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डेली न्यूज़

  • 27 Mar, 2021
  • 45 min read
भारतीय राजनीति

चुनावी बॉण्ड

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी बॉण्ड के माध्यम से प्राप्त धन के अतिवादी या हिंसक विरोध प्रदर्शन संबंधी फंडिंग में दुरुपयोग की संभावना व्यक्त की है।

  • न्यायालय ने सरकार से यह भी पूछा कि क्या राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त इस धन के प्रयोग पर कोई ‘नियंत्रण’ नहीं है।

चुनावी बॉण्ड

  • चुनावी बॉण्ड राजनीतिक दलों को दान देने हेतु एक वित्तीय साधन है।
  • चुनावी बॉण्ड बिना किसी अधिकतम सीमा के 1,000 रुपए, 10,000 रुपए, 1 लाख रुपए, 10 लाख रुपए और 1 करोड़ रुपए के गुणकों में जारी किये जाते हैं।
  • भारतीय स्टेट बैंक इन बॉण्डों को जारी करने और भुनाने (Encash) के लिये अधिकृत बैंक है, ये बॉण्ड जारी करने की तारीख से पंद्रह दिनों तक वैध रहते हैं।
  • यह बॉण्ड एक पंजीकृत राजनीतिक पार्टी के निर्दिष्ट खाते में प्रतिदेय होता है।
  • बॉण्ड किसी भी व्यक्ति (जो भारत का नागरिक है) द्वारा जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्तूबर के महीनों में प्रत्येक दस दिनों की अवधि हेतु खरीद के लिये उपलब्ध होते हैं, जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट किया गया है।
    • एक व्यक्ति या तो अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ संयुक्त रूप से बॉण्ड खरीद सकता है।
    • बॉण्ड पर दाता के नाम का उल्लेख नहीं किया जाता है।

प्रमुख बिंदु:

  • पृष्ठभूमि: चुनावी बॉण्ड योजना गलत तरीके से की जाने वाली फंडिंग का नियंत्रण करती है, क्योंकि यह चेक और डिजिटल लेन-देन पर ज़ोर देती है, हालाँकि इस योजना के कई प्रमुख प्रावधान इसे अत्यधिक विवादास्पद बनाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय में उठाया गया चुनावी बॉण्ड के दुरुपयोग का मुद्दा:

  • अनामिकता: इस व्यवस्था के तहत न तो फंड देने वाले के नाम की घोषणा की जाती है और न ही फंड लेने वाले के नाम की।
  • असममित रूप से अपारदर्शी: चूँकि चुनावी बॉण्ड केवल SBI के माध्यम से ही खरीदे जाते हैं, इसलिये सरकार इनके संबंध में जानकारी रखती है।
    • जानकारी की यह विषमता सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी के पक्ष में होती है।
  • काले धन का माध्यम: कॉर्पोरेट द्वारा की गई फंडिंग पर 7.5% की कैप का उन्मूलन, राजनीतिक योगदान करने वाले व्यक्ति की पहचान की आवश्यकता को निराधार करना और इस प्रावधान को समाप्त करना कि एक निगम को कम-से-कम तीन वर्ष पुराना होना चाहिये, इस योजना के उद्देश्य को अच्छी तरह से रेखांकित नहीं करता है।
    • चुनाव आयोग ने दानदाताओं के नामों को उजागर न करने और घाटे में चल रही कंपनियाँ जो कि केवल शेल कंपनियाँ हैं, को बॉण्ड खरीदने की अनुमति देने पर चिंता जताई थी।

सरकार का पक्ष:

  • चुनावी बॉण्ड हेतु योग्यता: केवल वे राजनीतिक दल ही चुनावी बॉण्ड प्राप्त करने के योग्य हैं जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 29 (A) के तहत पंजीकृत हैं और जिन्होंने बीते आम चुनाव में कम-से-कम 1% मत प्राप्त किया है।
  • काले धन को राजनीति से दूर रखना: पारंपरिक व्यवस्था के तहत जो भी चुनावी चंदा मिलता था वह मुख्यतः नकद दिया जाता था, जिसे काले धन की संभावना काफी बढ़ जाती थी। परंतु चूँकि वर्तमान प्रणाली के तहत चुनावी बॉण्ड केवल चेक या ई-भुगतान के ज़रिये ही खरीदा जा सकता है, इसलिये काले धन संबंधी चिंता खत्म हो जाती है।
    • KYC मानकों का भी अनुसरण किया जाता है।
  • भारत निर्वाचन आयोग का समर्थन: भारत निर्वाचन आयोग इन बॉण्डों के विरोध में नहीं था, उसने इसके अनामिकता संबंधी पहलू के बारे में चिंता जताई थी।
    • इसने न्यायालय से कहा कि यह योजना नकद वित्तपोषण की पुरानी प्रणाली की तुलना में एक कदम आगे है।

आगे की राह:

  • भ्रष्टाचार के दुष्चक्र को तोड़ने और लोकतांत्रिक राजनीति की गुणवत्ता के क्षरण को रोकने के लिये साहसिक सुधारों के साथ राजनीतिक वित्तपोषण के प्रभावी विनियमन की आवश्यकता है।
  • संपूर्ण शासन तंत्र को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने के लिये मौजूदा कानूनों में खामियों को दूर करना ज़रूरी है।
  • मतदाता, जागरूकता अभियानों की मांग करके पर्याप्त बदलाव लाने में मदद कर सकते हैं। यदि मतदाता उन उम्मीदवारों और पार्टियों को अस्वीकार करते हैं जो उन्हें रिश्वत देते हैं, तो लोकतंत्र एक कदम और आगे बढ़ेगा।

