, वस्तुओं की मांग दिखाने पर, स्‍टॉक सीमा लगाए जाने से मुक्‍त रहेंगे।

कृषि से संबंधित विषय की संवैधानिक स्थिति 

  • संविधान में कृषि को राज्य सूची (सूची II) के विषय के रूप में संदर्भित किया गया है। कृषि व उससे संबंधित विषय को राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 14 में सूचीबद्ध किया गया है।
  • राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 26 ‘राज्य के भीतर व्यापार एवं वाणिज्य’ को संदर्भित करता है। राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 27 ‘माल के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण’ को संदर्भित करती है तो वहीं प्रविष्टि 28 ‘बाज़ार और मंडियों’ को संदर्भित करती है।

केंद्र के पास कृषि से संबंधित कानून बनाने का आधार

  • केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची (सूची III) की प्रविष्टि 33 के आधार पर कृषि से संबंधित विषय पर कानून बनाया था। राज्य सूची की (सूची II) प्रविष्टि 26 और 27 को समवर्ती सूची (सूची III) की प्रविष्टि 33 के प्रावधानों के अधीन सूचीबद्ध किया गया है।
  • समवर्ती सूची की प्रविष्टि-33 जहाँ एक ओर कृषि विषयों पर राज्यों की शक्ति को सीमित करती है वहीं दूसरी ओर केंद्र को यह अधिकार देते हुए शक्तिमय बनाती है कि वह कृषि उत्पादन, कृषि-व्यापार, खाद्यान्न वितरण और कृषि उत्पाद संबंधी मामलों पर विधि बना सकती है।
  • केंद्र सरकार, समय-समय पर राज्य सरकारों को ऐसे निर्देश दे सकती है जिन्हें वह इस अधिनियम के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से अमल में लाने के लिये आवश्यक समझती है, राज्यों को इन निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा। 

आगे की राह

  • वर्तमान में भी देश में किसानों की एक बड़ी आबादी के पास छोटी जोत है और उनके पास आधुनिक उपकरणों का अभाव है, ऐसे में सरकार को कृषि में वैज्ञानिक पद्धति के उपयोग और नवीन उपकरणों हेतु आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिये।
  • संविधान की सूची-II (राज्य सूची) की प्रविष्टि-14 के तहत कृषि को राज्य सूची के विषय के रूप में शामिल किया गया है , अतः केंद्र सरकार का निर्णय राज्य के कार्यों में हस्तक्षेप के साथ संविधान में निहित सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना को चोट पहुँचा सकता है, अतः केंद्र को इस प्रकार के कानून निर्माण से पूर्व राज्यों के विश्वास को प्राप्त करना चाहिये।

प्रश्न- संसद द्वारा पारित कृषि अधिनियम, 2020 के प्रावधानों का संक्षेप में उल्लेख करते हुए उनसे संबंधित चिंताओं का वर्णन कीजिये । क्या यह अधिनियम सहकारी संघवाद की भावना के विपरीत है, तर्क सहित अपने उत्तर की पुष्टि कीजिये? 


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