स्रोत- द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक विधेयक, 2021

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राज्यसभा द्वारा राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक (National Bank for Financing Infrastructure and Development- NBFID) विधेयक, 2021 पारित किया गया।

  • इस विधेयक का उद्देश्य बुनियादी ढाँचे के वित्तपोषण की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये एक प्रमुख विकास वित्तीय संस्थान (Development Financial Institutions- DFIs) के तौर पर राष्ट्रीय अवसंरचना वित्तपोषण और विकास बैंक (NBFID) की स्थापना करना है।
  • NFBID की घोषणा बजट 2021 में की गई थी।

विकास वित्तीय संस्थान (DFI)

  • DFIs का गठन अर्थव्यवस्था के ऐसे क्षेत्रों को दीर्घकालिक वित्त प्रदान करने के लिये किया जाता है जिनसे संबंधित जोखिम वाणिज्यिक बैंकों और अन्य साधारण वित्तीय संस्थानों की स्वीकार्य सीमा से परे हैं।
    • DFIs बैंकों की तरह लोगों से जमा स्वीकार नहीं करते हैं।
  • वे बाज़ार, सरकार और साथ ही बहुपक्षीय संस्थानों से धन जुटाते हैं तथा प्रायः सरकारी गारंटी द्वारा समर्थित होते हैं।

प्रमुख बिंदु

NBFID एक कॉर्पोरेट के रूप में:

  • NBFID का गठन एक कॉरपोरेट निकाय के रूप में किया जाएगा जिसकी अधिकृत शेयर पूंजी एक लाख करोड़ रुपए होगी। 

उद्देश्य:

  • वित्तीय उद्देश्य:
    • इसके वित्तीय उद्देश्यों में पूरी तरह से या आंशिक रूप से भारत में अवस्थित अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के लिये प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उधार देना, निवेश करना या निवेश को आकर्षित करना शामिल है।
  • विकासपरक उद्देश्य:
    • विकासपरक उद्देश्यों में अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिये बॉण्ड, ऋण और व्युत्पन्नों (डेरिवेटिव्स) के बाज़ार के विकास में मदद करना शामिल है।

NBFID के कार्य: 

  • अवसंरचना परियोजनाओं/इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लोन तथा एडवांस देना
  • मौजूदा ऋण/लोन का अधिग्रहण कर उसका फिर से वित्तपोषण करना।
  • अवसंरचना परियोजनाओं में निवेश के लिये निजी क्षेत्र के निवेशकों और संस्थागत निवेशकों को आकर्षित करना
  • अवसंरचना परियोजनाओं में विदेशी भागीदारी को सरल बनाना
  • अवसंरचना वित्तपोषण के क्षेत्र में विवाद निवारण के लिये विभिन्न सरकारी प्राधिकारियों/प्राधिकरणों से बातचीत को सुविधाजनक बनाना
  • अवसंरचना वित्तपोषण में परामर्श सेवाएँ प्रदान करना। 

धनराशि का स्रोत

  • यह लोन/ऋण के रूप में भारतीय रुपए तथा विदेशी मुद्रा दोनों में धन जुटा सकता है या बॉण्ड्स और डिबेंचर्स सहित विभिन्न वित्तीय साधनों को जारी करके और उन्हें बेचकर धन प्राप्त कर सकता है।
  • यह केंद्र सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक, अधिसूचित वाणिज्यिक बैंक, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे बहुपक्षीय संस्थानों से धन उधार ले सकता है।
  • प्रारंभ में इस संस्थान में केंद्र सरकार की भागीदारी 100% होगी जो धीरे-धीरे कम होकर 26% तक पहुँच जाएगी।

NBFID का प्रबंधन: 

  • NBFID का प्रबंधन बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा किया जाएगा। इसके अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा RBI की सलाह से की जाएगी।
  • केंद्र सरकार द्वारा गठित एक निकाय मैनेजिंग डायरेक्टर और डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर्स के पद के लिये उम्मीदवारों के नामों का सुझाव देगा। 
  • आंतरिक समिति के सुझावों के आधार पर बोर्ड स्वतंत्र डायरेक्टर्स की नियुक्ति करेगा।

केंद्र सरकार से सहयोग: 

  • केंद्र सरकार पहले वित्तीय वर्ष के अंत में NBFID को 5,000 करोड़ रुपए का अनुदान देगी।
  • सरकार बहुपक्षीय संस्थानों, सॉवरेन वेल्थ फंड्स और अन्य विदेशी फंड्स से उधारियों के लिये अधिकतम 0.1% की रियायती दर पर गारंटी भी प्रदान करेगी।
  • विदेशी मुद्रा (विदेशी मुद्रा में उधारियाँ लेने पर) में उतार-चढ़ाव के कारण होने वाली हानि से संबंधित लागत की भरपाई सरकार द्वारा पूरी तरह या आंशिक रूप से की जा सकती है।
  • NBFID द्वारा अनुरोध किये जाने पर सरकार उसके द्वारा जारी बॉण्ड्स, डिबेंचर्स और लोन की गारंटी ले सकती है। 

जाँच और अभियोजन के लिये पूर्व मंज़ूरी:

  • अध्यक्ष और दूसरे डायरेक्टर्स के मामले में केंद्र सरकार तथा अन्य कर्मचारियों के मामले में मैनेजिंग डायरेक्टर की पूर्व मंज़ूरी के बिना NBFID के कर्मचारियों की जाँच शुरू नहीं की जा सकती।
  • NBFID के कर्मचारियों से संबंधित मामलों में अपराधों का संज्ञान लेने के लिये न्यायालयों को भी पूर्व मंज़ूरी लेनी होगी। 

अन्य विकास वित्तीय संस्थान (DFI)

  • विधेयक में यह प्रावधान भी है कि RBI में आवेदन करके कोई भी व्यक्ति DFI बना सकता है।
  • RBI केंद्र सरकार की सलाह से DFI को लाइसेंस दे सकता है।  
  • इन विकास वित्तीय संस्थानों के लिये विनियम RBI द्वारा निर्दिष्ट किये जाएंगे।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट

चर्चा में क्यों?

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने सूचीबद्ध संस्थाओं द्वारा पेश की जाने वाली ‘बिज़नेस सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग’ के लिये नई आवश्यकताओं को प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है।

  • इस नई रिपोर्ट को ‘बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट’ (BRSR) कहा जाएगा और यह मौजूदा बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्ट (BRS) का स्थान लेगी।

प्रमुख बिंदु:

पृष्ठभूमि:

  • SEBI ने वर्ष 2012 में बाज़ार पूंजीकरण द्वारा शीर्ष 100 सूचीबद्ध संस्थाओं को 'सामाजिक, पर्यावरणीय और आर्थिक उत्तरदायित्त्व पर राष्ट्रीय स्वैच्छिक दिशा-निर्देश' (NVGs) में अंतर्निहित आवश्यकताओं के अनुसार व्यावसायिक जवाबदेही रिपोर्ट (BRR) दाखिल करने के लिये बाध्य किया।
    • वर्ष 2019 में कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने NVG को संशोधित किया और ‘उत्तरदायी व्यावसायिक आचरण पर राष्ट्रीय दिशा-निर्देश’ (NGRBC) तैयार किये।
  • दिसंबर 2019 में SEBI ने वित्तीय वर्ष 2019-20 से बाज़ार पूंजीकरण द्वारा शीर्ष 1000 सूचीबद्ध संस्थाओं के लिये ‘व्यावसायिक जवाबदेही रिपोर्ट’ संबंधी आवश्यकताओं को बढ़ा दिया।
    • सूचीबद्ध संस्थाएँ: एक कंपनी जिसका शेयर किसी आधिकारिक स्टॉक एक्सचेंज पर खरीदा या बेचा जाता है।
    • बाज़ार पूंजीकरण: यह संदर्भित करता है कि स्टॉक मार्केट द्वारा किसी कंपनी की तय की गई कीमत कितनी है। इसे सभी बकाया शेयरों के कुल बाज़ार मूल्य के रूप में परिभाषित किया गया है।
      • किसी कंपनी के मार्केट कैप की गणना करने के लिये बकाया शेयरों की संख्या को एक शेयर के मौजूदा बाज़ार मूल्य से गुणा किया जाता है।

बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट (BRSR):

  • BRSR जो कि पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) के दृष्टिकोण पर आधारित एक रिपोर्ट है, का उद्देश्य व्यवसायों को अपने हितधारकों के साथ अधिक सार्थक रूप से संलग्न करने में सक्षम बनाना है।
  • यह व्यवसायों को विनियामक वित्तीय अनुपालन करने और उनके सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों पर रिपोर्ट करने के लिये प्रोत्साहित करेगा।
  • वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिये स्वैच्छिक आधार पर और वित्तीय वर्ष 2022-23 से अनिवार्य आधार पर BRSR शीर्ष 1000 सूचीबद्ध संस्थाओं (बाज़ार पूंजीकरण द्वारा) पर लागू होगा।

सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग:

  • यह पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) आधारित लक्ष्यों से संबंधित है और साथ ही कंपनी की प्रगति का सूचक भी है। 
  • सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग के लाभों में बेहतर कॉर्पोरेट प्रतिष्ठा, उपभोक्ता विश्वास का निर्माण, नवाचार में वृद्धि और यहाँ तक ​​कि जोखिम प्रबंधन में सुधार शामिल है।

 पर्यावरणीय, सामाजिक और शासन आधारित लक्ष्य:

  • पर्यावरण, सामाजिक और शासन (ESG) आधारित लक्ष्य कंपनी के संचालन के लिये ज़रूरी मानकों का एक समूह है जो कंपनियों को बेहतर प्रशासन, नैतिक प्रथाओं, पर्यावरण के अनुकूल उपायों और सामाजिक उत्तरदायित्त्व का पालन करने के लिये मज़बूर करते हैं।
  • पर्यावरणीय मापदंड के माध्यम से यह जाँचा जाता है कि एक कंपनी प्रकृति के साथ कैसे सामंजस्य बिठाती है।
  • सामाजिक मानदंड के माध्यम से यह जाँचा जाता है कि यह कर्मचारियों, आपूर्तिकर्त्ताओं, ग्राहकों और उन समुदायों के साथ संबंधों का प्रबंधन कैसे करता है जहाँ यह संचालित है।
  • शासन एक कंपनी के नेतृत्त्व, कार्यकारी वेतन, लेखा परीक्षा, आंतरिक नियंत्रण और शेयरधारक के अधिकारों से संबंधित है।

उत्तरदायी व्यवसाय:

  • उत्तरदायी व्यवसाय का दर्शन व्यापार के उस सिद्धांत पर आधारित है जो वैश्विक विकास के संदर्भ में अपने उन सभी हितधारकों के प्रति जवाबदेह होता है जो व्यवसायों को पर्यावरण और समाज के प्रति उत्तरदायी और सतत् बनाने की मांग कर रहे हैं।
  • जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय जोखिमों, बढ़ती असमानता आदि से संबंधित वैश्विक चुनौतियों के संबंध में व्यवसाय जगत को लगातार जागरूक किया जा रहा है ताकि समाज में व्यवसायों की भूमिका को फिर से परिभाषित किया जा सके और उन्हें केवल धन पैदा करने वाली आर्थिक इकाइयों के रूप में न देखा जाए।
  • किसी कंपनी के प्रदर्शन को न केवल शेयरधारकों की वापसी के आधार पर मापा जाना चाहिये,  बल्कि यह भी देखा जाना चाहिये कि वह अपने पर्यावरणीय, सामाजिक और सुशासन के उद्देश्यों को कैसे प्राप्त करता है।

स्रोत- इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत के लिये हीलियम संकट

चर्चा में क्यों?

भारत द्वारा अपनी हीलियम संबंधी ज़रूरतों को पूरा करने के लिये इसका आयात किया जाता है, ऐसे में वर्ष 2021 से अमेरिका द्वारा हीलियम के निर्यात में की जाने वाली कटौती के चलते भारतीय उद्योगों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है

  • फेडरल हीलियम रिज़र्व (Federal Helium Reserve) जो अमेरिका का प्रमुख हीलियम रिज़र्व है, वर्ष 2021 में उत्पादन बंद करने की तैयारी में है वैज्ञानिकों द्वारा इस भंडार के स्थान पर नए भंडार की तलाश की जा रही है 

प्रमुख बिंदु:

हीलियम के बारे में:

  • हीलियम एक रासयनिक तत्त्व है जिसका प्रतीक (Symbol) He तथा परमाणु क्रमांक 2 है  
  • यह एक रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, नॉन टॉक्सिक, अक्रिय तथा एकल परमाण्विक नोबल गैस (Noble Gas) है जो आवर्त सारणी (Periodic Table) में नोबल गैस समूह में प्रथम गैस है।
  • इसका क्वथनांक (Boiling Point) सभी तत्त्वों में सबसे कम है।

Helium-Market

हीलियम की खोज:

  • सूर्य के चारों ओर वायुमंडल में:
    • हीलियम की खोज फ्रांँसीसी खगोलशास्त्री पियरे जानसेन (Pierre Janssen) द्वारा सूर्य के आसपास के गैसीय वातावरण में की गई थी। उन्होंने वर्ष 1868 में भारत में ग्रहण के दौरान सौर क्रोमोस्फीयर के स्पेक्ट्रम में एक चमकदार पीली रेखा का पता लगाया था।
    • जोसेफ नॉर्मन लॉकर ने लंदन स्मॉग (London Smog) में सूरज के चारों ओर समान रेखा देखी और इस नए तत्त्व को एक धातु मानते हुए उन्होंने इसे हीलियम नाम दिया।
  • पृथ्वी पर:
    • ब्रिटिश रसायनज्ञ सर विलियम रामसे द्वारा वर्ष 1895 में पृथ्वी पर हीलियम के अस्तित्व की खोज की गई थी।
  • भारत में: 
    • वर्ष 1906 में मॉरिस ट्रैवर्स नामक एक युवा अंग्रेज़ ने केरल के समुद्र तट पर बहुतायत में उपलब्ध मोनाज़ाइट रेत को गर्म करके थोड़ी मात्रा में हीलियम निकाला था।
      • मोनाज़ाइट (Monazite) मुख्य रूप से एक लाल-भूरे रंग का फॉस्फेट खनिज है जिसमें दुर्लभ-पृथ्वी तत्त्व मौजूद होते हैं।

भारतीय भंडार: 

  • भारत के झारखंड राज्य में अवस्थित राजमहल ज्वालामुखी बेसिन (Rajmahal Volcanic Basin) में अरबों वर्षों (सूर्य से पृथ्वी की उत्पत्ति के समय से) से हीलियम का संचित भंडार विद्यमान है।
  • वर्तमान में शोधकर्त्ताओं द्वारा भविष्य में हीलियम के अन्वेषण और इसे प्रयोग में लाने  हेतु राजमहल बेसिन का बड़े पैमाने पर मानचित्रण किया जा रहा है 

भारत की आवश्यकता: 

  • आयात बोझ को कम करना: 
    • हर वर्ष भारत द्वारा अपनी आवश्यकता को पूरा करने हेतु अमेरिका से 55,000 करोड़ रुपए के हीलियम का आयात किया जाता है  
  • उपयोग: 
    • हीलियम का उपयोग दवा, वैज्ञानिक अनुसंधान, ब्लींप इन्फ्लेशन (हवाई पोत को फुलाना), विभिन्न उत्सवों के दौरान सजावट में उपयोग किये जाने वाले गुब्बारों को फुलाने तथा वेल्डिंग अनुप्रयोगों में किया जाता है।
    • चुम्बकीय अनुनाद प्रतिबिम्ब (Magnetic Resonance Imaging- MRI) को स्कैन करने तथा रॉकेट ईंधन और परमाणु रिएक्टरों आदि में भी हीलियम का उपयोग किया जाता है।

अमेरिका का एकाधिकार: 

  • यह पता चलने के बाद कि अमेरिका के ग्रेट प्लेंस में बड़ी मात्रा में हीलियम संचित है, अमेरिका विश्व में हीलियम का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्यातक देश बन गया। 
    • मिसिसिपी नदी तथा रॉकीज़ पर्वतों के बीच उत्तर से दक्षिण तक फैला मैदान ग्रेट प्लेंस कहलाता है।
  • जल्द ही यह महसूस किया गया कि अमेरिका के पास भी हीलियम का एक बड़ा भंडार है।

अन्य विकल्प: 

  • कतर हीलियम का एक संभावित निर्यातक देश है लेकिन जटिल राजनीतिक और कूटनीतिक उलझनों ने हीलियम के निर्यात हेतु कतर की स्थिति को अविश्वसनीय बना दिया है।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 में संशोधन की सिफारिश

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 पर एक संसदीय समिति ने सरकार को उपभोक्ताओं के अधिकारों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करने और अनुचित प्रथाओं को रोकने के लिये नियमों में संशोधन की सिफारिश की है।

  • इलेक्ट्रॉनिक कॉमर्स या ई-कॉमर्स एक व्यावसायिक मॉडल है, जो फर्मों और व्यक्तियों को इंटरनेट के माध्यम से खरीद और बिक्री की सुविधा प्रदान करता है।

प्रमुख बिंदु

मुद्दे

  • बेहद सस्ती कीमत
    • बाज़ार की कुछ प्रमुख कंपनियों द्वारा अपनाई गई अल्पकालिक रणनीति के रूप में बेहद कम मूल्य निर्धारण, बाज़ार से प्रतिस्पर्द्धा को समाप्त करने का कारण बन सकता है, जो कि दीर्घकाल में उपभोक्ताओं के लिये हानिकारक होगा।
      • इस प्रकार की रणनीति में किसी कंपनी द्वारा एक उत्पाद का मूल्य इतना कम निर्धारित किया जाता है कि अन्य कंपनियाँ उसकी प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर पाती हैं और बाज़ार छोड़ने के लिये मज़बूर हो जाती है।
  • अनुचित प्रथाएँ
    • यद्यपि ई-कॉमर्स उद्यम के कई लाभ हैं, किंतु इस क्षेत्र के विकास ने उपभोक्ताओं को अनुचित व्यापार प्रथाओं, गोपनीयता के उल्लंघन और शिकायतों को दर्ज करने आदि के प्रति संवेदनशील बना दिया है।
    • इसके परिणामस्वरूप फेक रिव्यू और अनुचित पक्षपात जैसी समस्याएँ अक्सर देखने को मिलती हैं।

प्रमुख सिफारिशें

स्पष्ट परिभाषा

  • ई-कॉमर्स के संदर्भ में अनुचित व्यापार प्रथाओं को और अधिक स्पष्टता के साथ परिभाषित किया जाना चाहिये, साथ ही बड़ी संस्थाओं विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) और छोटे व्यवसायों द्वारा ऐसी अनुचित प्रथाओं से निपटने के लिये व्यावहारिक कानूनी उपाय किये जाने चाहिये। 
  • ‘ड्रिप प्राइज़िंग’, जहाँ अतिरिक्त शुल्क के कारण उत्पाद का अंतिम मूल्य काफी अधिक हो जाता है, को भी स्पष्टता से परिभाषित किया जाना चाहिये और इस प्रकार की अनुचित प्रथा के विरुद्ध उपभोक्ताओं की रक्षा करने के लिये यथासंभव प्रावधान किये जाने चाहिये।

वितरण शुल्क का निर्धारण

  • उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय को ई-कॉमर्स संस्थाओं द्वारा अधिरोपित किये जाने वाले वितरण शुल्क के निर्धारण हेतु व्यापक दिशा-निर्देश जारी करने चाहिये।

व्यक्तिगत डेटा का वर्गीकरण

  • उपयोगकर्त्ताओं की गोपनीयता की रक्षा और उनके डेटा की सुरक्षा के लिये समिति ने सिफारिश की है कि उपयोगकर्त्ताओं के व्यक्तिगत डेटा को संवेदनशीलता के स्तर के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है और प्रत्येक स्तर के लिये उपयुक्त सुरक्षा निर्धारित की जा सकती है।

भुगतान सुरक्षा

  • भुगतान गेटवे की एक सुरक्षित और मज़बूत प्रणाली स्थापित की जानी चाहिये, ताकि उपयोगकर्त्ताओं के लेन-देन संबंधी डेटा से किसी भी प्रकार का समझौता न किया जा सके।

स्थानीय डेटा केंद्र

  • सभी प्रमुख ई-मार्केटप्लेस संस्थाओं को भारत में अपना डेटा सेंटर स्थापित करना चाहिये, ताकि उपभोक्ता डेटा को देश की सीमाओं के बाहर किसी सर्वर पर होस्ट न किया जाए और उस डेटा का दुरुपयोग न हो। 

कस्टमर केयर

  • ई-कॉमर्स संस्थाओं को ग्राहकों की समस्याओं को हल करने के लिये एक समर्पित कस्टमर केयर तंत्र स्थापित करना चाहिये, जिसमें कस्टमर केयर नंबर और एक समर्पित कस्टमर केयर अधिकारी होगा।

छोटे/स्थानीय विक्रेताओं को संरक्षण

  • छोटे/स्थानीय विक्रेताओं की सुरक्षा के लिये नियामक तंत्र स्थापित करना काफी महत्त्वपूर्ण है, ऐसे में छोटे/स्थानीय विक्रेताओं को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करने और छोटे खुदरा विक्रेताओं को भी ई-कॉमर्स परिवेश में शामिल करने के लिये सरकार को दिशा-निर्देश जारी करने चाहिये।

भ्रामक तकनीक को हतोत्साहित करना

  • एल्गोरिदम में परिवर्तन, नकली उत्पाद समीक्षा और रेटिंग सहित सभी भ्रामक रणनीतियों को हतोत्साहित करने के लिये कुछ सुधारात्मक तंत्र बनाए जाने चाहिये, ताकि किसी भी तरह से उपभोक्ता हित को नुकसान पहुँचने से रोका जा सके।

उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020

परिचय

  • उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 अनिवार्य है, सलाहकारी नहीं। 

प्रयोज्यता

  • ये नियम सभी ई-कॉमर्स खुदरा विक्रेताओं पर लागू होते हैं, जो भारतीय उपभोक्ताओं को सामान और सेवाएँ प्रदान करते हैं, चाहे वे भारत में पंजीकृत हों अथवा विदेश में।

नोडल अधिकारी

  • ई-कॉमर्स संस्थाओं को अधिनियम या नियमों के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु भारत में एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति करने की आवश्यकता है।

कीमत और एक्सपायरी तिथि 

  • ई-कॉमर्स विक्रेताओं को बिक्री के लिये दी जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की कुल कीमत प्रदर्शित करनी होगी, जिसमें अन्य शुल्कों के साथ कुल शुल्क का ब्रेकअप भी शामिल होगा।
  • इसके अलावा वस्तु की एक्सपायरी तिथि का भी स्पष्ट तौर पर उल्लेख किया जाना चाहिये।

आयात संबंधी प्रासंगिक निर्णय

  • उपभोक्ताओं को निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिये खरीद से पूर्व सूचित वस्तुओं और सेवाओं से संबंधित समग्र आवश्यक विवरण देना आवश्यक है, जिसमें ‘उद्गम देश’ से संबंधित सूचना और आयात की स्थिति में आयातक का नाम तथा विवरण और आयातित उत्पादों की प्रामाणिकता से संबंधित गारंटी आदि शामिल हैं।

शिकायत निवारण तंत्र:

  • मार्केटप्लेस तथा विक्रेताओं के लिये एक शिकायत निवारण अधिकारी की नियुक्ति करना आवश्यक है।
    • ई-कॉमर्स का मार्केटप्लेस मॉडल: इसका अर्थ खरीदार एवं विक्रेता के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करने हेतु ई-कॉमर्स इकाइयों को एक डिजिटल एवं इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क प्रदान करना है।

अनुचित व्यापार प्रथाओं, हेर-फेर और पक्षपातपूर्ण व्यवहार पर रोक लगाना

  • कोई भी ई-कॉमर्स इकाई अनुचित लाभ प्राप्त करने या एक ही वर्ग के उपभोक्ताओं के बीच भेदभाव करने के उद्देश्य से कीमतों में फेरबदल नहीं करेगी और न ही उपभोक्ताओं के अधिकारों को प्रभावित करने वाला कोई मनमाना वर्गीकरण करेगी। 

फेक या गुमराह करने वाली पोस्ट 

  • कोई भी विक्रेता या ई-कॉमर्स इकाई स्वयं को एक उपभोक्ता के रूप में प्रस्तुत नहीं करेगी और वस्तुओं या सेवाओं के बारे में नकली समीक्षा नहीं करेगी, इसके अलावा किसी वस्तु अथवा सेवा की गुणवत्ता या विशेषताओं को गलत तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जाएगा।

कोई निरसन शुल्क नहीं

  • कोई भी ई-कॉमर्स इकाई उपभोक्ताओं पर निरसन शुल्क अधिरोपित नहीं करेगी।
  • वस्तुओं और सेवाओं के दोषपूर्ण, अपूर्ण और नकली होने की स्थिति में विक्रेताओं को उन्हें वापस लेने से इनकार नहीं करना चाहिये।

नकली उत्पाद बेचने वाले विक्रेताओं का रिकॉर्ड

  • ई-कॉमर्स संस्थाओं को उन सभी विक्रेताओं का रिकॉर्ड रखना होगा, जो बार-बार उन वस्तुओं या सेवाओं की पेशकश करते हैं जिन्हें कॉपीराइट अधिनियम (1957), ट्रेडमार्क अधिनियम (1999) या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (2000) के तहत प्रतिबंधित किया गया है। 

 दंड

  • नियमों के उल्लंघन के मामले में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

स्रोत: द हिंदू


जैव विविधता और पर्यावरण

नेट ज़ीरो उत्सर्जन ऊर्जा प्रणाली में परिवर्तन

चर्चा में क्यों?

हाल ही में द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट (TERI) और शेल (Shell) ने भारत: ट्रांसफॉर्मिंग टू ए नेट ज़ीरो एमिशन एनर्जी सिस्टम नामक एक रिपोर्ट जारी की है

यह भारत की घरेलू ऊर्जा प्रणाली को सतत आर्थिक विकास के उद्देश्यों को प्राप्त करते हुए  2050 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है 

प्रमुख बिंदु :

  • संभावित चुनौतियाँ: भारत को नवाचार-संचालन के संदर्भ में एक उपयुक्त नीति की आवश्यकता है जो बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को तैनात करने में सहायक हो
  • नवीनीकरण को बढ़ावा: भारत को अपने विद्युत मिश्रण या इस क्षेत्र में नेट ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिये नवीकरणीय ऊर्जा या अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी 90% (2019-2020 में यह लगभग 11% है) तक बढ़ानी होगी। 
  • कोयला आधारित बिजली संयंत्र: भारत को अपने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को चरणबद्ध तरीके से हटाते हुए इन्हें 2050 तक पूरी तरह से हटाना होगा।
  • प्रौद्योगिकी पहुँच: भारत की ऊर्जा प्रणालियों का आकार कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज (CCS) की उपलब्धता या अनुपस्थिति पर निर्भर करेगा। यदि CCS प्रौद्योगिकी व्यावसायिक रूप से अलाभकारी हो: 
    • भारत के पेट्रोलियम उत्पादों में वर्तमान में जैव ईंधन की नगण्य हिस्सेदारी की तुलना में   98% योगदान होना चाहिये।
    • भारत के औद्योगिक और परिवहन क्षेत्र में उपयोग की जाने वाली दो-तिहाई से अधिक ऊर्जा के विद्युतीकरण के साथ-साथ अब तक परिवहन क्षेत्र के उपयोग में विद्युत की नगण्य हिस्सेदारी की तुलना में औद्योगिक क्षेत्र के विद्युत उपयोग में 20%  की कमी की जानी चाहिये।

TERI द्वारा सुझाव:

  • ऊर्जा दक्षता पर बल :
    • नेट ज़ीरो लक्ष्य के उद्देश्य को पूर्ण करने के लिये ऊर्जा कुशल संरचनाओं जैसे- इमारतों, प्रकाश व्यवस्था, उपकरणों और औद्योगिक प्रक्रियाओं  की आवश्यकता होगी।
  • जैव ईंधन का उपयोग:
    • कृषि कार्य में उपयोग किये जाने वाले हल्के वाणिज्यिक वाहनों, ट्रैक्टरों से उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी।
    • विमानन क्षेत्र में जैव ईंधन का अधिक उपयोग हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी के मानक पैमाने तक उत्सर्जन को कम करने का एकमात्र व्यावहारिक समाधान है।
  • कार्बन पृथक्करण/सीक्वेस्ट्रेशन:
    • 2050 तक भारत के उत्सर्जन की स्थिति 1.3 बिलियन टन होगी। इस उत्सर्जन के अवशोषण के लिये प्राकृतिक और मानव निर्मित कार्बन सिंक पर निर्भर रहना होगा।
    • जबकि पेड़ 0.9 बिलियन टन उत्सर्जन को ग्रहण करने या अवशोषण में अपनी भूमिका निभाते है, देश के बाकी हिस्सों को फिर से व्यवस्थित करने के लिये कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता होगी।
  • कार्बन मूल्य निर्धारण: 
    • भारत में कोयला और पेट्रोलियम ईंधन पर कर लगाए जाने की प्रक्रिया विद्यमान है, जिसके संचालन परिवर्तन के लिये उत्सर्जन पर कर लगाने हेतु विचार करना चाहिये।
  • निम्न-कार्बन ऊर्जा की तैनाती:
    • निम्न कार्बन ऊर्जा के चार मुख्य प्रकार हैं: पवन, सौर, हाइड्रो या परमाणु ऊर्जा। इनमें प्रथम तीन नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन हैं, जिसका अर्थ है कि ये पर्यावरण के अनुकूल हैं, इनका उपयोग विद्युत उत्पादन के लिये प्राकृतिक संसाधनों (जैसे हवा या सूर्य) के रूप में किया जाता है।
    • निम्न कार्बन ऊर्जा को  परिनियोजित करने से घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों जलवायु चुनौतियों का सामना करने में मदद मिलेगी, साथ ही भारत के नागरिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा।

Area-of-Action

नेट ज़ीरो उत्सर्जन:

परिचय:

  • 'नेट ज़ीरो उत्सर्जन' से तात्पर्य है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (GHGs) उत्पादन और वायुमंडल के बाह्य क्षेत्र के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के बीच एक समग्र संतुलन प्राप्त करना।
  • सर्वप्रथम मानवजनित उत्सर्जन (जैसे जीवाश्म-ईंधन वाले वाहनों और कारखानों से) को यथासंभव शून्य के करीब लाया जाना चाहिये। दूसरा, किसी भी शेष GHGs को कार्बन को अवशोषित कर (जैसे- जंगलों की पुनर्स्थापना द्वारा) संतुलित किया जाना चाहिये। 

समय-सीमा:

  • यदि कोई एक CO2 या सभी प्रमुख GHGs (मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और एचएफसी सहित) को शामिल किया जाता है, तो नेट ज़ीरो उत्सर्जन स्थिति प्राप्त करने की समय-सीमा काफी अलग होगी।
    • गैर-CO2 उत्सर्जन के लिये नेट ज़ीरो के लिये निर्धारित तिथि के बाद भी कुछ उत्सर्जनों (जैसे-कृषि स्रोतों से मीथेन) को  चरणबद्ध करना मुश्किल होगा।
    • वैश्विक तापन को 1.5 डिग्री सेल्यियस तक सीमित करने के दृष्टिकोण से 2050 तक कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) नेट ज़ीरो के औसत तक पहुँचने की संभावना है। वर्ष 2063 और 2068 के मध्य कुल GHG उत्सर्जन नेट ज़ीरो तक पहुँच जाएगा।

Global net-zero

वैश्विक परिदृश्य:

  • जून 2020 तक बीस देशों और क्षेत्रों ने नेट ज़ीरो लक्ष्यों को अपनाया है। इस सूची में केवल वे देश शामिल हैं, जिन्होंने कानून या किसी अन्य नीति दस्तावेज़ में नेट ज़ीरो लक्ष्य को अपनाया है
  • भूटान पहले से ही कार्बन नकारात्मक देश है अर्थात् यह CO2  के  उत्सर्जन की तुलना में अधिक अवशोषण करता है।

भारतीय परिदृश्य

  • उत्सर्जन: भारत का प्रति व्यक्ति CO2 उत्सर्जन, जो कि वर्ष 2015 में 1.8 टन के स्तर पर था, संयुक्त राज्य अमेरिका के नौवें हिस्से के बराबर और वैश्विक औसत (4.8 टन प्रति व्यक्ति) के लगभग एक-तिहाई है।
    • हालाँकि समग्र तौर पर भारत अब चीन तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद CO2 का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है।
  • प्रतिबद्धता को लेकर विवाद: भारत पर वर्ष 2050 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने का वैश्विक दबाव है।
    • एक ओर कुछ विशेषज्ञों का तर्क है कि भारत को वर्ष 2050 तक जलवायु समर्थित कानून के माध्यम से अपने ‘नेट ज़ीरो’ उत्सर्जन को कम करने का संकल्प करना चाहिये। यह भारत को प्रतिस्पर्द्धी बनाएगा, निवेश आकर्षित करने तथा रोज़गार सृजित करने में मदद करेगा। उदाहरण के लिये इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने हेतु बनाई गई एक महत्त्वाकांक्षी नीति, ऑटोमोबाइल विनिर्माण उद्योग तथा बिजली एवं निर्माण क्षेत्रों में रोज़गार सृजन में मददगार साबित हो सकती है।
    • वहीं, दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ ‘समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्त्वों’ के पक्ष में तर्क देते हैं, जो सभी अमीर और विकसित देशों को किसी भी ऐसी प्रतिज्ञा के विरुद्ध नेतृत्त्व करने और वकालत करने के लिये उत्तरदायी बनाता है,  यह भारत जैसे विकासशील देशों के विकास हेतु आवश्यक ऊर्जा आवश्यकताओं के उपयोग को सीमित करता है।
  • सबसे अधिक उत्सर्जक क्षेत्र:
    • ऊर्जा> उद्योग> वानिकी> परिवहन> कृषि> भवन

ऊर्जा और संसाधन संस्थान (TERI):

  • ऊर्जा और संसाधन संस्थान (TERI) नई दिल्ली स्थित एक गैर-लाभकारी अनुसंधान संस्थान है, जो ऊर्जा, पर्यावरण और सतत् विकास के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य करता है।
  • वर्ष 1974 में स्थापित इस संस्थान को पूर्व में टाटा ऊर्जा अनुसंधान संस्थान के नाम से जाना जाता था तथा वर्ष 2003 में इसका नाम परिवर्तित कर ऊर्जा और संसाधन संस्थान कर दिया गया।
  • ग्रीन बिल्डिंग्स के लिये डिज़ाइन तैयार करना तथा हरित इमारतों के मूल्यांकन करने में मदद करना।
  • इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण मुद्दों के वैश्विक समाधान के लिये स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर की रणनीति तैयार करना है।
  • इसका मुख्य फोकस स्वच्छ ऊर्जा, जल प्रबंधन, प्रदूषण प्रबंधन, स्थायी कृषि और जलवायु लचीलेपन को बढ़ावा देना है।

आगे की राह:

  • सरकार के बजट में ऊर्जा, सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ जलवायु शमन नीतियों के लिये एक महत्त्वपूर्ण प्रावधान होना चाहिये। विशेष रूप से विकास लक्ष्यों में स्वच्छ ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित करने की समय-सीमा शामिल होनी चाहिये।
  • जलवायु हेतु वित्त जुटाने के लिये एक अभियान शुरू करने की भी आवश्यकता है और ऊर्जा दक्षता, जैव ईंधन के उपयोग, कार्बन अनुक्रम, कार्बन मूल्य निर्धारण पर ध्यान दिया जाना चाहिये।
  • मज़बूत पर्यावरण नीतियाँ समृद्धि प्रदान करने वाली होती हैं। कल्पनाशील नीतियों, मज़बूत संस्थानों और अंतर्राष्ट्रीय वित्त के साथ भारत अपनी स्वतंत्रता के 100वें वर्ष में प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन से स्वतंत्रता की घोषणा करने में सक्षम होगा।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


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